सीमांत विज्ञान के जज्बे को प्रोत्साहन

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के निदेशक प्रो. एस भट्टाचार्य इस असाधारण संगठन के इतिहास और उसके समक्ष मौजूद चुनौतियों पर प्रकाश डालते हैं।

आजादी-पूर्व भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियां उसकी औद्योगिक सफलता की तुलना में बहुत आगे थी। यह उस समय के किसी भी देश के लिए विशिष्ट बात थी, लेकिन भारत के वैज्ञानिक तेवर को सुधारने और नव-स्वतंत्र देश की वैज्ञानिक अवसंरचना को सशक्त करने की जरूरत थी। इन्हीं उद्देश्यों से अनुप्राणित होकर होमी जे भाभा और जेआरडी टाटा ने 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) की स्थापना की दिशा में प्रयास किए।

श्री भाभा ने अपने एक पत्र में सर दोरबाजी टाटा ट्रस्ट से टीआईएफआर की संकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए वित्तीय सहायता हेतु अनुरोध किया। इस पत्र में उन्होंने “फीजिक्स (भौतिकी) के अध्ययन के लिए दुनिया में किसी भी देश की तुलना में बेहतरीन संस्थान (स्कूल) की स्थापना” के बारे में चर्चा की। दूसरी ओर, जेआरडी ने संस्थान के विषय पर चर्चा करने के साथ ही “तरक्की या विकास” पर भी बल दिया। इन द्रष्टाओं ने देश के इतिहास के नाजुक समय में मिलकर काम करते हुए विज्ञान को आधुनिक भारत की पहचान का एक अभिन्न तत्त्व माना।

टीआईएफआर देश में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में प्रयास की प्रथम स्थली बना। यह संस्थान केवल विज्ञान से संबंधित नहीं था, बल्कि यह विज्ञान के लाभों को कैसे समाज तक पहुंचाया जाए इसके तरीके खोज कर उन्हें समाज तक पहुंचाने के लिए था। उस जमाने में वैज्ञानिक और औद्योगिक अवसंरचनाओं की कमी के मद्देनजर टीआईएफआर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

टीआईएफआर का भवन बड़ा दिलचस्प था। लकड़ी के कामों सहित अन्य चीजें इन-हाउस की गई थीं। हम विज्ञान के सीमांत पर थे, जिसका अर्थ था कि हमें अपनी अवसंरचना (इनफ्रास्ट्रक्चर) खुद तैयार करनी थी। उस समय हम जिस मौलिक शोध में लगे थे वह असामान्य किस्म का था। हमारे आरंभिक वर्षों में यह विजन महत्वपूर्ण था कि किस प्रकार के शोध किए जाने की आवश्यकता है। जब आपका लक्ष्य इतना विशाल हो तो सामान्यतः होता यह है कि या तो परिमाण या फिर गुणवत्ता- दोनों में किसी एक से समझौता करना पड़ता है। लेकिन टीआईएफआर अपने अस्तित्व के लिए उत्कृष्टता को अपनाए रखकर अपनी योजना पर आगे बढ़ा। मेरे लिए यह संस्थान की सबसे महत्वपूर्ण जीत है।

हमने बड़ी संख्या में प्रायोगिक शोध किए हैं जो चलन स्थापित करने वाले प्रयासों के रूप में परिणत हुए। उदाहरण के लिए, भारत का पहला डिजिटल कंप्यूटर 1957 में टीआईएफआर में तैयार किया गया था। किसी भी दृष्टिकोण से यह एक बड़ी महत्वपूर्ण सफलता थी। आज, आप जिन तकनीकों के बारे में जानते हैं वे इसी से विकसित हुईं। मेरे हिसाब से, टीआईएफआर ने किसी भी अन्य भारतीय संस्थान या उद्योग के मुकाबले अधिक संख्या में विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण संगठनों को जन्म दिया है।

आजादी के ठीक बाद के वर्षों में भारत का लक्ष्य था आत्मनिर्भरता हासिल करना। लेकिन आत्मनिर्भरता के लिहाज से विज्ञान और तकनीक में फर्क था। यदि आपके पास एक विशिष्ट तकनीक नहीं है तो आप प्रयास कर इसे विकसित कर सकते हैं, जैसे कि स्वदेशी स्तर पर एक कार तैयार करना। इंडिका आत्मनिर्भरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह अपने श्रेणी की अन्य कारों से बहुत अधिक अलग नहीं है, लेकिन इसकी खूबी इस बात में है कि इसे स्वदेशी स्तर पर तैयार किया गया है। हालांकि, यदि इंडिका के पास ऐसी खूबियां हों जो इसके प्रतिस्पर्धी के पास न हों तो यह इसे अलग पहचान देती है। स्वदेशी स्तर पर चीजें बनाना, और खूबियों-खासियतों के साथ बनाना एक अनोखा संयोजन होगा।

विज्ञान में एक बार जब आप स्वदेशी बाधाओं को पार कर लेते हैं तो आप रुक नहीं सकते; आपको एक तय बिन्दु पर दूसरों से पहले पहुंचना पड़ता है। सीमांत विज्ञान का अर्थ है आविष्कारी होना। यदि किसी ने कोई आविष्कार किया है तो इस तरह नहीं कि लैब में गए और कर लिए आविष्कार।

आज, भारत कठिनाइयों के दौर से उबर चुका है। यह अब एक आत्मविश्वास से भरा देश है और इसकी अवसंरचनाओं ने व्यापक तरक्की की है। दूसरों के बराबर में आना अब कोई उपलब्धि की बात नहीं है; हमें वहां अपने श्रेष्ठतम के साथ होना होगा। इसलिए, टीआईएफआर के मूल चार्टर का वह हिस्सा जो विज्ञान के सीमांतों पर आरंभ होता है, प्रासंगिक बना हुआ है, लेकिन आत्मनिर्भर होना और अवसंरचना का विकास करना द्वितीयक रूप से महत्वपूर्ण है। उस अर्थ में श्री भाभा और जेआरडी के विजन की निरंतरता सुरक्षित रखी गई है।

टीआईएफआर अब अलग तरीके से काम करता है और इसे करना भी चाहिए। यदि यह ऐसा नहीं करता तो यह पहले ही बंद हो जाता जिसका अर्थ होता अपने मिशन में इसका असफल हो जाना। हमारी कुछ गतिविधियों ने इन वर्षों में दिशा बदल दी है और यह प्रक्रिया जारी रहेगी क्योंकि हम एक नई कार्यनीति बना रहे हैं जो अपने विस्तृत रूप में पहले की तुलना में भिन्न होगी लेकिन मूल विचार के प्रति यह तब भी आस्थावान बना रहेगा।

अब हम एक मानदंड स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जिसके तहत हम उन बातों के लिए अपने लोगों की तारीफ नहीं करेंगे जो महज किसी और के किए की पुनरावृत्ति हो। हम किसी की केवल तभी तारीफ करेंगे जब वह आविष्कार करने वाला वह पहला व्यक्ति होगा। पहले, कुछ भी तैयार करना एक किस्म की उपलब्धि होती थी। यह अब सही नहीं है। लेकिन जहां हम आज खड़े हैं वहां तक पहुंचने में हमें उस दौर से गुजरना पड़ा। एक बेहतरीन संस्था को अपनी समीक्षा और पुनरावलोकन करने में सक्षम होना चाहिए। और यह टीआईएफआर की एक विशेषता है।

शुरुआती वर्षों में संस्थान को कई सारी सफलताएं हासिल हुईं और इसने, एक तरह से, संस्थान के लिए थोड़ी समस्या भी खड़ी की। कोई संस्था तब बहुत चौकस रहती है जब वह समस्याओं से घिरी हो। लेकिन जब यह लगातार ठीक चल रही होती है तो इस कारण पैदा हुआ उच्च आत्मविश्वास इसे खामियों की ओर भी ले जाता है। एक सफल संगठन के रूप में टीआईएफआर के लिए अब प्रश्न यह है कि एक उत्कृष्ट संस्थान को किस प्रकार सही मायने में एक असधारण संस्थान में रूपांतरित किया जाए। यह एक अधिक जटिल संघर्ष है जिसके लिए नए दृष्टिकोण और एक नई कार्यनीति की आवश्यकता है जो हमारे वर्तमान समय के अनुरूप हो।

हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हमें सर्वोत्तम लोग मिलें। यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि, वित्तीय नजरिए से कहें, तो हम उन्हें वह वेतन देने में सक्षम नहीं हैं जो दुनिया भर के हमारे प्रतिस्पर्धी उन्हें दे सकते हैं। लेकिन प्रतिस्पर्धा की भूमि को हम यथासंभव सबके लिए समान बनाने की कोशिश करते हैं ताकि हम सर्वोत्तम के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। वेतन के अतिरिक्त, हम एक ऐसा कार्य-वातावरण उपलब्ध कराते हैं जो दूसरों के मुकाबले किसी तरह कमतर नहीं है, बल्कि कुछ मायने में बेहतर ही है।

बिना कोष के हम शोध नहीं कर सकते। हमारे पास कोष का सतत और स्थायी स्रोत है, लेकिन इस समीकरण का एक दूसरा पहलू भी है। लगातार स्थिर रूप में सहायता उपलब्ध होते रहने से हम आत्मसंतुष्ट हो जाते हैं, इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सहायता सप्रयास प्राप्त की जाए न कि एक अधिकार के रूप में वह सतत और स्थायी रूप से मिलती रहे। हमें परमाणु ऊर्जा विभाग से भरपूर सहायता मिलती है जो दीर्घकालीन कारक का अभिज्ञ दृष्टिकोण प्रदान करती है। उत्कृष्टतम मशीनों और आधुनिकतम तकनीकी उपकरणों के साथ हमारे पास सुंदर परिसर है और शानदार अवसंरचना है। हमारी लाइब्रेरी किसी भी अन्य संस्थान के तुलना में सर्वोत्तम है और हमारी आवसीय सुविधाएं बेहतरीन हैं।

युवा हमेशा ही देश का भविष्य होते हैं और आगे भी रहेंगे। इस सचाई के मद्देजनर, भले ही यह कठिन हो, लेकिन हमें यह समझना होगा कि आज के युवाओं के लिए मौलिक विज्ञान के विषयों में करियर आकर्षक नहीं रहा। और युवा हमारी जीवन शक्ति हैं। यदि युवा विज्ञान के क्षेत्र में नहीं उतरेंगे तो वैज्ञानिकों की हमारी अगली पीढ़ी कहां से आएगी? इसी बिन्दु पर आज हमें अपनी ऊर्जा केन्द्रित करनी होगी।

पहले हम शिक्षा के क्षेत्र से वास्ता नहीं रखा करते थे, हमें नहीं लगता था कि इसकी कोई जरूरत थी। हमारी शिक्षा व्यवस्था आज सही स्वरूप में नहीं है, खासकर मौलिक विज्ञान विषयों के क्षेत्र में, और मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि टीआईएफआर जैसे अग्रणी संस्थान यदि शिक्षा प्रणाली से खुद को दूर रखे तो यह उसकी दूरदर्शिता की कमी को ही दर्शाएगा। यह एक ऐसा संकट है जिसे हमने अपने ऊपर खुद से खड़ा किया है। विश्वविद्यालय तंत्र कठिनाई में हैं और हमें उनमें सम्मिलित होने की आवश्यकता है।

हम इस क्षेत्र में एक एकीकृत पीएचडी कार्यक्रम प्रारंभ कर एक नई शुरुआत कर रहे हैं। यह हमारी एक महती योजना है, 12वीं कक्षा से आगे के छात्रों के लिए आदि से अंत तक का कार्यक्रम। हमारी द्विशाखीय रणनीति है: पहली शाखा के अंतर्गत अल्पवय छात्रों के लिए एक ‘प्रारंभिक शिक्षण कार्यक्रम’ है, जिसके बाद स्नातकों के लिए उन्नत कार्यक्रम का प्रावधान है। सामान्य तौर पर, हमारे बेहतरीन और प्रतिभावान छात्र आईआईटी जैसी संस्थाओं में जाते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि यह करियर के तौर पर अपेक्षाकृत सुरक्षित और ज्यादा लाभकर विकल्प है। किंतु उनमें से एक बड़ी संख्या में ऐसे भी छात्र हैं जो आधारभूत विज्ञान में नियमित रह सकते हैं, अगर हम उनके लिए क्षतिपूर्ति करते हुए एक प्रथम श्रेणी का शिक्षा कार्यक्रम प्रदान कर सकें।

टीआईएफआर के तत्वावधान में, होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए प्रारंभिक शिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत कर रहा है। हम उन छात्रों को भी आकृष्ट करना चाहते हैं, जो अपने एमएससी या पीएचडी कार्यक्रम के लिए विदेश जाते हैं और हम उन्हें अपने कार्यक्रमों में लाना चाहते हैं। अब हम एक डीम्ड विश्वविद्यालय हैं और उन्हें वांछित प्रमाणपत्र प्रदान कर सकते हैं। युवा लोगों को आकृष्ट करना और उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रदान करना- यह हमारे एजेंडे का एक प्रमुख विषय है।

50 वर्षों से अधिक समय से टीआईएफआर सुचारु रूप से चलता रहा है, लेकिन युग बदल रहा है, और अर्थव्यवस्था तथा समाज भी बदल रहे हैं। हमें इस नए युग को स्वीकार करना है और इसे अपने मौलिक विचारों के पोषण तथा प्रस्फुटन द्वारा कर सकते हैं। हम थोड़ा ज्यादा बड़ा पैदा कर सकते हैं, पर सीमांत विज्ञानों में विशालता से गुणवत्ता नहीं आती। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि हमारे केंद्रों के पास अपने होनहारों को गढ़ने की पर्याप्त स्वायत्तत्ता हो। भारत सरकार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट तथा महाराष्ट्र सरकार के प्रतिनिधित्व के साथ-साथ संस्थापकों द्वारा स्थापित प्रशासनिक ढांचा आदर्श है। किसी भी समूह का वर्चस्व नहीं है, जिसका अर्थ है कि संस्थान अपनी स्वायत्तता बरकरार रख सकता है।

आज हर कोई वैश्विक होने के बारे में बातें करता है, लेकिन टीआईएफआर अपनी उत्पत्ति से ही अपने दृष्टिकोण में वैश्विक रहा है। हमारी कुछ विशिष्ट उपलब्धियां रही हैं। जीएमआरटी टेलिस्कोप अपने आप में अनूठा है और अपने काम के लिहाज से तो यह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ है। हमारे वैज्ञानिकों ने सुपरकंडक्टर की एक नई श्रेणी का आविष्कार किया है। हमारे बहुत सारे छात्र विदेशों में पढ़ाने के लिए गए हैं। हमारे यहां कई विशिष्ट अभ्यागत पधारे हैं जिनमें नोबल विजेता जॉन नैश और स्टीफन हॉकिंस शामिल हैं। एक अर्थ में हम अपने समाज और विश्व के बीच पुल की भूमिका निभाते हैं।

हमें यह याद रखना होगा कि हमारा मूल चार्टर हमसे कुछ भिन्न करने की अपेक्षा रखता है। हमें उपलब्धियों का उच्चतम मानक तय करना है, तीसरी दुनिया के नजरिए वाला मानदंड नहीं बल्कि सर्वोत्तम वैश्विक मानदंड। यह संस्थान इसके लिए विशेष रूप से सक्षम है और मेरा विश्वास है कि हम ऐसा कर सकते हैं।

फैक्ट फाइल

  • 1 जून, 1945: टीआईएफआर ने अपने जीवन की शुरुआत कॉस्मिक रे रिसर्च यूनिट बैंगलोर [अब बेंगलुरु] में की थी। छह महीने बाद यह केन्द्र उठकर बॉम्बे [अब मुंबई] के पेडर रोड स्थित केनिलवर्थ चला गया।
  •  15 जनवरी, 1962: प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मुंबई के नेवी नगर में संस्थान के 15 एकड़ के नए प्रांगण का उद्घाटन किया।
  • शुरुआती शोध कार्य कॉस्मिक किरणों, हाई-एनर्जी फीजिक्स, सैद्धांतिक फीजिक्स और गणित के क्षेत्र में किए गए। आगे चलकर, संस्थान के अपने शोध कार्यों के क्षेत्र का विस्तार किया और इसमें न्यूक्लियर फीजिक्स (नाभिकीय भौतिकी), कंडेंस्ड मैटर फीजिक्स, कंप्यूटर विज्ञान, जियोफिजिक्स, आणविक जीवविज्ञान (मॉलिक्यूलर बायोलॉजी), रेडियो ऐस्ट्रोनॉमी और विज्ञान की शिक्षा शामिल किए गए।
  • टीआईएफआर के ही उत्कृष्ट कार्यों का परिणाम था कि भारत का पहला डिजिटल कंप्यूटर (टीआईएफआरएसी) तैयार हुआ।
  • टीआईएफआर के तीन स्कूल(स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स, स्कूल ऑफ नेचुरल साइंसेज, स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड कंप्यूटर साइंसेज) हैं तथा अन्य कई सारे केन्द्र या सेंटर (मुंबई में होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन, पुणे में नेशनल सेंटर फॉर रेडियो ऐस्ट्रोफीजिक्स, बेंगलुरु में नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज) हैं।
  • संस्थान द्वारा चार फैसिलिटीज (सुविधा केन्द्रों) का भी संचालन किया जाता है: पुणे के निकट कोदाड में जायंट मीटरवेब रेडियो टेलिस्कोप; तमिलनाडु के उदगमंडलम में हाई-एनर्जी कॉस्मिक रे लैबोरेट्री; मध्य प्रदेश के पचमढ़ी में हाई-एनर्जी कॉस्मिक एवं गामा रे लैबोरेट्रीज तथा हैदराबाद स्थित नेशनल बलून फैसिलिटी।