एक अस्पताल से कहीं ज्यादा

टाटा मेमोरियल सेंटर कैंसर पर शोध और उसके उपचार का एक संपूर्ण केन्द्र है। वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र का यह एक महत्वपूर्ण स्थल है जहां प्राथमिक चिकित्सा के लिए आने वाले 60 प्रतिशत रोगियों का निःशुल्क उपचार किया जाता है।

दुनिया भर में लगभग 1 करोड़ से 1 करोड़ 20 लाख लोग कैंसर से पीड़ित हैं। इनमें से 50 प्रतिशत से अधिक विकासशील देशों से हैं। भारत में हर दिन 800,000 लोग इस खतरनाक बीमारी से ग्रस्त पाए जाते हैं। किसी भी समय देश में 25 लाख कैंसर मरीज होते हैं।

यदि आपको लगता है कि यह एक बुरी खबर है, तो अभी इससे भी बुरी खबर बाकी है। 2020 तक, विश्व स्तर पर रोगियों की संख्या 2 करोड़ से अधिक हो जायेगी, और उनमें से 72 प्रतिशत तीसरी दुनिया से होंगे।

क्या भारत इस कैंसरयुक्त भविष्य की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है? "इसका जवाब है नहीं," मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) के डीन (अकादमिक) डॉ मोहनदास मेलथ कहते हैं। भारत में कैंसर की दर 100,000 की आबादी में लगभग 100 है। भारत में आम इंसान की उम्र बढ़ने के साथ साथ, अधिकांश लोग इस हाइड्रा-हेडेड रोग से प्रभावित हो जायेंगें क्योंकि कैंसर 60-75 के आयु वर्ग वाले लोगों में फैलने की अधिक प्रवृत्ति रखता है।

“हमें हर राज्य में एक टाटा मेमोरियल अस्पताल की जरूरत है," टीएमसी की एक पूर्व निदेशक, डॉ केतयूं दिनशा कहती हैं। वह उस असाधारण दृष्टिकोण की प्रशंसा करती हैं जिसने टाटा समूह को उस समय एक स्पेशियलिटी कैंसर केंद्र स्थापित करने के योग्य बनाया, जब उनकी संख्या दुनिया में केवल मुट्ठी भर थी। आज, टीएमसी देश में कैंसर के लगभग एक तिहाई रोगियों का इलाज करता है।

1932 में लेडी मेहरबाई टाटा की ल्यूकेमिया से मृत्यु होने के बाद, उनके पति, टाटा संस के चेयरमैन और संस्थापक जमशेदजी टाटा के पुत्र – दोराबजी टाटा –उस अस्पताल जैसी एक सुविधा भारत में लाना चाहते थे, जहाँ उनकी पत्नी का इलाज किया गया था। दोराबजी की मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारी, नोरोज़ी सकलतवाला, ने इस प्रयास को आगे बढ़ाया। किन्तु वह जेआरडी टाटा का समर्थन था, जिसने अंततः 28 फ़रवरी 1941 को मुंबई के मजदूर इलाके परेल के बीचोंबीच, एक सात मंजिला भवन, टाटा मेमोरियल अस्पताल को साकार किया।

1957 में, स्वास्थ्य मंत्रालय ने अस्थायी रूप से टाटा मेमोरियल अस्पताल को अपने नियंत्रण में ले लिया। लेकिन जेआरडी टाटा और भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के अग्रणी - होमी भाभा – यह अनुमान लगा पाए कि कैंसर के इलाज के दौरन इमेजिंग से स्टेजिंग और वास्तविक उपचार तक की प्रक्रिया में विकिरण की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। 1962 में अस्पताल का प्रशासनिक नियंत्रण परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) में स्थानांतरित कर दिया गया। चार साल के बाद, 1952 में स्थापित कैंसर अनुसंधान संस्थान और टीएमसी का विलय कर दिया गया।

15,000 वर्ग मीटर के एक क्षेत्र में फैले 80 बेड वाले अस्पताल से शुरू होकर टीएमसी अब 600 से अधिक बेड के साथ लगभग 70,000 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। 1941 में जो वार्षिक बजट रु. 5 लाख का था, वह अब रु. 120 करोड़ के करीब हो चुका है।

कैंसर की रोकथाम और उपचार, और अनुसंधान के लिए टीएमसी एक व्यापक केंद्र है। यह वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र पर एक मील का पत्थर है और दुनिया के इस हिस्से के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। न केवल पूरे भारत से, बल्कि पड़ोसी देशों से भी हर साल लगभग 25,000 रोगी इन चिकित्सालयों में आते हैं। प्राथमिक देखभाल की आवश्यकता वाले रोगियों में से लगभग 60 प्रतिशत का नि:शुल्क इलाज किया जाता है। इन वर्षों में, टीएमसी ने निवारक गतिविधियों के महत्व को भी महसूस किया और जागरूकता पैदा करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भी पहुंच रहा है।

यह केंद्र कैंसर के क्षेत्र में शिक्षा पर काफी जोर देता है। 250 से अधिक छात्रों, चिकित्सा पेशेवरों, वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को अस्पताल में प्रशिक्षण दिया जाता है। डीएई ने भारत और दक्षिण एशिया के लिए प्रासंगिक कैंसर में अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नवी मुंबई में खारघर में (एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट एंड एजुकेशन इन कैंसर नामक) एक अत्याधुनिक अनुसंधान और विकास केंद्र स्थापित किया है।

डॉ दिनशा बताती हैं, “टीएमसी और, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च एवं डॉ भाभा के साथ अपने संबंधों के कारण डीएई, दोनों ही ने अपनी कार्य संस्कृति टाटा समूह से विरासत में पाई है,"। वह याद करती हैं कि जेआरडी टाटा संस्थान के प्रति किस हद तक प्रतिबद्ध थे। "वास्तव में, उनकी भागीदारी और चिंता के कारण ही अस्पताल डीएई से स्वास्थ्य मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया गया था।

डॉ दिनशा बड़े चाव से अस्पताल में जेआरडी के दौरों को याद करती हैं। “उनका व्यक्तित्व इतना विशाल था; हम सब उनसे बेहद प्रभावित थे। वे सचेत एवं प्रतिबद्ध थे। मैं विशेष रूप से 1991 में स्वर्ण जयंती के उत्सव में उनके आगमन को याद करती हूँ।”

डॉ मोहनदास, जो 25 वर्षों से केंद्र के साथ हैं, गर्मजोशी से टाटा समूह और टीएमसी के बीच संबंधों के बारे में बताते हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार विकसित हुए हैं। “यद्यपि टाटा समूह के लोग सीधे केंद्र में शामिल नहीं हैं, फिर भी हमारे रोगियों की एक बड़ी संख्या को उस वित्तीय समर्थन से लाभ प्राप्त होता है, जो टाटा ट्रस्ट प्रदान करता है। हमें अनुसंधान के लिए भी अनुदान मिलता है। मैं एक ऐसे अनुदान का लाभार्थी रहा था जिसका उपयोग मैंने क्लीनिकल न्यूट्रीशन विभाग स्थापित करने के लिए किया था।”

डॉ मोहनदास ईमानदारी और निष्ठा की उस संस्कृति को सर्वोपरि रखते हैं, जो संस्थापकों से विरासत में मिली है। "एक असामान्य घटना, एक व्यवहार, जिसका हमने अपनी स्थापना के बाद से पालन किया है, वह यह है कि हमारे यहाँ केवल उन रोगियों को देखने की व्यवस्था नहीं है जिनके पास अप्वाइंटमेंट है। आने वाले हर रोगी का इलाज़ किया जाता है।”

टीएमसी इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि निजी परोपकार एवं सार्वजनिक सहयोग कितनी अच्छी तरह एक साथ काम कर सकते हैं। और, जैसा कि उन असंख्य लोगों द्वारा अभिप्रमाणित किया जाएगा जिन्होंने उस कौशल और देखभाल से लाभ प्राप्त किया है जो केन्द्र प्रदान करता है, जो एक अस्पताल से अधिक है, चूँकि यह एक ऐसी बीमारी के खिलाफ भारत की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति पर है, जो किसी को भी कैद नहीं करती।

टाटा मेमोरियल सेंटर:तथ्य
  • टाटा मेमोरियल अस्पताल (टीएमएच) की स्थापना 1941 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा की गई थी। इसे 1957 में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के नियंत्रण में दे दिया गया। 1962 में, टीएमएच ने सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत काम करना शुरू किया।
  • 1966 में, टीएमएच को भारतीय कैंसर रिसर्च संस्थान के साथ विलय कर दिया गया था और टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) नाम दिया गया था। यह एक गंभीर सार्वजनिक आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए एक निजी संस्थान और सरकार की भागीदारी का एक बेहतरीन उदाहरण है।
  • 2008 में टीएमसी में कुछ 52,000 रोगियों का इलाज किया गया था, उनमें से लगभग 65 प्रतिशत का निशुल्क इलाज किया गया था। इस सेंटर में 620 आतंरिक रोगी बेड (98 प्रतिशत भरे हुए) हैं और प्रतिदिन 140 रोगियों का इलाज किया जाता है।
  • टीएमसी को भारत भर में कई कैंसर केन्द्रों का सहयोग प्राप्त है, उनमें अहमदाबाद, तिरूवनंतपुरम, नागपुर, ग्वालियर और हैदराबाद स्थित क्षेत्रीय कैंसर केंद्र, , सिविल अस्पताल, शिलांग और जोरहट अस्पताल, जोरहट (असम) हैं।
  • टीएमसी में कुछ 300 स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट छात्र हैं और इसका अपना विश्वविद्यालय भी है। इस केन्द्र में जनरल सर्जरी, रेडियोथेरेपी, पैथोलॉजी और अनेस्थिसियोलॉजी, सुपर स्पेशियलिटी कार्यक्रमों और अनुसंधान कार्यक्रमों में आवासीय कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इसके अलावा यह प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी आयोजित करता है जिनकी अवधि छह से अठारह माह होती है और दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम भी संचालित करता है।
  • केंद्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान, वाशिंगटन डीसी (यूएसए), आईएआरसी, ल्योन(फ़्रांस) और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ सहयोगात्मक पहलों का संचालन करता है।
  • 2002 में, टीएमसी ने खारघर, नवी मुंबई में एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट एजुकेशन एंड रिसर्च इन कैंसर (एसीटीआरईसी) की स्थापना की। मुंबई की सैटेलाईट सिटी में 60 एकड़ में फैले हुए, एसीटीआरईसी में एक क्लीनिकल रिसर्च सेंटर और एक कैंसर रिसर्च सेंटर है।