मार्च 2017 | नम्रता नरसिम्हन

‘संस्कृति का क्षय किसी भी समाज के लिए सबसे बड़ी हानि होती है’

भारत के पूर्वी हिस्से झारखंड और उड़ीसा के जनजाती इलाकों में टाटा स्टील के विनिर्माण संयंत्र एवं खनन परिचालन कंपनी के व्यवसाय के केंद्र में हैं। यह क्षेत्र अनेक जनजातीय समुदायों का का निवास स्थल है जिनमें प्रमुख हैं हो, संथाल, मुंडा तथा ओरांव जनजाति। आदिवासी जनसंख्या की पहचान को बचाने और संरक्षित रखने के लिए, कंपनी ने ट्राइबल कल्चरल सोसाइटी और ट्राइबल कल्चर सेंटर की स्थापना की है और समग्र कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व कार्यक्रम लॉन्च किया है जिससे समुदायों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक लाभ पहुंचा है। बीरेन भूटा, टाटा स्टील के चीफ सीएसआर आदिवासी संस्कृति को बचाने और प्रोत्साहित करने के लिए कंपनी की उत्प्रेरक भूमिका का वर्णन करते हैं। कुछ अंश:

टाटा स्टील के जनजातीय प्रयास कैसे सफल होते हैं?
टाटा स्टील को ऐसे भौगिलिक क्षेत्रों में मौजूद होने का सौभाग्य प्राप्त है जहां की जनसंख्या मुख्यतः जनजातीय है; अन्य कंपनियों को ऐसा अवसर नहीं मिला है। झारखंड में, हमारी उपस्थिति चार प्रमुख जनजातीय क्षेत्रों में है। झारखंड और उड़ीसा में जनजातीय समुदायों के साथ काम करने का अर्थ है हम उन्हें थोड़ा-थोड़ा जानने का दावा भी कर सकते हैं।

जनजातीय समुदायों के लिए किए जाने वाले विभिन्न प्रयासों का विचार कहां से आया?
हमने पाया कि जनजातीय समुदायों में सम्मिलित स्वर का अभाव है। वे बिखरे हुए हैं उनमें से कई जंगलों या जंगलों की सीमा पर रहते हैं। इन जनजातीय समुदायों के लोग अत्यंत स्वाभिमानी और स्वतंत्र लोग होते हैं। मुझे लगता है उनके पास वास्तविक अमूर्त मूल्य होते हैं, न केवल उनके अपने समुदाय के लिए बल्कि समग्र रूप से सभ्यता और मानवता के लिए भी।

कुछ मुझे अतिवादी कह सकते हैं, लेकिन मैं कहता हूं: ‘यदि आप दुनिया को बचाना चाहते हैं तो आदिवासी (जनजातीय समुदाय के लोग) को बचाएं।’वे धारणीयता के अंतिम गढ़ हैं; वे इसके संरक्षक हैं। धारणीयता पर हम फैशन के रूप में बात करते हैं, लेकिन ये लोग तो कुदरती रूप से धारणीय हैं। वे जब शिकार करते हैं तब भी वे केवल अपनी जरूरत भर के लिए करते हैं, यही तो जरूरत-आधारित अर्थव्यवस्था और लालच-आधारित अर्थव्यवस्था का फर्क है।

सांस्कृतिक क्षति एक अमूर्त चीज है, और अमूर्त को समझना हमेशा अधिक मुश्किल होता है। हमने एक मंच तैयार किया है जहां इन सभी अमूर्तनों का साझा किया जाता है, उन्हें संरक्षित और प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जाते हैं।

बहुत से लोग सोचते हैं कि जनजातीय संस्कृति गीतों और नृत्य तक सीमित है, जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है। उनके लिए, यह जीवन शैली है। आप देखते हैं कि हर आदमी नृत्य करता है; उस नृत्य में कोई नायक नहीं होता। यहां हम एक समतामूलक समाज देखते हैं।

क्या आप हमें आपकी टीम द्वारा किए जाने वाले कार्यों की जानकारी दे सकते हैं?
हमारा बहुत सारा काम जनजातीय शिक्षा के इर्द-गिर्द होता है; उनकी भाषा, उनकी लिपि और साहित्य के इर्द-गिर्द होता है; उनके वाद्ययंत्रों, नृत्य, खेलो, रिवाजों और धार्मिक प्रतीकों तथा उनके नायकों पर केंद्रित होता है। संक्षेप में कहें, तो हम जनजातीय पहचान पर काम करते हैं।

टाटा स्टील द्वारा जनजातीय संस्कृति की रक्षा के लिए किए जाने वाले कार्यों के बारे में पढ़ें

पहचान महत्वपूर्ण है; इसे खोकर आदमी एक व्यापारिक माल बन जाता है। पहचान का क्षय संस्कृति का क्षय है जो किसी भी समाज के लिए सबसे बड़ी हानि होती है। व्यक्ति धन गंवा सकता है, बेघर हो सकता है, कुछ भी बन सकता है लेकिन यदि संस्कृति खो जाए तो उसका सबकुछ खो जाता है।

हमारा विश्वास है कि यदि आप पहचान बचाना चाहते हैं तो भाषा अति महत्वपूर्ण है। कई जनजातीय भाषाओं की कोई लिपि नहीं होती, वे बस मौखिक परंपराएं होती हैं। वे हजारों सालों से चली आ रही हैं लेकिन भूमंडलीकरण के आक्रमण के कारण अगले 10-20 साल उनके अस्तित्व पर भारी पड़ सकते हैं। भाषा का लुप्त हो जाना एक बात है, लेकिन उस भाषा में निहित ज्ञान का चला जाना भयानक क्षति है।

भविष्य की राह आप किस तरह देखते हैं?
आगे की राह इस बात में निहित है कि समुदायों द्वारा इन प्रयासों को अपनाया जाए, हम तो बस उत्प्रेरक हैं। भारत ही नहीं, दुनिया भर के कुछ कॉरपोरेटों में से हम भी एक हैं जो जनजातीय संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के लिए काम करते हैं।

यह लेख टाटा रिव्यू के जनवरी-मार्च 2017 के संस्करण में पहली बार प्रकाशित हुआ था। ईबुक यहां पर पढ़ें