अप्रैल 2013 | सिन्थिआ रोड्रिग्स

कला संरक्षण को मिला बढ़ावा

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट द्वारा समर्थित एक कला संरक्षण परियोजना, भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को संभव बना रहा है, जिसमें पुनर्नवीकरण को प्रोत्साहित करते हुए, देशी संरक्षण विधियों का पुनःप्रवर्तन किया जा रहा है।

छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय (सीएसएमवीएस) के संग्रहालय कला संरक्षण केन्द्र (एमएसीसी) में एक निःशब्द क्रांति परवान चढ़ रही है। एमएसीसी भारत के प्रमुख विरासत-संरक्षण विभागों में से एक है। सीएसएमवीएस के महानिदेशक सब्यसाची मुखर्जी के मार्ग निर्देशन में एक परियोजना तैयार हो रही है जो भारत सरकार की राष्ट्रीय कला संरक्षण नीति को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) के मीडिया, कला एवं संस्कृति पोर्टफ़ोलियो द्वारा समर्थित एमएसीसी भारत में कला संरक्षण के पारंपरिक एवं समकालीन पद्धतियों को मजबूती देने के लिए प्रयासरत है। ‘कला संरक्षण पुनरुत्थान परियोजना’ एमएसीसी के कला संरक्षण, शोध एवं प्रशिक्षण के प्रमुख श्री अनुपम साह द्वारा परिकल्पित और डिज़ाइन किया गया है और इसमें एसडीटीटी का सहयोग प्राप्त है।

परियोजना के प्रथम चरण में कला-संरक्षण के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने की योजना है। इसके लिए देशभर के संग्रहालयों एवं संस्थाओं के स्टाफ़ को प्रशिक्षण दिया जाएगा, कला संरक्षण के विशिष्ट पहलुओं पर पुस्तकें प्रकाशित की जाएँगी और विधि, प्रणाली, प्रोटोकॉल निर्धारित किए जाएँगे और इसे वृत्तिजीवियों (प्रैक्टिशनर) से साझा किया जाएगा। — इस कार्य के लिए एसडीटीटी से 31 मिलियन रुपए का अनुदान प्राप्त होगा जो तीन वर्षों की अवधि — के दौरान दिया जाएगा।

न्यास उन संगठनों में से एक था जिसने चार वर्ष पूर्व एमएसीसी के गठन में मदद की। उस समय वह केन्द्र मुख्यत: एक आंतरिक संसाधन था जो संग्रहालय’ के अपने संग्रहों की देखभाल के लिए उद्यत हुआ। अन्य संस्थाओं की सहायता के लिए शोध एवं शैक्षिक खंडों को स्थापित करते हुए यह जैसे-जैसे आगे बढ़ा, यह कला-पुनरुद्धार के क्षेत्र में अपनी सामर्थ्य के लिए प्रतिष्ठित हुआ। एमएसीसी ने भारत’ की कला- पुनरुद्धार -पद्धति को भी समुन्नत बनाने की आवश्यकता महसूस की।

एसडीटीटी मीडिया, कला एवं संस्कृति अनुभाग की कार्यक्रम अधिकारी नियति मेहता कहती हैं कि “संरक्षण की पाश्चात्य विचारधारा पर काफ़ी निर्भर रहने के बावजूद न्यास ने पाया कि समकालीन पद्धतियों के बारे में जानकारी और समझ की कमी है।” “इसके साथ ही, पारंपरिक तरीकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था यही कारण है कि परियोजना में इसे प्राथमिकता प्रदान कर इस अंतर को दूर करने पर ध्यान केन्द्रित किया गया।”

‘ये निम्न अंतर हैं’
श्री साह ने बताया कि “क्षति के कारणों की तुच्छ समझ होने तथा भारतीय परिप्रेक्ष्य से संबंधित मॉडल और संदर्भ दस्तावेजों के नहीं होने के कारण भारत में कला-संग्रहों का ह्रास होता जा रहा है।” “हमने संरक्षण के लिए विश्व-स्तर पर काम में लाई जाने वाली पद्धतियों का सहारा लिया है किंतु जब चीजें समझ में नहीं आतीं या देखा-देखी की जाती हैं तो अंतर आ जाता है।”

उदाहरण-स्वरूप, यूरोप में लिखी गई किताबों में सुझाव मिल सकते हैं कि किसी संग्रह में पेंटिंग को सहेज कर रखने या प्रदर्शित करने के लिए 18-20º सेंटीग्रेड आदर्श तापमान है। किंतु भारत में इतना तापमान रखने से पेंटिंग को नुकसान पहुँच सकता है। “श्री साह बताते हैं कि जब हवा ठंडी हो जाती है तो उसमें आर्द्रता बरकरार नहीं रह पाती।” “जैसे ही वातानुकूलक बंद किया जाता है, भारत की आर्द्र जलवायु के कारण अक्सर संघनन हो जाता है।”

एमएसीसी परियोजना इस धारणा पर आधारित है कि लोगों को प्रशिक्षित करने और उन्हें संरक्षण में लगे रहने के साधन प्रदान कर ही हम अपनी विरासत का ध्यान रख सकते हैं। यह मानता है कि प्राचीन और समकालीन संरक्षण पद्धतियों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना भी अत्यंत आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए इसने क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध सूचनाओं को खोजना आरंभ किया, ऐसा जो संग्रहालयों के संरक्षकों और निजी संग्रहों के अभिरक्षकों की पहुँच के अंदर हो।

परियोजना के प्रथम चरण में विश्वभर में विकसित विविध उपचारात्मक संरक्षक उपायों का सर्वेक्षण और साहित्य का संकलन किया जाता है। यह टीम देशी प्रणाली पर भी शोध करती है और उस साहित्य को अंग्रेजी में अनूदित करती है ताकि इस बहुभाषी देश में सर्वत्र हमारी पहुंच सबको उपलब्ध हो। इस दिशा में यह प्रयास प्रथम सोपान है।

विश्वविद्यालयों में शिक्षा-दीक्षा और तकनीकी साहित्य मुख्यत: अंग्रेजी में होने के कारण देशीय भाषाओं की काफ़ी हानि हुई जो दुर्भाग्यपूर्ण है। “श्री साह कहते हैं कि” हजारों वर्ष की सभ्यता में हमारी कला-परंपराओं का विकास हुआ जिसमें प्रत्येक क्षेत्र की अपनी खास संस्कृति व भाषा थी और जो अपनी कलाओं के विकास और संरक्षण-पद्धतियों में समृद्ध था। किंतु उस ज्ञान का क्षरण हो चुका है और अब केवल मौलिक पद्धति का केवल लेश-मात्र ही बाकी रह गया है।

श्री साह आगे कहते हैं कि “कई तरह के रिवाज हैं जैसे कि प्रतिमाओं को दूध तथा मधु में स्नान कराना, परंतु उन वस्तुओं पर इनका प्रभाव सम्यक् रूप से ज्ञात नहीं है।” “ये वस्तुएँ सहस्राधिक वर्षों तक सुरक्षित रह गईं। इसका अर्थ है कि कुछ-न-कुछ तो सही तरीके से किया गया था। इस प्रायद्वीप में ज्ञान का अथाह भंडार मौजूद है — जिसकी संकल्पना, विचारधारा और पद्धति समृद्ध है और जिसमें पदार्थ, तकनीक और देशी कौशल सम्मिलित हैं।”

ज्ञान-संग्रहण
इन प्राचीन पद्धतियों से जुड़े ज्ञान को समृद्ध करने और उन्हें दस्तावेज की शक्ल देने के लिए ताकि इस ज्ञान का प्रसार हो, परियोजना में खास किस्म की कला-वस्तुओं पर ध्यान दिया गया जो सामान्य तौर पर देशभर में पाए जाते हैं और उनके रख-रखाव से संबंधित प्रणाली का अध्ययन किया गया।

चूँकि इसका आरंभ फरवरी 2012 में हुआ, कला संरक्षण पुनरुद्धार परियोजना ने निम्नलिखित प्रकार के कला-संग्रहों पर ध्यान केन्द्रित किया – तैलीय पेंटिंग, भित्ति-चित्र, पांडुलिपि, पाषाण व मृण्मूर्ति, वस्त्र, मृद्भांड, काँच, धातु, छाया-चित्र, वस्त्रों पर पेंटिंग और काष्ठ पर बहुवर्ण (पॉलीक्रोम)।

एमएसीसी की एक सहायक संरक्षक मंदिरा छाबरा कहती हैं - “साहित्य के सर्वेक्षण, क्षेत्र-कार्य और स्थानिक सहयोग से हमें जो प्राप्त हुआ उनका दस्तावेज बनाते समय क्षय के कारणों की पहचान को भी अभिलेखबद्ध किया जाएगा और विभिन्न प्रकार की कला-वस्तुओं के संरक्षण-उपचारों के तरीकों के संबंध में संस्तुति की जाएगी।”

जैसे-जैसे परियोजना आगे बढ़ी, भारत और विश्व की संस्थाओं ने इस पर ध्यान देना शुरू कर दिया। एमएसीसी की परियोजना-संयोजक निधि शाह कहती हैं: “कुछ व्यक्ति केवल सीमित प्रभाव डालेंगे; इसलिए हमने निर्णय लिया कि देशभर में सहयोगियों को जोड़ा जाए। हमने सोचा कि देश में कला-संरक्षण के लिए मानकों और प्रोटोकॉल के निर्माण के लिए इसे एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया जाए।”

कला-संरक्षकों के साथ-साथ, परियोजना में कई सरकारी और निजी संग्रहों और संस्थाओं, यथा – ग्रंथागार (पुस्तकालय), मठ, (विहार), विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थाएँ और संगठन यथा - भारतीय रेल और भारतीय सेना का भी ध्यान में रखा गया है।

सांस्थानिक सहायता
इसका लक्ष्य दस्तावेजों को तैयार करने में सहयोग प्रदान करने का है। एमएसीसी ने पहले ही आठ राज्यों की संस्थाओं के साथ करार कर रखा है जिसमें लेह के पास बास्गो वेलफेयर सोसाइटी, दिल्ली में नेशनल म्यूज़ियम इंस्टिट्यूट, हैदराबाद में सालार जंग म्यूज़ियम, इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्टस, अहमदाबाद में इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, हिमालयन सोसाइटी फॉर हेरिटेज तथा आर्ट कंन्जर्वेशन तथा विभिन्न अकादमिक संस्थाएं शामिल हैं। इन केन्द्रों को उनके राज्यों में परियोजना के केन्द्रों के रूप में विकसित करना है।

टीम कोर मेडिकल निर्देशिका के रूप में काम कर रही है जो कला वस्तुओं को हो रही क्षति के प्रकारों तथा सीमा का आंकलन करने में सहायता करेगी। यह जलवायु संबंधी परिस्थितियों तथा विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के प्रभाव का वर्णन करेगी। यह भारत के चुनिंदा शहरों में पर्यावरण प्रदूषण स्तरों को बताएगा तथा इस बात का विवरण प्रदान करेगी कि किस प्रकार से लोग अपने प्रदर्शन मामले में प्रदूषण के स्तरों का परीक्षण कर सकते हैं। इसमें लिए जा सकने वाले आपातकालीन उपचारों की सूची भी शामिल होगी।

यह निर्देशिका संरक्षण के व्यवहारिक विवरणों पर सुझाव प्रस्तुत करेगा, जैसे कि विभिन्न प्रकार की पेंटिंग के लिए उपयोग किए जाने वाले फ्रेम के प्रकार, इन फ्रेमों की माउंटिंग, उपलब्ध कैनवासों के प्रकार तथा अन्य। यह निदान संबंधी औजारों के उपयोग पर इनपुट भी प्रदान करेगा — उदाहरण के लिए, पराबैगनी प्रकाश — जिससे वस्तु को हुई क्षति का आंकलन हो सके।

एमएसीसी को विभिन्न विशेषज्ञता वाली इकाइयों के माध्यम से विशिष्ट फोकस के लिए गठित किया गया है। तकनीकी विश्लेषण इकाई तथा शोध व विकास इकाई प्रयासों के केन्द्र में हैं। जबकि पहला वाला अपनी कला वस्तुओं की विशेषज्ञता के साथ (पराबैंगनी प्रतिदीप्ति, माइक्रोसेकोपी, स्पेक्ट्रोस्कोपी तथा एक्स-रे जैसे औज़ारों का उपयोग करते हुए आधुनिक तकनीकों के माध्यम से) सीएमएमवीएस का तथा साथ ही अन्य संस्थानों का समर्थन करता है, बाद वाला विभिन्न संरक्षण तकनीकों तथा मॉडलों का अध्ययन करने के लिए बाहरी एजेंसियों के साथ काम करता है। क्षतियों को रोकने के उपाय के रूप में क्षतिग्रस्त कला वस्तुओं के लिए उपचार प्रोटोकॉल प्रस्तावित करने के लिए संरक्षण तथा बहाली इकाई उत्तरदायी है।

तकनीकि समर्थन
तकनीकि समर्थन इकाई यह सुनिश्चित करने में सहायता करती है कि सीएसएमवीएस में स्थित कला वस्तुएं (जब कहीं और प्रदर्शनी के लिए वापसी के आधार पर गयी हों) उपयुक्त तरीके से व्यवस्थित की जाती हैं। यह इकाई प्रस्तावित अधिग्रहणों का मूल्यांकन करने में सहायता करती है तथा संग्रहालय के भीतर वांछनीय वातावरण पर तथा आवश्यक अपग्रेड पर सलाह प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त दस्तावेज़ीकरण तथा शिक्षा इकाइयां भी हैं तथा साथ ही संरक्षण स्थिति रिपोर्ट करने वाली इकाइयां भी है।

परियोजना का उद्देश्य दस्तावेज़ीकरण, शोध, शिक्षा तथा प्रशिक्षण के माध्यम से भारत में संरक्षण के अभ्यास को मजबूती प्रदान करना है। श्री शाह मानते हैं कि परियोजना सांस्कृतिक विरासत इमारतों के पेशेवरों तथा रखवालों की संरक्षण के पेशेवर मानकों तथा विविधतापूर्ण भारतीय वातावरण तथा संदर्भों में विभिन्न उपचारों के लाभों सं संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सहायता कर सकती है। यह भारत के संरक्षकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत’को सफलतापूर्वक लंबी उम्र देने में सहायक हो सकती है।

श्री शाह कहते हैं, “पुनरुत्थान परियोजना जमीन पर काम कर रही परियोजना है जिसके भारत तथा पूरी दुनिया की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए बेहद सकारात्मक निहितार्थ हैं।”

उपयोगकर्ता-केन्द्रित शोध
वह टीम जो ‘कला संरक्षण पुनरुत्थान परियोजना’ पर काम कर रही है, वह ऐसे शोध कार्यक्रमों पर काम कर रही है जो व्यवहारिक मामलों को संबोधित करते हैं जैसे कि कला संरक्षण में लेज़रो का उपयोग, पिग्मेंटों के संग्रहों तथा अन्य कला सामग्रियों की तैयारी, संरक्षण में विलायकों का उपयोग, कला वस्तुओं पर माइक्रोबायोलॉजिक वृद्धि की पहचान तथा वे गैसीय प्रदूषक जो संग्रहालय के संग्रहों को प्रभावित करते हैं। अन्य पहलों में कला वस्तुओं के अध्ययन के लिए विश्लेषणात्मक सुविधाओं की स्थापना तथा संरक्षण सुविधा में स्वास्थ्य तथा सुरक्षा आदि।

परियोजना ने अभी तक पाँच क्षेत्रों में शोध किया है:

  1. भारत में शिल्पकृतियों को माइक्रोबायल आक्रमणों से सुरक्षित करने के समाधानों की खोज।
  2. प्राचीन भारतीय शिल्पकृतियों से रंगहीन हो गयी वार्निशों को हटाने व घोलने के लिए उपयुक्त विलायकों की पहचान।
  3. विरासत वाले स्थलों पर चमगादड़ों के कारण लगे धब्बों को हटाना।
  4. भारतीय संदर्भों में कला संरक्षण में लेज़र के उपयोग।
  5. भारतीय कला में उपयोग किए गए प्राचीन पिग्मेंटों के डाटाबेस का निर्माण।

इन शोध परियोजनाओं से मिला सीख के माध्यम से विभिन्न संरक्षण-संबंधी गतिविधियों के लिए केस स्टडी करने व प्रोटोकॉल का विकास करने में सहायता मिलेगी, इन केस स्टडी में नाजुक वस्तुओं के परिवहन का सर्वश्रेष्ठ मार्ग, विष-मुक्त कार्य वातावरण के निर्माण के तरीके तथा अपशिष्ट को सुरक्षित व उत्तरदायी तरीके से निबटाने के तरीके शामिल हैं।

सभी खोजें व परिणामी दस्तावेज़ीकरण मुफ्त में ऑन-लाइन विस्तृत रूप से उपलब्ध होगें तथा साथ ही प्रदर्शनियों तथा विभिन्न संपर्क माध्यमों तथा वितरण चैनलों द्वारा प्रस्तुत पुस्तकों के माध्यम से भी उपलब्ध होंगे।