अप्रैल 2017

कला का भविष्य के लिए संरक्षण

टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संगठन, भविष्य की पीढ़ियों के लिए कला और संस्कृति के संरक्षण को सुनिश्चित करते हैं

पारंपरिक कलाओं और शिल्पों के संरक्षण, स्थापत्य शोपीसों की पुनर्स्थापना और संस्थानों व संगीत के रूपों के पुनरुद्धार के क्षेत्रों में टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी की पहलें यह सुनिश्चित करती हैं कि उपेक्षा और उदासीनता के कारण कला व संस्कृति का जादू अगली पीढ़ी के लिए खो ना जाए।

  • जनजातीय रुझान, टाटा स्टील, झारखंड और उड़ीसा, भारत

    टाटा स्टील द्वारा 1993 में स्थापित ट्राइबल कल्चर सोसाइटी पूर्वी भारत में टाटा परिचालन केंद्रों के आस-पास के अनेक जनजातीय समुदायों की परंपराओं एवं लोक परंपराओं के पुनरुद्धार व संरक्षण के लिए काम करती है। सोसाइटी के प्रयास भाषा, संगीत और खेल के संदर्भ में जनजातीय संस्कृतियों के संरक्षण के लिए होते हैं और साथ ही ये प्रयास जनजातीय लोगों के लिए जीविका के अवसरों का भी सृजन करते हैं। कंपनी द्वारा एक ट्राइबल कल्चर सेंटर (जनजातीय संस्कृति केंद्र) को सहयोग दिया जाता है जो जनजातीय हस्तशिल्प एवं जीवनशैली उत्पादों को बढ़ावा देता है और यह ‘संवाद’ का प्रायोजन करता है जो संपूर्ण भारत के जनजातीय समुदायों का वार्षिक सम्मेलन है।

  • विरासत में इतिहास, टाटा ट्रस्ट, दिल्ली, हैदराबाद, मणिपाल, सभी भारत में

    ऐतिहासिक स्मारकों एवं स्थलों का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन के कार्यों में मदद टाटा ट्रस्ट द्वारा निरंतर किए जाने वाले कार्यों में सम्मिलित हैं। अपने संरक्षण कार्यक्रम के तहत, यह स्मारकों तथा अन्य ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा और संरक्षण में सहयोग उपलब्ध कराते हैं और देश की सांस्कृतिक विरासतों से लोगों के जुड़ाव को पुख्ता करते हैं। इस प्रकार के सहयोग के तहत दिल्ली में मुगल बादशाह हमायूं के 16वीं सदी के मकबरे का जीर्णोद्धार, हैदराबाद में कुतुबशाही हेरिटेज पार्क तथा मणिपाल हेरिटेज विलेज का निर्माण हुआ है।

  • परंपरा के स्वर, टाटा ट्रस्ट, अहमदाबाद और कच्छ, भारत

    संगीत भारतीय सांस्कृतिक विरासत का आधार स्तंभ है तथा पारंपरिक अभिनय कलाएं भारतीय लोकपरंपरा का महत्वपूर्ण अंग रही हैं। नई मीडिया एवं लोक मानस में मनोरंजन के नए स्वरूपों के व्यापक प्रचलन के कारण लोकप्रियता एवं संरक्षण के संदर्भ में इन लोक कलाओं को नुकसान पहुंचा है। टाटा ट्रस्ट का परफॉर्मिंग आर्ट्स प्रोग्राम पारंपरिक संगीत विधाओं, नृत्य एवं नाटक के क्षेत्र में कलाकारों की मदद करता है। उदाहरण के लिए, कच्छ क्षेत्र की संगीत परंपराओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास तथा गुजरात के अहमदाबाद में सप्तक स्कूल ऑफ म्यूजिक को सहायता।

  • अथक प्रयास, टाटा ट्रस्ट, चेन्नई तथा कोलकाता, भारत

    सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण दस्तावेजों एवं पांडुलिपियों का संरक्षण और रखरखाव टाटा ट्रस्ट के संरक्षण योजना का ऐसा अंग है जिसके बारे में लोक कम ही जानते हैं। भारत के संदर्भ में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसा देश है जिसकी लिखित विवरणों को समुचित रूप से संरक्षित रखने की कम रुचि रही है। यह वास्तविकता, हालांकि, आधिकारिक एजेंसियों और टाटा ट्रस्ट जैसे निकायों के प्रयासों के बदौलत अब बदल रही है जो साथ मिलकर युगों पुराने पाठों और आलेखों के संरक्षण के लिए काम करते हैं। इस संदर्भ में ट्रस्ट के प्रयासों में शामिल हैं कोलकाता के जाधवपुर विश्वविद्यालय में रिसर्च संसाधनों का डिजिटलीकरण; ‘मेवाड़ पांडुलिपि प्रायोगिक संरक्षण प्रॉजेक्ट’ जिसके तहत हिंदू महाकाव्य रामायण की17वीं सदी की पांडुलिपि का पुनरोद्धार किया गया; तथा चेन्नई के रोजा मुथैया रिसर्च लाइब्रेरी की सामग्रियों का डिजिटलीकरण जिसमें 3,00,000 की संख्या में तमिल पुस्तकें, जर्नल और समाचारपत्र हैं।

  • थिएटर ऑफ स्किल, टाइटन कंपनी, तमिल नाडु एवं कोलकाता, भारत

    टाइटन कंपनी ने अपने शुरुआती काल से ही विभिन्न क्षेत्रों में सुविचारित प्रयासों के जरिए सार्थक तरीकों से समुदाय के साथ जुड़ने के प्रयास करते रहे हैं। संरक्षण के क्षेत्र में, यह तमिलनाडु में धर्मपुरी जिले की हाथ से की जाने वाली पारंपरिक कसीदाकारी की परंपरा को पुनर्जीवित करने में तथा एक कार्यक्रम के जरिए कर्नाटक में रंगमंच कला के संवर्धन में मदद करता रहा है। धर्मपुरी प्रॉजेक्ट के तहत, हाथ से की जाने वाली बारीक कसीदाकारी के संवर्धन के लिए ‘दस्तकार संगठन के जरिए’ ग्रामीण महिलाओं को प्रोत्साहन प्रदान किया गया है। रंग शंकरा नामक थिएटर प्रयास का उद्देश्य है अनेक प्रकार की विधियों एवं कार्यक्रमों के जरिए युवाओं में कला रूप के प्रसार में मदद करना।

  • भविष्य का गठन, टाटा ट्रस्ट, संपूर्ण भारत में

    कृषि के बाद हस्तशिल्प क्षेत्र भारत में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है जिससे 70 लाख से भी अधिक परिवारों को रोजगार मिलता है। इन परिवारों का भविष्य अंधकारमय है, क्योंकि आज इनके समक्ष ग्राहक पाने तथा उच्च गुणवत्तायुक्त, बाजार चालित एवं विविध उत्पादों के अभाव की समस्या है। टाटा ट्रस्ट का हस्तशिल्प आधारित जीविका कार्यक्रम निस्तेज पड़ते शिल्पों को पुनर्जीवित करते हुए तथा पायलट डिजायन प्रॉजेक्ट, क्वालिटी कंट्रोल, तकनीकी के इस्तेमाल और दस्तकारों को घरेलू एवं निर्यात बाजारों से जोड़ते हुए इन समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करता है। पायलट मॉडलों से जो जानकारी मिलती है उसका इस्तेमाल शिल्प डिजायन एवं इनोवेशन केंद्रों की स्थापना में किया जाएगा जिनसे दस्तकार समुदायों को अनेक आवश्यक चीजें प्राप्त होंगी।

  • भविष्य का निर्माण, टाटा ट्रस्ट, संपूर्ण भारत

    दक्षिण उड़ीसा के डोकरा संकुल में जनजातीय समुदायों को टाटा ट्रस्ट द्वारा दी जाने वाली सहायता आय सृजन से जोड़कर दस्तकारी की परंपरा को पुनर्जीवित करने के दृष्टिकोण का उदाहरण है। यहां एक उद्देश्य है इन समुदायों को उनके मानसिक शिल्प कौशल में आवश्यक सहायता हेतु मार्केटिंग एवं डिजायन क्षमताओं से लैस करना। डोकरा के दस्तकार सुदूर इलाकों में रहते हैं। बाजार से उनकी दूरी उन्हें व्यापारियों पर अनावश्यक रूप से निर्भर बनाता है, उनके मोलाभाव की क्षमता को कमजोर करता है जिससे वे पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल से दूर हटने लगते हैं। बाजार के साथ समग्र जुड़ाव, डिजायन क्षमताओं, प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहायता के जरिए टाटा ट्रस्ट इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। महत्वपूर्ण रूप से, लक्ष्य है दीर्घकालीन रूप से कार्यक्रम को आत्म-धारणीय बनाना।

  • संगीत एक संजीवनी, टाटा कैपिटल, भारत

    टाटा कैपिटल ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को मुख्यधारा में लाने के लिए सहायता हेतु प्रयास किए हैं। कंपनी के ‘डू राइट’ प्रयास के अंग के रूप में यह कदम संगीतकारों एवं संगीत परंपराओं की मदद करता है। इस कार्यक्रम के तहत, स्थापित तथा उदीयमान संगीतकारों को अपनी प्रतिभा से संसार को परिचित कराने हेतु एक मंच उपलब्ध कराया जाता है। इस कार्यक्रम के अंग रहे विख्यात कलाकारों में शुमार हैं- उस्ताद जाकिर हुसैन, उस्ताद अमजद अली खान, श्री विक्कू विनायक्रम, श्री शंकर महादेवन तथा श्री शिवकुमार शर्मा एवं उनके पुत्र श्री राहुल।

  • समय की बुनावट (‘अ वीव इन टाइम’), टाटा ट्रस्ट, मध्य प्रदेश, भारत

    1995-96 में भारत के हैंडलूम (हस्त करघा) क्षेत्र में 65 लाख लोग बुनकरी एवं अन्य संबद्ध कामों में संलग्न थे। यह संख्या 2009-10 में घटकर 43 लाख हो गई, जो एक चिंताजनक और दुखद पलायन है। टाटा ट्रस्ट के सहयोग से चलने वाले महेश्वर (मध्यप्रदेश के खारगोन जिले में) का हैंडलूम स्कूल देश में हैंडलूम बुनकरों को अपना पेशा छोड़कर मामूली कामों में लगने की प्रवृत्ति को रोकने का एक प्रयास है, ताकि हस्तकरघे की समृद्ध एवं विशिष्ट परंपरा को क्षरण से बचाया जा सके। यह स्कूल युवा बुनकरों के लिए एक उद्यमिता पालना की तरह है जो भारत में अपने किस्म का अनूठा है। यह युवाओं को डिजायन, मार्केटिंग और वित्त एवं बुनकरी में कौशल एवं अनुभव से लैस करने पर बल देता है जिससे वे सफल उद्यमी के रूप में अपने को ढाल सकते हैं।

अधिक जानने के लिए टाटा रिव्यू का 2017 संस्करण पढ़ें