आत्मा के साथ विज्ञान

भारतीय विज्ञान संस्थान ने देश को कई नोबल विजेता वैज्ञानिक दिए हैं, इसने बहुत से महान भारतीय वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया है और देश के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिक संस्थानों को संवारने में सहायता की है।

" किसी देश या समुदाय के सबसे कमजोर और सबसे असहाय सदस्यों की सहायता करने से उस देश या समुदाय की तरक्की नहीं होती, तरक्की होती है उसके सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली सदस्यों की सहायता करने से, ताकि उन्हें देश की सर्वश्रेष्ठ सेवा के लायक बनाया जा सके।" यही वह विचार था जिसने टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा को 19 वीं शताब्दी के अंत में उन्नत वैज्ञानिक शिक्षा एवं शोध हेतु एक ऐसे संस्थान की स्थापना के लिए प्रेरित किया जैसा तब इंग्लैंड में भी नहीं था।

जमशेदजी टाटा इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि राष्ट्र का पुनरुत्थान केवल बहु-स्तरीय औद्योगीकरण, उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक शोध के जरिए ही संभव है। भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के निदेशक गोवर्धन मेहता बताते हैं “वह एक ऐसे द्रष्टा (विजनरी) थे जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे उद्योगों की स्थापना की जो उस जमाने की तकनीक के लिहाज से अग्रणी थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी आधी निजी संपत्ति (बॉम्बे [अब मुंबई] में 14 भवन और चार भू-संपदाएं) इस संस्थान की स्थापना हेतु दान कर दी थी।”

देश के कई प्राधिकारों से संपर्क करने के बाद जमशेदजी टाटा ने संस्थान की स्थापना हेतु योजना तैयार करने के लिए एक अस्थायी समिति का गठन किया। 31 दिसंबर 1898 को इस समिति द्वारा तैयार किया गया एक मसौदा वॉयसरॉय लार्ड कर्जन के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसके बाद, भारत के सचिव के अनुरोध पर लंदन की रॉयल सोसाइटी ने नोबल पुरस्कार विजेता सर विलियम रैमसे से मदद मांगी। सर विलियम ने देश का त्वरित दौरा किया और इस संस्थान के लिए बंगलोर (अब बेंगलुरु) को सबसे उपयुक्त पाया।

दीवान सर के शेषाद्री अय्यर के प्रयास से मैसूर के महाराजा कृष्णराज वोदयार चतुर्थ की सरकार ने 372 एकड़ भूमि निःशुल्क प्रदान करने का प्रस्ताव रखा और अन्य हर संभव सहायता देने का भी आश्वासन दिया। इस प्रकार, भारत सरकार और महाराजा मैसूर के शामिल हो जाने से जमशेदजी टाटा की मूल योजना एक त्रिपक्षीय उपक्रम बन गई।

1911 में महाराजा मैसूर ने संस्थान की नींव रखी और उसी साल 24 जुलाई को जेनरल एंड अप्लाइड केमिस्ट्री, ऑर्गैनिक केमिस्ट्री विभाग तथा इलेक्ट्रो-टेक्नोलॉजी में छात्रों की पहली बैच का नामांकन हुआ। तब से, आईआईएससी शोध एवं उन्नत निर्देश की अग्रणी संस्था बन गई है जिसमें 2000 से भी अधिक सक्रिय शोधकर्मी विज्ञान और तकनीक के लगभग सभी सीमांत क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

पिछले दशकों के दौरान भारत की वैज्ञानिक एवं तकनीकी उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कई वैज्ञानिक जैसे नोबल विजेता सीवी रमन, होमी जहांगीर भाभा, विक्रम एस साराभाई, जेसी घोष, एम एस ठाकर, एस भगवंतम, सतीश धवन, सीएनआर राव तथा अन्य वैज्ञानिक इस संस्थान से संबद्ध रहे हैं।

आईआईएससी ने देश में अन्य प्रयोगशालाओं एवं वैज्ञानिक संस्थानों के निर्माण और संवर्धन में सहायता की है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च तथा परमाणु ऊर्जा आयोग का जन्म यहीं हुआ। सच तो यह है कि इस संस्थान के फैकल्टी का सदस्य रहते डॉ होमी भाभा ने इन दोनों संस्थानों की स्थापना का प्रस्ताव तैयार किया था। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का विकास भी यहीं हुआ। इसीने सीवी रमन को प्रकाश के प्रकीर्णन पर शोध करने का अवसर दिया जो अंततः 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार से नवाजे जाने का कारण बना।

डॉ मेहता कहते हैं, “जमशेदजी का नजरिया यह था कि संस्थान को लोगों के जीवन में बेहतरी लाने की आकांक्षा के प्रति समर्पित होना चाहिए। एक शताब्दी से आईआईएससी का यही प्रयास रहा है; मानवता और भारत के लोगों के लिए शोध के कार्यों में अग्रणी होना। यह कोई एक समय का काम नहीं, अपितु लगतार चलने वाली प्रक्रिया है।"

टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय जेआरडी टाटा की इस संस्थान में गहरी रुचि रही। उनका मानना था कि इसे केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि विज्ञान की समाज के लिए प्रासंगिकता को ध्यान में रखकर समग्र रूप से संपूर्ण समाज के कल्याण हेतु कार्य करना चाहिए। संस्थान के जन संपर्क अधिकारी एनवी राघवन कहते हैं, “वे कर्मचारियों का अच्छे से ध्यान रखते थे और उन्होंने टाटा मेमोरियल स्पोर्ट्स क्लब की स्थापना में भी मदद की जहां वे नियमित रूप से आया करते थे।"

जेआरडी ने भवन के रखरखाव और देखभाल पर भरपूर ध्यान दिया। टाटा संस के अध्यक्ष रतन टाटा ने विरासत को आगे बढ़ाया। हाल के दिनों में, उन्होंने सर दोराबजी टाटा सेंटर फॉर ट्रॉपिकल डिजीजेस को आगे बढ़ाने में सहयोग प्रदान किया और भवन के रखरखाव में सहायता दी।

विज्ञान और तकनीक की दुनिया में आईआईएससी की स्थापना से बड़े बदलाव आए। अपने लोगों को प्रशिक्षण देने और अपने शोध योगदानों के लिहाज से यह संस्थान अग्रणी रहा है और उन्हें भारत और विदेशों मे काफी मान्यता भी मिली है। “हमारे जैसे संस्थानों के योगदान का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने देश में विज्ञान और तकनीक को समृद्ध बनाने में कैसी भूमिका निभाई है,” डॉ मेहता कहते हैं। “हमने देश के राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रतिष्ठित मिशनों और परियोजनाओं में अपने वैज्ञानिक दिए है।”

संस्थान ने अगली शताब्दी के लिए अपने लक्ष्य परिभाषित करने के साथ ही अपने शताब्दी समारोह के कार्यक्रम आयोजित करने की दिशा में भी तैयारियां शुरू कर दी है। “मेरा सपना है इसे विज्ञान के एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान में बदल देने का,” डॉ मेहता कहते हैं। “मेरा मानना है कि हमने अपना यथासंभव श्रेष्ठ कार्य किया है और संस्थापक की सोच को कायम रखा है। उनकी आत्मा अब भी यहां मौजूद है।”

फैक्ट फाइल
डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में आईआईएससी बाहरी दुनिया के लिए ऐसी खिड़की की तरह काम करता है जिससे भारत में हो रहे विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में शोध की क्षमता का आकलन किया जा सकता है। यह बेंगलुरु में 375 एकड़ के प्रांगण में स्थापित है। इसमें 40 विभाग और केन्द्र हैं जो जिनमें विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक के सभी विभागों में शोध व अनुसंधान और शिक्षण कार्य किया जाता है। इसका पुस्तकालय विज्ञान और तकनीक को समर्पित है और देश का सबसे बड़ा पुस्तकालय है।

यह संस्थान अंतरिक्ष शोध, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन, बिजली परियोजनाओं, सिविल निर्माणों और पर्यावरण संबंधी योजनाओं में राष्ट्रीय सलाहकार की भी भूमिका निभाता है। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन तथा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के साथ मिलकर बहुत सी परियोजनाओं पर काम कर रहा है।