मार्च 2016 | संघमित्रा भौमिक

अरण्य नेचुरल्स: सफलता का पट्ट

एक छोटे से एकल कमरे की कार्यशाला से लेकर कलात्मक स्टोर खिड़की तक; स्थानीय मेलों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों तक; बैठकों में चर्चा से लेकर फेसबुक के शेयरों तक- अरण्य नेचुरल्स मन्नार की पहाड़ियों में धारणीय आजीविका के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं

संगठन और उसके कर्मचारियों के भाग्य प्रायः आपस में जुड़े होते हैं। इसका बेहतर उदाहरण विगत दो दशकों में अरण्य नेचुरल्स और इसके सहयोगियों का विकास है। टाटा ग्लोबल बेवरीजेज के कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व प्रयास 'सृष्टि ट्रस्ट' के एक भाग के रूप में 1994 में एक कमरे में प्रारंभ अरण्य अब पूरी तरह विकसित होकर 35 सदस्यों की मजबूत टीम तथा अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों वाली एक सुसज्जित रंगाई और छपाई इकाई बन गया है।

टाटा टी बागान कर्मियों तथा कर्मचारियों के बीच विभिन्न क्षमताओं से युक्त लोगों की ऊर्जाओं को एक राह देने में सहायता के लिए परियोजना के रूप में प्रारंभ यह इकाई उच्च गुणवत्ता के डिजाइनर स्टॉल, साड़ियां, दुपट्टे तथा बनाती है जो घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जाते हैं। "इस इकाई का उद्देश्य धारणीय आजीविका सृजन के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध घटकों का उपयोग करना है" कहते हैं सृष्टि ट्रस्ट के ट्रस्टी रत्न कृष्ण कुमार।

धारणीय मॉडल का तात्पर्य है कि अरण्य के उत्पाद 100 प्रतिशत प्राकृतिक और जैविक हैं। "हमारे सभी घटक स्थानीय रूप से प्राप्त किए जाते हैं जो हमारी प्रक्रियाओं को पूर्णतः धारणीय बना देते हैं। हम यूकलिप्टस तथा शहतूत की पत्तियों, लेमन घास, पाइन शंकुओं, वनस्पतियों तथा बेकार चाय का उपयोग करते हैं", कहती हैं विक्टोरिया विजय कुमार, जो अरण्य नेचुरल्स की कार्यक्रम समन्वयक हैं।

  • एक सहायक कार्यरत है शिबोरी डिजाइन पर अरण्य नेचुरल्स में
  • अरुमुगम अपने नवीनतम शिबोरी डिजाइन के साथ, इस तकनीक को अरु-शिबोरी के नाम पर यह नाम दिया गया
  • सृष्टि ट्रस्ट के ट्रस्टी रत्न कृष्ण कुमार और अरण्य नेचुरल्स की कार्यक्रम समन्वयक विक्टोरिया विजयकुमार एक नए सृजन का निरीक्षण करते हुए
  • जापानी शिबोरी विशेषज्ञ सुयोशी कूनो एक कार्यशाला का आयोजन कर इस कला की बारीकियां सिखाते हैं

इस इकाई की रंगाई तकनीक की उत्पत्ति भी अनोखी है। एक किताब से सीखकर और अभ्यास से विकसित; सुश्री कृष्ण कुमार को यह जापानी रंगाई तकनीक 'शिबोरी' एक किताब से संयोगवश मिली और उन्होंने इसे सहयोगियों को सिखाया। कुछ अर्से बाद वे इस किताब के लेखक जापानी कलाकार योशिको वादा से एक वस्त्र सम्मेलन के दौरान मिलीं। "मैं नहीं जानती थी कि वह कौन है किंतु मैंने उसे एक शिबोरी  कार्यशाला आयोजित करने का प्रस्ताव दिया। यह तो मुझे बाद में मालूम पड़ा कि वही उस किताब की लेखिका है जिससे हमने सीखा है। मैंने उनसे अरण्य के बारे में बताया और उन्हें हमारे यहां आने के लिए राजी कर लिया। इस बात को 8-9 वर्ष हुए, वे हर साल मन्नार आती हैं और शिबोरी कार्यशाला का आयोजन करती हैं", सुश्री कृष्ण कुमार सूचित करते हुए कहती हैं।

नियमित कार्यशालाओं, आतिथि कलाकारों तथा फेरबदल कार्यक्रमों ने अरण्य के शिक्षण क्रम में काफी वृद्धि की है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन के छात्रों के लिए प्रस्तावित छः माह की अवधि का प्रशिक्षु कार्यक्रम इसका इसका एक उदाहरण है। अरण्य के सहयोगी नई तकनीकें, पैटर्न तथा चलन और कुछ ऐसा सीखते हैं जो सुश्री कृष्णकुमार को लगता है कि उनकी इकाई के कैटलाग में नया जुड़ सकता है, "यह कोई पहनने को तैयार परिधान, डिजाइनर साड़ी और कोई वस्त्र हो सकता है" वे कहती हैं।

अरण्य चाय बगान कार्मिकों के समान ही भुगतान संरचना तथा कर्मचारी लाभ का अनुपालन करते हैं, जिससे ये एक विश्वसनीय नियोक्ता साबित होते हैं। "हालांकि, यह प्रकट होता है कि सहयोगी अरण्य के निर्माण में खुद को सहभागी पाते हैं।* हम अपने सहयोगियों को हर चीज में सम्मिलित करते हैं। वस्त्र सेमीनार, सम्मेलनों तथा बैठकों के लिए कुछ तो विदेशों से भी आते हैं", कहती हैं सुश्री कृष्ण कुमार।

अरण्य की सफलता की कहानी इसके सहयोगियों के साथ-साथ आगे बढ़ती है। बहुत सारे लोग रोजगार की खोज में अरण्य में युवा के रूप में सम्मिलित हुए और आज वे अरण्य के दिन-प्रतिदिन के कार्यों तथा प्रबंधन में संलग्न हैं। भानुमथी के, जिन्होंने अरण्य में एक कनिष्ठ सहयोगी के रूप में योगदान किया था, आज एक निरीक्षक हैं- फेहरिस्त रखती हैं, काम बांटती हैं और डिजाइन के निविष्टियां देती हैं।

तथापि, अरण्य की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण अंतर्राष्ट्रीय फैशन घरानों से हासिल होने वाले आदेश हैं। अंतर्राष्ट्रीय जीवनशैली ब्रांड, जैसे अमेरिका के लिव वन विजन प्रॉजेक्ट तथा लियांस इन फोर, अपने वस्त्र अरण्य नेचुरल्स से मंगवाते हैं। "हमने अपनी मार्केटिंग की शुरुआत टाटा कॉफी हाउसवाइफ मेले में की थी। लेकिन आज हमारे ग्राहक कनाडा, यूके, अमेरिका, जापान, श्रीलंका और साथ में भारत से तो हैं ही", कहती हैं सुश्री कृष्णा कुमार, "और लोगों की बातचीत से होने वाले प्रचार का भी बेहद शुक्रिया।"

गत दो वर्षों में रु.1 करोड़ के विक्रय रिकार्ड और एक सुरुचिकर स्टोर के साथ, अरण्य आगे बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया मंचों पर हमेशा अपने किए समर्थक हासिल करते हुए, अरण्य अपने नेटवर्क में विस्तार की योजना बना रहे हैं, किंतु 'क्रमशः', कहती हैं सुश्री कृष्ण कुमार, 'हम स्थायित्व प्राप्त करने वाले हैं।* अरण्य पूरी तरह अपने सहयोगियों और उनकी आजीविका के लिए है, केवल लाभ के लिए नहीं।"

अरुमुगम, जो अरण्य में एक सहयोगी हैं, को 2006-2007 में टाटा टी इनोवेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया एक नई शिबोरी डिजाइन बनाने के लिए

सफलता के कई रंग
अरुमुगम अरण्य के मुक्त और आविष्कारी शिक्षण और विकास मॉडल के शास्त्रीय उदाहरण हैं। 16 वर्ष की आयु में रतौंधी से पीड़ित, उसने कला सीखने और एक रोजगार मिलने की आशा से इकाई में योगदान किया। नियमित कार्यशालाओं ने अरुमुगम को अपनी दक्षता को धार देने में सहायता की, और अब वे वरिष्ठ सहयोगी हैं जो नए प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित करते हैं और जटिल पैटर्न बनाते हैं।

इकाई में रोजाना एक ही तरह के पैटर्न बनाते बनाते ऊब कर एक दिन अरुमुगम ने कुछ नया करने का फैसला किया। "मैंने एक नया पैटर्न बनाने के लिए परंपरागत रूप से शिबोरी तकनीक में प्रयुक्त पाइपों की जगह चार अतिरिक्त पाइप लगाए। हर किसी ने इस पैटर्न को पसंद किया और सुश्री वादा ने इस तकनीक को मेरा नाम दिया है, ,  अरु शिबोरी, कहते हैं अरुमुगम। उनके इस आविष्कार और उद्यम के लिए टीजीबी ने उन्हें 206-07 में टाटा टी इनोवेशन अवार्ड से सम्मानित किया है।

"यहां, हर कोई हमें अलग तरह के कपड़ों और रंगाई तकनीकों पर काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है। मैंने कई तरह के घटकों के साथ भी प्रयोग किए हैं। मैं खुश हूं कि अरण्य ने मुझे अवसर दिए हैं, मैं किसी अलग जीवन के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता", अरुमुगम आगे कहते हैं।