सितम्बर 2017

एवरेस्ट पर विजय पाना

टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के साथ काम करने वाले एक मेटलर्जिकल इंजीनियर हेमंत गुप्ता, दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ने के अपने महामानव प्रयास को याद करते हैं

“आपको बस एक बार में एक कदम लेना होता है और जब वह हो जाए तो दूसरे के बारे में सोचना होता है।” माउंट एवरेस्ट (29,029 फीट) पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बछेन्द्रा पाल के तीखे शब्दों ने हेमंत गुप्ता’ की दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी’ पर चढ़ने की इच्छा को दिशानिर्देश दिया।

हेमंत ने अभी तक 3 देशों में 8 चोटियों को फतह किया है। हालांकि, हाड़ों के साथ आकर्षण और उन्हें चढ़ाई का रोमांच उनके लिए एक नया जुनून है।

उत्तरी भारत के राजस्थान में पले-बढ़े, हेमंत ने कभी भी किसी चोटी को ना देखने की बात स्वीकार की। पर्वतारोहण के लिए उनका प्रेम तब परवान चढ़ा जब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे में उनको पढ़ाई के दौरान बुनियादी पर्वतारोहण के कोर्स का अवसर मिला।

2011 में टाटा स्टील में नौकरी शुरु करने के बाद उनके इस प्रेम को स्वस्थ वातावरण मिला। 2012 में सुश्री पाल से एक भाग्याशाली मुलाकात के बाद उनके मन में एवरेस्ट पर जाने की इच्छा पैदा हुई। एक बार यह एहसास होने के बाद कि पहाड़ों पर चड़ना ही उनका जीवन है हेमंत ने 2013 में जमशेदपुर में टीएसएएप जाने का निर्णय लिया।

एक सपने का पीछा

आसानी से कुछ भी हासिल नहीं होता; अपने इस सपने को हासिल करने में हेमंत को पांच साल लग गए। उन्होने कठोर शारीरिक प्रशिक्षण लिया जिसमें दौड़ना, तैरना और रॉक क्लाइंबिंग शामिल थे, जिससे उनके इस महान प्रयास के लिए जरूरी शारीरिक फिटनेस हासिल हुई।

इसके अलावा, जब भी अवसर मिला उन्होने पहाड़ों पर चढ़ना जारी रखा। वे कहते हैं, “आप जितनी पहाड़ियां चढ़ते हैं, आपको उतना अनुभव हासिल होता है।”

2015 में एवरेस्ट पर चढ़ने के उनके पहले प्रयास को उनको उत्तरी नेपाल के भूकंप के कारण रोखना पड़ा था। वे अंततः 27 मई 2017 को इस चोटी पर चढ़ने में कामयाब रहे।

इस चोटी पर चढ़ने में एक बेस कैंप और फिर 1 से 4 कैंप तक क्रमानुसार चढ़ना शामिल होता है। इस ईवेंट को याद करते हुए, वे कहते हैं कि इस अभियान में अंतिम सम्मिट जोर सबसे अधिक कठोर व थकाऊ था। “वे कैंप 4 पर उसी दिन पहुंच गए और रात में उन्होने चढ़ाई शुरु की। सम्मिट पुश के लिए रात लगभग 9 बजे उन्होने अपने शेरपा के साथ शुरुआत की और सुबह 6.25 पर विजय हासिल की। रात के समय परिस्थितियां बेहद कठोर थीं; ठंड शीर्ष पर थी,” वे याद करते हैं।

हेमंत अपने गुरु के साथ, माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बायेंचंद्र पाल

दूसरे पर्वतारोहियों की तरह हेमंत का भी अनेक खतरों से सामना हुआ जैसे गंभीर पहाड़ी बीमारी, हाइपोथर्मिया, ऑक्सीजन की कमी, भूख ना लगना आदि। उनके लिए विशेष रूप से डरावना मार्ग खुंबू आइसफाल का ता, एक क्षेत्र जो गिरते हिए विशाल बर्फ के ब्लॉक्स और क्रेव्स के लिए बदनाम है। “यह बर्फ की बहती नदीं जैसा है। कभी कबार आप चल रहे होते हैं और बर्फ के ब्लॉक्स आपके सिर पर झूल रहे होते हैं - जिनके गिरने का खतरा रह समय बना रहता है,” वे बताते हैं।

शारीरिक श्रम और थकान के अलावा, हेमंत को ऑक्सीजन और नींद की जबरदस्त कमी का भी सामना करना पड़ा। सम्मिट पर पहुंचना हेमंत के लिए ऐंटी क्लाइमेक्स जैसा रहा। शीर्ष से श्रद्धा भरे प्रेरणादायक दृश्य के बजाय उनको विपरीत मौसम के कारण पैदा हुए सफेद वातावरण का अनुभव हुआ।

नीचे की कठिन यात्रा

नीचे की यात्रा ने हेमंत की कठिनाइयों’ को और जोड़ा। इस चोटी से नीचे आना काफी जोखिम भरा होता है और इसे तत्काल करना होता है। यह जरूरी है कि वह व्यक्ति अपने शरीर का ताप बनाए रखें और चलता रहे, क्योंकि थोड़ी सी देर भी आराम करना खतरनाक हो सकता है।

इसी समय टीएसएएफ का प्रशिक्षण काम आता है। एक बार में एक कदम लेते हुए और अपने अपने शरीर को सहनशक्ति के उच्चतर स्तरों तक ढ़केलते हुए, हेमंत ने नीचे की अपनी यात्रा को जारी रखा। “आपका शरीर आपको छोड़ देता है और दिमाग उसका नियंत्रण करता है और इसी कारण आप चलते जाते हैं,” वे बताते हैं।

इस यात्रा का अंतिम हिस्सा कैंप 3 (23,500 फीट) से सम्मिट तक जाना और वापसी का था, जिसमें एक ही बार में 35 घंटे तक बर्फ की खड़ी ढ़ाल पर चलना होता है। “टीएसएएफ में मुझे जिस तरह से प्रशिक्षित किया गया था और पिछले चार बरसों में मैने जो अभियान किए थे उन्होने मुझे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने में सहायता की।”

एवरेस्ट की विजय ने उनको एक अलग व्यक्ति बना दिया, हेमंत इस बात का खुलासा करते हैं, एडमंड हिलेरी ’के इन शब्दों का समर्थन करते हैं, “हम चोटियों पर नहीं बल्कि खुद पर विजय पाते हैं।”

“चरम वातावरणों में जब हवाएं तेज होती है और तापमान बहुत कम हो तथा ऑक्सीजन सीमित हो तो चढ़ने वाला हर कदम कठिन और दर्द भरा होता है। जब आप छोड़ देने के बारे में सोचते हैं, आपको मानसिक रूप से खुद को ऊपर रखना होता है और एक बार मे एख कदम लेने पर खुद को फोकस करना होता है। आपका हर कदम आपको चोटी के करीब लाता है। यही’ सब कुछ तो जिंदगी है - सफलता छोटे प्रयासों का समुच्चय है, जिनको दिन रात, बार-बार किया जाता है,” हेमंत सार पेश करते हैं।