दिसम्बर 2017

परोपकार की शुरूआत होती है आपसे

टाटा सन्‍स के निदेशक अमित चन्‍द्रा कहते हैं कि दान देने या कोई उद्देश्य ढूंढकर अपने परोपकार की यात्रा आज ही तय करने में हम न ही यह कह सकते हैं कि यह समय से बहुत पूर्व है और न ही बहुत कम है

एक दशक से भी ज्‍यादा हो गए, मेरी पत्‍नी अर्चना और मैंने स्‍वयं से एक जीवन बदल देने वाला सवाल किया थाः ‘कितना होना पर्याप्‍त होगा?’ तब हमें ज्ञान हुआ कि हमें अपने मन लायक जीवन जीने के लिए अनंत धन रशि की जरूरत होगी। इसलिए हमने निर्णय किया कि यदि हम अपनी इच्छित जीवन शैली का एक सीमा तय कर दें तो हम समाजिक क्षेत्र के उद्यम पर अपना ध्‍यान अधिक केन्द्रित कर सकते हैं।

पर्याप्‍त कितना होता है यह समझ हमें और अधिक रोचक और सार्थक चीजों की ओर ले गयाः इससे हमें मदद मिली कि हम विश्‍वविद्यालयों, सुपर-स्‍पेशियलिटी शिशु अस्‍पताल और मुसहर1 के बच्‍चों के विद्यालय निर्माण में योगदान देने के साथ-साथ सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी कार्य कर पाएं। हम अपने संसाधनों और समय का निवेश समाजिक क्षेत्र की क्षमता-निर्माण कार्यक्रम तय करने, परोपकार मंच को प्रात्‍साहित करने, और जॉय ऑफ गिविंग वीक, और डिजायन फार चेंज जैसे आंदोलनों को रूप देने में भी करने लगे जिसमें दयालुता का प्रोत्‍साहन हो।

इसमें से कोई भी हमारी कल्‍पनाओं से परे नहीं होती, खासकर इसलिए कि समय और धन के लिहाज से कितना प्रदान किया जाए इसे लेकर कृत्रिम अवरोधों द्वारा बंधा महसूस करते थे। अपने जीवन के शुरूआती समय में मेरे पास अधिक पैसे नहीं थे, इसलिए मैं अपने समय का दान किया करता था। फिर एक व्‍यस्‍त व्‍यवसायी होने के नाते, मैंने पैसे का दान शुरू किया। जल्‍द ही मुझे मालूम चल गया कि मैं खुश होता था यह जानकर कि मेरे हुनर मेरे पसंदीदा संगठनों के लिए उपयोगी थे। इसलिए मैंने धीरे-धीरे समय और धन दोनों का दान करना शुरू कर दिया।

वक्‍त बीतने पर, अर्चना और मैंने धन आवंटन के लिए और भी सुसंगठित कार्यक्रमों का बीड़ा उठाया क्‍योंकि हममें इसके प्रति काफी जुनून था। पुनरावलोकन के जरिए हमें पता चलता है कि हमने बहुत सारी गलतियां की हैं। लेकिन आज इससे हमें और अधिक चिंतनशील दान कर्ता बनने में मदद मिली है, - एक ऐसी यात्रा जिसे आरंभ करने का साहस अन्‍य भी कर सकें।

बच्‍चे की तरह एक-एक कदम बढ़ाएं
परिवर्तन का सबसे बड़ा शुत्रु है निष्क्रियता इंसान को चाहिए कि वे कुछ-कुछ अनुभव लेते रहें, चाहे छोटे-छोटे काम ही क्‍यों न हों, ताकि गति बनी रह सके। जब सामाजिक क्षेत्र की बात आती है तो क्षमतावान दानकर्ता हमेशा एक भ्रांतिजनक आदर्श क्षण के इंतजार में अति चिंतन करते रहते हैं।

मैं कई व्‍यावसायिक लोगों को जानता हूं जो निवेश को समझते हैं। वे किसी सही स्‍टॉक में निवेश करने को इच्‍छुक रहते हैं, अच्‍छीतरह समझ-बूझकर कि यही एक सर्वोतम धन कमाई का मार्ग है। सही स्‍टॉक के द्वारा आप एक छोटी राशि का निवेश करके देखते हैं कि यह कैसा चल रहा है और एक बार जब आपको स्‍टॉक के प्रदर्शन पर भरोसा हो जाता है तब आप समय के साथ अपने आवंटन को बढ़ाते जाते हैं। यह तर्क गैर-लाभकारी संगठनों पर लागू क्‍यों नहीं हैृ?

उदाहरण के लिए, हाल ही में मैं एक मध्‍यम स्‍तरीय गैर-लाभकारी संगठन के सीईओ से मिला, जिसने मुझे बताया कि एक ऐसा व्‍यक्ति जिसे वह अच्‍छी तरह जानती थी वह उसके गैरलाभकरी संगठन में दान देने से झिझक रहा था क्‍योंकि इस संगठन का कोई उत्‍तराधिकार योजना नहीं है। विडम्‍बना की बात है, यह हितैषी एक परिष्कृत हेज फंड मैनेजर है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसने जिन कंपनियों में निवेश किया है, उनमें 10 में से 9 कंपनियों की कोई मजबूत उत्‍तराधिकार योजना नहीं है।

लोगों को सामाजिक क्षेत्र तक भी उसी अंर्तदृष्टि से पहुंच बनानी चाहिए जिसका वे जीवन के अन्‍य पहलुओं में उपयोग करते हैं। जीवन के हरेक चीजों की तरह, उन्‍हें यह सच्‍चाई जान लेनी चाहिए कि सभी अनुभव शानदार नहीं होते हैं। यही वह कुंजी है जिससे आप धारा में बने रहते हैं, जो कारगर हो उससे संबद्ध रहें और जो न हों उसे त्‍याग दें।

आपको फिक्र करने की क्‍या जरूरत है
सामाजिक क्षेत्र को जानने के लिए लोगों को और भी कड़ी मेहनत करनी चाहिए क्‍योंकि कई कंपनियों की तुलना में सामजिक संगठन और इसके लोग इससे बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल कर रहे हैं। व्‍यावसाय के शब्‍दों में, हजारों लोग हैं जो एक कार्पोरेट समस्‍या को हल करने में लगे हैं। लेकिन कितने लोग हैं जो बच्‍ची के यौन शोषण, और जल धारणीयता जैसे मुद्दों को हल करने की कोशिश या मुंबई को और भी रहने योग्‍य बनाने के लिए शहरी योजनाओं के विकास में लगे हैं?

ये सारे ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हमारी आज की और आने वाली कल की जिन्दिगयां प्रभावित होती हैं। दरअसल, कंपनियां जो कर रहीं हैं उनसे ज्‍यादा शक्तिशाली प्रभाव इनके हैं। यदि कोई कंपनी दिवालिया होती है तो कोई अन्‍य इसका स्‍थान ले लेगी लेकिन यदि कोई सिविल सोसाईटी असफल होता है तब हमारे पास क्‍या उम्‍मीद होगा?

दुर्भाग्‍य से, हममें से ज्‍यादातर अपने आस-पास से उदा‍सीन रहते हैं और हम सब ‘आराम से स्‍तब्‍ध’ बने हुए हैं। हम खुद को एक संतोषप्रद भाव के साथ शांत बनाए हुए हैं

एक व्‍यर्थ का अभिमान है कि, हम, एक संस्‍कृति के रूप में बड़े दानी हैं। लेकिन आंकड़े इसकी पुष्टि सामन्‍यतयः नहीं’ करती हैं मैंने भारत के ग्रमीण क्षेत्रों में बहुत समय व्‍य‍तीत किया है, और मुझे पता है कि ये शहरी भारत से अधिक बड़े दानी हैं, हमारे गरीब जन अमीरों की तुलना में अधिक बड़े दानी हैं।

सच्‍चाई ये है कि यदि आप अपने जनकल्‍याण के इतिहास और 20वीं सदी के आरंभिक समय में टाटा, गॉदरेज, और बजाज जैसे परिवार द्वारा किए गए असाधाराण चन्‍दा को देखें तो मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम गरीब राष्‍ट्र होते तो शायद इससे बड़े दानी होते। जैसे-जैसे भारत अमीर होता जा रहा है हमें आत्‍मविश्‍लेषण करते रहना चाहिए कि हम कहीं अपने धन के प्रति कंजूस तो नहीं होते जा रहे हैं।

अपने किए दान को सराहें
मुझे तो डर लगता है कि हम भारतीय अब अपने उपभोग को पहले से भी ज्‍यादा सराहते हैं। ऐसा देश जिसमें इतनी अधिक आसमानताएं हो, इसमें बदलाव होने की जरूरत है। ऐसा तभी हो सकता है जब हम दान की सराहना करने लगें। और इसके लिए हमें और भी अनुकरणीय व्‍यक्ति, धन सर्जक, पेशेवर की आवश्‍यकता होगी जो समाज को पैसे या समय के संबंध में जो भी उनके पास हों, वापस दे सकें।

जनकल्‍याण के विकास को उच्‍चतम स्थिति पर होना चाहिए, जहां से यह मुख्‍य राष्‍ट्रीय आंदोलन का रूप ले सके। और ये अंदोलन शुरूआती स्‍तर से उठकर वास्‍तविक रूप में होने चाहिए जहां ये पूरे जनसाधारण को समेट सके, जहां कुछ शानदार हो और लोग इन्‍हें देखकर कह उठे कि “यही वह तरीका है जो हमें चाहिए”। मुझे उम्‍मीद है कि हमारे समाज में होने वाली किसी प्रलय की घटना से पहले यह सब हो जाय।

मुझे उम्‍मीद है‍ भारत उस मुकाम पर पहुंच जाएगा जहां हमारे यहां बहुधा ऐसे सहृदय पूं‍जीपति होंगे जिससे इनका अनुकरण न करना कठिन हो जाएगा। लोगों को अनुकरणीय व्‍यक्ति को देखना चाहिए और ज्‍यादा से ज्‍यादा दान देना चाहिएः यदि कोई अपने धन का 2 प्रतिशत देता है तो उसे चाहिए कि वह 10 प्रतिशत तक दें, जबकि यदि 10 प्रतिशत दे रहा हो तो उसे 30 प्रतिशत तक देने चाहिए। और यही एक होड़ बन जानी चाहिए मुझे उम्‍मीद है ’कि यह ऐसी होड़ होगी जिसमें समाजसेवक अधिकार पत्र बनने के बजाय अपनी इच्‍छा से इसमें आ सकेंगे।

ऐसे लोग हैं जो प्रकाश दिखा रहें और दूसरों का उत्‍साहवर्धन कर रहें हैं। बिल गेट्स ने चक फिनी और अन्‍य से रौशनी पाकर वारेन बफेट को चिराग दिखाया गेट्स और बफेट ने दान संकल्‍प तैयार किया और दर्जनों अन्‍य लोगों ने एक आंदोलन का रूप देते हुए उनका अनुसरण किया। मुझे आशा है कि यह भारत में भी हो और जिससे हम ऐसी स्थिति में आ जाएं जहां आप अपवाद स्‍वरूप ही ऐसे करोड़पति भारतीय होंगे, जो दान-संकल्‍प के हस्‍ताक्षर कर्ता न हों।

तो, क्‍या कर सकते हैं आप?
यदि हम अपने सपनों का भारत बनाना चाहते हैं तो हमें समाजिक ’समस्‍याओं से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। मैंने लोगों को कहते सुना है कि वे भी यदि बिल गेट्स और अजिम प्रेमजी की तरह हो जाएंगे तो दिल खोलकर दान देना शुरू कर देंगे। लेकिन सच यह है कि अधिक से अधिक धन कामाने की इच्‍छा का कोई अंत नहीं है।

हर व्‍यक्ति को दान देने की अपनी क्षमता तय कर लेनी चाहिए, लेकिन आमदनी के उंचे दहलीज पर जाकर दान देने पर आप दान देने की खुशी के अवसर से वंचित रह जाएंगे। आपने वार्षिक आमदनी का 10 प्रतिशत दान के लिए व्‍यक्तिगत न्‍यूनतम बार तय करना शुरूआत के लिए अच्‍छा होगा। अब इस आशा में अपने समय और धन के दान में टाल-मटोल न ’करें कि जीवन के ‘किसी मोड़ पर आप गेट या प्रेमजी’ होंगे।

यदि आप अधिक धन देने में सक्षम नहीं हैं तो काम पर लगने के लिए अन्‍य मार्ग का चयन करें। समय का दान देना भी उतना ही मूल्‍यवान है यह भी आवश्‍यक ’नहीं है कि आप अपने समय को किसी संगठन में ही दें, असंगठित रूप से स्‍वयंसेवी बनकर भी आप अपने पास-पड़ोस के किसी व्‍यक्ति की मदद कर सकते हैं।

यह भी आवश्‍यक है कि आप जिस संगठन का सहयोग करते हैं उनके लोगों से बातचीत करते हुए दान देने की यात्रा का आनंद लें। इसलिए, ज्‍यों ज्‍यों आप इस क्षेत्र के काम में गहरे उतरते जाते हैं आप कुछ लोगों और अपने संगठनात्‍मक रूचियों के बारे में गहराई से सोचने लगते हैं।

व्‍यापक असमानता वाले किसी समाज में जहां दान देना अनिवार्य है वहीं यह व्‍यक्तिगत विकास और उपभोग पर मिलने वाली खुशी से एक अलग तरह की खुशी अनुभव करने का भी एक जबरदस्‍त अवसर है। जब हम दान देने हैं, वास्‍तव में हम और भी ज्‍यादा पाते हैं।

1 उत्‍तर प्रदेश और बिहार के राज्‍यों में बहुतायत से पाए जाने वाले मुसहर भारत के सर्वाधिक सुविधाविहीन समुदाय में से हैं।

टाटा सन्‍स बोर्ड के निदेशक अमित चन्‍द्रा हैं वो बेन कैपिटल, मुंबई, के प्रबंध निदेशक और समाजसेवक हैं वो टाटा ट्रस्‍ट के ट्रस्‍टी, अशोका युनिवर्सिटी के फाउंडर/बोर्ड मेंबर और गिव इंडिया के बोर्ड मेंबर हैं। वो ब्रिजस्‍पैन इंडिया, द सेन्‍टर फार सोसल इम्पैक्‍ट एण्‍ड फिलोट्रॉफी और स्‍वदेश फाउन्‍डेशन के एडवाइजरी बोर्ड मेम्‍बर भी हैं।

इस आर्टिकल का प्रथम प्रकाशन इंडिया डेवलपमेंट रिव्‍यू, www.idronline.org में हुआ था।