मई 2017

संकल्प का मार्ग

टाटा कॉफी ने मानवों व हाथियों के बीच के संघर्ष को कम करने व पशुओं, कर्मियों के साथ-साथ प्लांटेशन्स की रक्षा के लिए एक रोडमैप बनाया है

पश्चिमी घाट में हरियाली और कॉफी की महक वाली हवा से कहीं अधिक चीजें हैं। टाटा कॉफी के राष्ट्रीय प्लांटेशन्स के विस्तार का केन्द्र होने के अलावा यह क्षेत्र भारत में सबसे बड़े हाथी जीव मंडलों में से एक है।

बाएं से: के एस मचियाह; कार्तिक के; ए एम चित्तियाप्पा, टाटा कॉफी; टीना ब्रेनन, आपरेशन रेडीनेस प्रोजेक्ट निदेशक - जीएमएस क्षेत्रीय फार्मा सप्लाई, जीएसके लेमगाल और गोपाल सुब्रामणियम, भूपू सीईओ, एल&टी कोमात्सू

पिछले कई बरसों में पश्चिमी घाट में मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि देखी गयी है। हाथियों की जनसंख्या को अंगीकार करने और निवास संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए टाटा कॉफी ने स्थिरता को बढ़ाने के लिए कई पहलों को शुरु किया है और प्रत्येक हितधारक, मानव व पशुओं के लिए मूल्य का निर्माण किया है।  

हाथियों का प्रवास
कई दशकों से हाथियों का पश्चिमी घाट में प्रवास जारी है। 1980 में टाटा कॉफी के प्लांटेशंस में हाथियों का आना-जाना बेहद कम था। यदि हाथी सीमाओं तक आते भी थे तो वे आम तौर पर अगली सुबह जंगलों में लौट जाते थे। हालांकि, जंगलों की कटाई व जलवायु विस्थापन के साथ 1990 व 2000 में हाथियों की प्लांटेशनों में नियमित आवाजाही होने लगी, जिनमें से अधिकांश स्थायी रूप से निवास बना लेते हैं। 2010 में हाथियों की नई पीढ़ी प्लांटेशनों के बीच जन्मी है।

मानव-हाथी संघर्ष
टाटा कॉफी के बागानों में जंगली हाथियों के स्थायी निवास ने टाटा कॉफी प्लांटेशनों पर काम करने वाले कर्मियों के लिए गंभीर खतरे पैदा कर दिए है। अनेक मौतें हुई और आक्रमणों की संभावनाओं के कारण उत्पादकता हानि हुई तथा जमीनी कर्मियों में मानसिक भय भी बना रहा। इसके अलावा, बदमाश हाथी बरसों की खेती को कुछ सेकंड में बरबाद कर सकते हैं जैसी जानकारी ने क्षेत्र में कृषि लैंडस्केप को बदल दिया। जब इन कारकों को सामने लाया गया तो इन हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास में वापस भेजते हुए प्लांटेशंस की सुरक्षा के लिए टाटा कॉफी में सुरक्षा के मुखिया, ए एम चित्तियाप्पा की अध्यक्षता में समर्पित टीम का गठन किया गया।

हाथियों की घुसपैठ से लड़ने का रोडमैप
हाथियों को पुनःस्थापित करने के रोडमैप का पालन करने के उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। निम्नलिखित चरणों का पालन किया था:

चरण 1: वाइल्डलाइफ सेल का गठन
सबसे पहले टाटा कॉफी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेस, पांडिचेरी यूनीवर्शिटी तथा एनजीओ जैसे संगठनों के साथ सहयोग किया। इसके अलावा, प्रोजेक्ट के लिए एकल फोकस व दिशा प्रदान करने के लिए एक वाइल्डलाइफ सेल स्थापित किया गया।

चरण 2: संघर्ष क्षेत्रों की स्पष्ट मैपिंग
अधिकतम मानव-पशु संघर्षों वाले क्षेत्रों को भौगोलिक रूप से शेड करके यह सुरक्षा टीम कामगारों को प्लांटेशनों के बीच सुरक्षित रूप से आने जाने का मार्ग दे सकी।

चरण 3: बुनियादी ढ़ांचे व लोगों का हस्तक्षेप
हाथी का रीलोकेशन रोडमैप बुनियादी ढ़ांचों व मानवीय हस्तक्षेपों का मिश्रण था। बुनियादी ढांचे के कई उन्नयन लागू किए गए थे: खाई व रेल ट्रैक जैसी कई बाधाए बनायी गयी, सोलर शक्ति चलित फेंस बनायी व मजबूत की गयीं और अवलोकन टॉवर खड़े किए गए। साथ ही, सड़कों पर ब्लाइंट स्पॉट हटाए गए और हाथियों के बीच लालच पैदा करने वाले कटहल के पेड़ों को पूरे प्लांटेशन से हटाया गया। लोगों के हस्तक्षेप के संबंध में, व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, एसएमएस तथा एफएम प्रसारण प्रणालियों को लागू किया गया और आवधिक मॉक ड्रिल की गयी। प्रक्रिया स्वचालन भी किया गया जिससे प्लांटेशन के दूर दराज के हिस्सों में मानव तैनाती की जरूरतें कम हुई।

हाथियों को उनेक प्राकृतिक आवास की ओर ले जाने के धीमें लेकिन सतत प्रयासों से परिणाम हासिल हो रहे हैं

सफलता के मुख्य उपाय
113 प्रशिक्षणों, 45,330 प्रशिक्षण घंटों और वन अधिकारियों के साथ 65 बैठकों के बाद यह प्रोजेक्ट अच्ची प्रगति कर रहा है और नयी यात्रा की दिशा में अग्रसर है। 2013-14 में 827 हाथी हस्तक्षेपों से 2016-17 में 711 तक यह यात्रा गणना योग्य मापनीय रही है। 2014 से 2017 के बीच नौ बदमाश हाथियों को संघर्ष के हॉटस्पॉट से पकड़ा गया है और हाथी बचाव कैंपों में ले जाया गया है।

इस प्रयास के प्रभाव देखे जा सकते हैं। टाटा कॉफी को सीआईआईआईक्यू नेशनल सेफ्टी कंपटीशन में इसके हाथी संरक्षण प्रोजेक्ट के लिए कार्यस्थल सुरक्षा ट्रॉफी में उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृत किया गया है। आज अभी भी लगभग 60 ऐसे हाथी हैं जो टाटा कॉफी के स्वामित्व वाले प्लांटेशनंस में रहते हैं और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से ऐसे सतत प्रयास किए जा रहे हैं कि इस छोटी सी जनसंख्या को जंगल में फिर से बसाया जा सके।

आगे का रास्ता
जबकि हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास में ले जाने के प्रयास ने पहले ही परिणाम देने शुरु कर दिए हैं, इस प्रोजेक्ट का अंतिम हिस्सा अभी भी चल रहा है। एक बाहरी ऑडिट टीम को नियुक्त किया गया है, सरकारी विभागों के साथ बातचीत चल रही है और आपात स्थिति तैयारी के उच्चतर स्तरों को अपनाया जा रहा है। इंफ्रारेड सेंसरों व वॉकी-टॉकी वाली प्रौद्योगिकीय टूल्स की एक श्रंखला को प्रोजेक्ट के तरकश में जोड़ा जा रहा है। हाथियों को इस कक्ष में संबोधित करने के बाद टाटा कॉफी समुदाय अब सुरक्षित व मजबूत हो रहा है।