जेआरडी टाटा इकोटेक्नोलॉजी सेंटर

एक मौन अभियान जारी है और इसका नाम ‘ईको-तकनीक’ है जिसकी मूल अवधारणा है गरीब समुदाय के लोगों को उपयुक्त आजीविका हासिल करने के अवसर देने की आवश्यकता के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना।

भारत में इकोटेक्नोलॉजी आंदोलन का ध्वज वाहक जेआरडी टाटा इकोटेक्नोलॉजी सेंटर है, जो एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन, चेन्नई का हिस्सा है। 1996 में स्थापित इस केंद्र का जन्म प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक श्री स्वामीनाथन के इस दृढ़ मत के फलस्वरूप हुआ था कि पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक प्रयास का एक इष्टतम मिश्रण, जो पर्यावरण का विकास एवं उसकी रक्षा करता है, ही सही मायने में स्थायी विकास का आधार है।

1987 में 'विश्व खाद्य पुरस्कार' विजेता डॉ स्वामीनाथन ने पुरस्कार से प्राप्त धनराशि को इस केंद्र के लिए रख छोड़ा। एक बड़ा मौद्रिक योगदान सर दोराबजी टाटा एवं संबंद्ध ट्रस्टों से आया, जिसने शुरूआत में केंद्र को रु. 1.85 करोड़ प्रदान किए। औपचारिक रूप से जुलाई 1998 में उद्घाटित इस संस्थान को इस प्रकार अब तक टाटा ट्रस्टों से रु. 4.5 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त हुए हैं। इस तरह के समर्थन के कारण ही यह केन्द्र तमिलनाडु में और अन्यत्र ग्रामीण गरीबों के जीवन को बदलने में अहम भूमिका निभाने में सक्षम रहा है।

ग्रामीण विकास के लिए जेआरडी केंद्र का पूर्णतावादी दृष्टिकोण कृषि से कहीं बढ़ कर है। इसका अर्थ है, कंप्यूटर एवं टच स्क्रीन प्रौद्योगिकी का उपयोग करने वाले साक्षरता कार्यक्रमों का आयोजन, सरकार के साथ बातचीत और वकालत करना, उन योजनाओं के बारे में गरीब को शिक्षित करना जो राज्य प्रशासन ने उनके लिए बनाई हैं और गांव ज्ञान केन्द्रों की स्थापना करने में मदद करना, जहाँ गरीब लोग कृषि, स्वास्थ्य, पशुपालन, बागवानी, सरकारी कार्यक्रमों और सब्सिडी, आदि पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यह व्यापक दृष्टिकोण उस सतत विकास पाठ्यक्रम का हिस्सा है जिसे केंद्र की मूल संस्था, स्वामीनाथन फाउंडेशन ने तैयार किया है। जेआरडी केंद्र के निदेशक के बालसुब्रमण्यन कहते हैं "जिन ग्रामीण समुदायों के साथ हम कार्य करते हैं, वे शोध में हमारे सहयोगी हैं, न सिर्फ हमारे ज्ञान के उपयोगकर्ता। हम उनसे और वे हमसे सीखते हैं,"। "समय और श्रम गरीबों की एकमात्र संपत्ति हैं। हमारा प्रयास उन्हें ऐसे कौशल प्रदान करना है, जिन्हें इन संपत्तियों के साथ जोड़ा जा सके।"

परियोजनाओं का ऐसा कोई निश्चित गुलदस्ता और पहलों का ऐसा कोई निश्चित अनुक्रम नहीं है, जिसे जेआरडी केंद्र हर नई जगह जाने पर साथ लेकर जाता है। अतः एक गांव में माइक्रो-क्रेडिट संगठन, दूसरे में स्वयं सहायता समूह और तीसरे में साक्षरता परियोजनायें या संधारणीय खेती हो सकते हैं। लेकिन जेआरडी केंद्र के दृष्टिकोण के तीन अनिवार्य अंग हैं: जमीनी स्तर पर संस्थानों का निर्माण करना; जो किसी भी समस्या को हल कर सकें; क्षमताओं का निर्माण करना, ताकि लोग समझ सकें कि समाधान कहाँ उपलब्ध हैं; और माइक्रो क्रेडिट संघों और सूक्ष्म उद्यम शुरू करने में मदद करना, जो आजीविका के अवसरों की पूर्ति करें।

जेआरडी केंद्र के सतत विकास के मैट्रिक्स में छह चरण हैं: जुटाना, संगठन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, प्रणाली प्रबंधन, क्षमता निर्माण एवं निकासी हैं। इनमें से अंतिम अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस केंद्र का उद्देश्य खुद को बेमानी बनाना है, ताकि एक समयावधि के बाद वे लोग बोल सकें, जिन्होंने इसकी विशेषज्ञता से लाभ प्राप्त किया है। यह केंद्र के साथ एक अनुकूल विषय है, और यह संगठन के लिए, और, अधिक महत्वपूर्ण रूप से, जिन गांवों के साथ काम करता है उनके लिए, एक बड़ा बोनस है।

"काम का अकाल भोजन के अकाल का कारण बनता है," कहना है कुलपति श्री स्वामीनाथन का, जिनकी सोच ने इस केंद्र को आकार दिया। "आज की दुनिया को आशा के संदेश की आवश्यकता है। हमें चाहिए एक आशावान पारिस्थितिकी: एक 'डूम पारिस्थितिकी' की नहीं, बल्कि एक 'डू पारिस्थितिकी', यानी करने वाली पारिस्थितिकी की आवश्यकता है। यही वह स्थान है जहाँ इको-एंटरप्राइजेज और इकोटेक्नोलॉजी के लिए नया आंदोलन एक बहुत शक्तिशाली साधन बन गया है।"