मार्च 2017

निवास की सुरक्षा करना

विश्व वन्यजीव फंड का आंकलन है कि कम से कम 10,000 प्रजातियां हर वर्ष विलुप्त हो रही हैं, जिसका अर्थ है कि हर रोज 27 प्रजातियां इस ग्रह से कम हो रही हैं। टाटा समूह की कंपनियां इस लहर को पलटने के अपने प्रयास कर रही हैं, जिसके लिए 'जोखिम वाली' प्रजातियों को निवास देने और बचाने का काम कर रही हैं

  • व्हेल शार्क, टाटा केमिकल्स, गुजरात, भारत

    60 तब लंबी होने वाली प्रभावशाली व्हेल शार्क इस ग्रह का सबसे विशाल जीव है। कभी अपने तेल और मांस के लिए शिकार होने वाला गुजरात तट का यह प्राणी वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया तथा गुजरात राज्य वनविभाग एवं टाटा केमिकल्स की सहभागिता में 2004 में शुरू किया गया कार्यक्रम ‘व्हेल शार्क बचाओ’ अभियान द्वारा संरक्षित है। इस मछली को वाह्ली, यानी प्रियजन का देकर इस अभियान को भावनात्मक रंग दिया गया है और यह इस तरह है जैसे कोई अनोखी बेटी अपने मूल स्थान पर वापस लौटती है। आज की तारीख तक 585 व्हेल शार्कों को बचाकर उन्हें उनके जलीय अधिवास में छोड़ा गया है।

  • जलमुर्गी, टाटा केमिकल्स, गुजरात, भारत

    ओखामंडल, गुजरात स्थित टाटा केमिकल्स के चरकला साल्टवर्क्स को अपना घर बनाने वाली सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों के कलरव से वायुमंडल गुंजायमान हो जाता है। वाटरफाउल (मुर्गाबी/जलपक्षी) को घोंसला बनाने के लिए आर्द्रभूमि की आवश्यकता होती है और चरकला साल्टवर्क्स भारत में कैस्पियन टर्न नामक पक्षियों का एकमात्र सक्रिय नेस्टिंग साइट (घोंसला निर्माण स्थल) है। ये पक्षी यहां पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से यहां नियमित रूप से अपना बसेरा डालते हैं। आंशिक रूप से साल्टवर्क (नमक निर्माण केंद्र) और आंशिक रूप से पक्षी अभयारण्य, चरकला एक ऐसी सफलता गाथा है जिसे अन्य संकटग्रस्त पर्यावासों में दुहराया जा सकता है।

  • ग्रेटर सेज-ग्राउस, टाटा केमिकल्स नॉर्थ अमेरिका, व्योमिंग, यूएसए

    व्योमिंग के ग्रेटर सेज-ग्राउस जो अपने आहार और बसेरे के लिए सेजब्रूस हैबिटेट (पर्यावास) पर निर्भर करते हैं, कभी लुप्त होने के कगार पर थे। टाटा केमिकल्स नॉर्थ अमेरिका की ग्रीन रिवर, व्योमिंग स्थित प्रॉसेसिंग केंद्र सेज-ग्राउस के प्रजनन क्षेत्रों के निकट स्थित है। कंपनी की इंनीनियरिंग टीम ने अत्याधुनिक वेंटिलेशन फैनों तथा खनन तकनीक के इस्तेमाल से स्थानीय पर्यावरण के ऊपर विनिर्माण व्यवसाय के प्रभाव को कम करने में सफलता पाई जिससे एक व्यावहारिक और धारणीय समाधान प्राप्त हुआ।

  • गोल्डेन महसीर, टाटा पावर, लोनावला, भारत

    45 वर्षों से टाटा पावर मीठे पानी की संकटग्रस्त मछली प्रजाति महसीर की रक्षा के लिए प्रयास करते रहे हैं जिसमें प्रसिद्ध हिमालयन गोल्डेन महसीर भी शामिल हैं। यह भारत में सबसे विशाल संरक्षण प्रयासों में से एक हैं। मुंबई के पास वल्वहान, लोनावला स्थित अत्याधुनिक हैचरी में एक बार में 5,00,000 अंडों को सेने की क्षमता है। पिछले 40 साल में 70 लाख से अधिक महसीर मछली के बच्चे (जीरे) का उत्पादन कर उन्हें संपूर्ण भारत के जल स्रोतों में छोड़ा गया।

  • कैरिबो, टाटा स्टील मिनरल्स कनाडा

    कनाडा में प्रवासी कैरिबू पारिस्थितिकी का एक मूलभूत हिस्सा है। टाटा स्टील मिनरल्स कनाडा (टीएसएमसी) कैरिबू उंगावा रिसर्च प्रॉजेक्ट में सहयोग करते हैं जिसे क्यूबेक-लैब्राडोर प्रायद्वीप में 2015 में शुरू किया गया था। रेडियो कॉलर्स, एरियल सर्वे तथा एडवांस्ड मॉडलिंग तकनीकों के जरिए यह प्रॉजेक्ट इन बातों का परीक्षण करता है कि कैसे जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक विकास, शिकार आदि से कैरिबू की तादाद पर असर पड़ता है। टीएसएमसी एक आर्कटिकनेट (ArcticNet) को भी सहयोग देता है जो उत्तरी अमेरिका और यूरोप में कैरोबू की संख्या का अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण है।

  • ऑलिव रिडले कछुआ, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस, महाराष्ट्र, भारत

    समुद्री कछुआ दुनिया समुद्री स्वास्थ्य को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गैर-लाभकारी सह्याद्री निसर्ग मित्र के साथ मिलकर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस ने 2010 से समुद्री कछुआ संरक्षण कार्यक्रम चला रखे हैं जिसका उद्देश्य है समुद्री तटों पर कछुआ प्रजनन स्थलों की रक्षा करना। सैकड़ों ऑलिव रिडले कछुआ के बसेरों को बचाया गया है, 12,000 से अधिक अंडों को सफलतापूर्वक हैचरी में हस्तांतरित किया गया है और 6,000 हैचलिंग को सफलतापूर्वक उनके प्राकृतिक पर्यावास में छोड़ा गया।

  • रेड पांडा, सिक्किम और आंध्र प्रदेश में टाटा कैपिटल तथा टाटा हाउसिंग, भारत

    हिमालय में रेड पांडा के अब तक के प्रथम वैज्ञानिक आकलन से यह निष्कर्ष निकला कि पिछले आकलन की तुलना में इसके वास्तविक अधिवास में 60 प्रतिशत की कमी आई है। टाटा हाउसिंग और टाटा कैपिटल वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड इंडिया के साथ मिलकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के रेडा पांडा के अधिवास क्षेत्र में विशिष्ट रेड पांडा के संरक्षण तथा रेड पांडा संरक्षण एवं जैवविविधता परिरक्षण की दिशा में राज्य की नीतियों को प्रभावित करने के लिए काम कर रहे हैं।

  • हिम तेंदुआ, टाटा हाउसिंग, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, भारत

    दुनिया के एक सबसे विड़ाल प्रजाति हिम तेंदुआ एक मात्र व्याघ्र श्रेणी का ऐसा एकमात्र प्राणी है जो उच्च पर्वतीय इलाके में पाया जाता है। Iपिछले दो दशकों में इसकी वैश्विक आबादी में एक तिहाई की कमी आई है और यह 4,500 रह गई–जबकि पहले यह संख्या 7,500 थी। भारत में 500 की संख्या में हिम तेंदुए हैं जो जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश पर फैले हैं। जनवरी 2014 से वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड इंडिया के साथ मिलकर टाटा हाउसिंग ‘सेव अवर स्नो लेपर्ड’ प्रॉजेक्ट का अंग रहे हैं।

  • एक सींग वाला गैंडा, टाटा कैपिटल, असम, भारत

    विशालकाय एक सींग वाला गैंडा भारत की एक विशिष्ट वन्य जंतु प्रजाति है। अपनी सींग के लिए शिकार होने वाली यह प्रजाति अब नेपाल और भारत के अलावा हर अन्य इलाकों से लुप्त हो चुकी है। टाटा कैपिटल और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड को उम्मीद है कि वन-से-वन में होने वाले स्थानांतरण के जरिए असम के और भी अधिक इलाकों में एक-सिंगी गैंडा के वितरण में इजाफा होगी जिससे इसके दीर्घकालीन उत्तरजीविता सुरक्षित करने में मदद मिलेगी। एक नए सुरक्षित क्षेत्र लाओखोवा बुराचापोरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी को इस प्रयास के लिए तैयार किया जा रहा है।

  • ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल, टाटा कॉफी, कर्नाटक, भारत

    अपनी काफी बड़ी चोंच और रंगबिरंगे पंखों के लिए प्रसिद्ध ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल एक अत्यंत ही खूबसूरत चिड़िया है। यह संकटग्रस्त भी है। अपने प्लांटेशन क्षेत्र में में हॉर्नबिल के बसेरे वाले पेड़ों के मद्देनजर टाटा कॉफी ने इस पक्षी के संरक्षण और बचाव के कार्यों के लिए खुद को समर्पित कर लिया। कंपनी ने टाटा कॉफी हॉर्नबिल फाउण्डेशन की स्थापना की है जिसका उद्देश्य है इस पक्षी के अनोखे प्रजनन विज्ञान, बीजों के प्रकीर्णन में इनकी भूमिका और इनके मौसमी आवागमन के विन्यास तथा बसेरा व्यवहार का अध्ययन करना।

  • टाटा स्टील जूलॉजिकल पार्क (प्राणी उद्यान), टाटा स्टील, जमशेदपुर, भारत

    टाटा स्टील जूलॉजिकल पार्क (प्राणी उद्यान), जमशेदपुर के अंतर्गत 37 हेक्टेयर वन आच्छादित एवं प्राणियों से भरा क्षेत्र आता है जो जानवरों, पक्षियों, सरीसृपों तथा जलचरों के लिए एक सुरक्षित स्वर्ग है। 1991 में स्थापित यह प्राणी उद्यान अनेक प्रकार के जानवरों का अभयारण्य है जिनमें शामिल हैं अफ्रीकी शेर, बंगाल टाइगर, भालू और दरियाई घोड़ा शामिल हैं। संरक्षण और कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम इस उद्यान का लक्ष्य है। इस हरित आच्छादित भूमि में लगभग 35 प्रजातियों के पक्षियों का बसेरा है।

अधिक जानकारी के लिए जनवरी 2017 के टाटा रिव्यू के संस्करण को देखें।