अगस्त 2015 | फिलिप चाको

व्यंजन-सूची में अमृत

टाटा केमिकल्स अब तक जो करती आई है, उससे बिल्कुल अलग लीक पर चलते हुए, नवप्रवर्तन एवं प्रौद्योगिकी के संमिश्रण की बदौलत एक नवीन साहस पथ पर कदम रखा है, न्यूट्रास्यूटिकल्स परियोजना शुरू की है

व्यापार का यह एक ऐसा अवसर है जो फलने-फूलने के लिए बस, तैयार हैः खरीदारों तक पहुंचाए जाने वाले फायदे स्वास्थ्य से भरे हैं, बाज़ार है समग्र भारत, और हां, बाकी का विश्व भी है, इसकी तेज़ वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं, अच्छी नामावली भी है। न्यूट्रास्यूटिकल्स के बारे में इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस उपक्रम का विचार ऐसा है जिसमें अच्छा खासा विस्तार है और समृद्धि भी। अगर सब कुछ उतना ही सीधा सादा होता

टाटा केमिकल्स ने पता लगाया कि यह साहस करके कहीं वे किसी गहरी खाई में तो गोता नहीं लगा रहे हैं, क्योंकि 75 वर्ष की इतिहास समृद्धि रखने वाली यह कंपनी, अब तक जो भी करती आई है, उससे यह साहस सरासर भिन्न है । अब तक टाटा केमिकल्स मुख्य रूप से गैर जैविक रसायनों और ऊर्वरकों - चीज़वस्तुओं से जुड़े व्यापार में है और इतने लंबे अरसे से इसमें एक मकाम बनाया हुआ है, लेकिन कंपनी के नज़रिए से देखें तो न्यूट्रास्यूटिकल्स परियोजना, जो कि अब तक के व्यापार क्षेत्र से कहीं हट कर भले ही हो, भविष्य पथ का एक और सीमाचिह्न है। इसका संयंत्र पिछले वर्ष से श्रीपेरुम्बुदुर, चेन्नई के पास- शुरू हो चुका है

अछूते पथ पर कदम बढ़ाने की शक्ति देने वाला तर्क काफी सीधा सादा है। न्यूट्रास्यूटिकल्स इस प्रकार के खाद्य पदार्थ हैं जिनमें स्वास्थ्यवर्धक और रोग-प्रतिरोधक गुणधर्म हैं। (देखें न्यूट्रा क्या? ) भारत में इसका बाज़ार $3 बिलियन प्रति वर्ष और वैश्विक तौर पर $150 बिलियन से अधिक का है और 2018 तक $250 बिलियन का हो जाने का अनुमान है। इस बाज़ार में प्रवेश का टाटा केमिकल्स का इरादा व्यक्त करने वाला एक निवेदन, कंपनी के पुणे स्थित इनोवेशन सेन्टर (नीचे देखें क्रिएटिव होटहाउस ने कर दिखाया) द्वारा किए गए आधारभूत कार्य के फल स्वरूप इसका चयन किया गया और फिर भाग्य ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई।

2011 में जब टाटा केमिकल्स ने न्यूट्रास्यूटिकल्स के क्षेत्र में कदम रखने का निर्धार किया, ज़मीनी तैयारियां हो चुकी थीं। “इस विज्ञान को आंतरिक तौर पर ही विकसित किया गया और एक ऐसे व्यापार का निर्माण करने का मौका हाथ लगा जहां प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने की बात थी, हमारे लाभकारी ऐतिहासिक संसाधन यानी प्राकृतिक संसाधनों तक की पहुंच की बात यहां नहीं थी।” ये शब्द हैं अरूप बासु, प्रेसिडेंट और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, न्यू बिज़नेसेज एंड दी इनोवेशन सेन्टर - के। अगर वो गैरपारंपरिक था, तो जो उसके बाद घटित हुआ वो तो उससे भी कहीं अधिक था।

“इसके लिए हमने किताबनुमा तरीका नहीं अपनायाः पहले बाज़ार को समझो, मांग और आपूर्ति का रिश्ता समझो और फिर बाकी की बातें," ड़ॉ. बासु समझाते हुए कहते हैं। “हमारे विज्ञानियों ने बाज़ार में प्रस्तुत किए जा सकने वाले उत्पाद का आरंभिक संस्करण रचा। और यहीं से आगे की बागडोर संभाली प्रौद्योगिकी, जुनून तथा अटल निर्धार ने। हमें बात समझ में आ गई कि इसे करने का तरीका था पहले सही उत्पाद का निर्माण किया जाए और फिर बाज़ार, प्रतिस्पर्धा वगैरह के बारे में सोचा जाए।”

टाटा केमिकल्स ने जिसकी खोज की, इसने इस बात को और भी आकर्षक बना दिया कि इस लगभग अछूते से क्षेत्र में क्या क्या हासिल किया जा सकता है। न्यूट्रास्यूटिकल्स बनाने वाली गिनीचुनी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां हैं और लगभग यूनाइटेड स्टेट्स, जपान तथा यूरोप में स्थित है। भारत में न्यूट्रास्यूटिकल्स इन स्रोतों से तथा चीन से आते हैं। "हमने हमारे लिए दो उद्देश्य निर्धारित किए हैं-ऐसे उत्पाद का सृजन करना जो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ के अनुरूप हो और इसकी कीमत, चीन जिस कीमत पर निर्यात करता है उससे कम हो या उतनी ही हो।" डॉ. बासु ने समझाते हुए कहा।

अपना यह साहस किस प्रकार होगा, इसका पता लगाने में, समझ पाने में टाटा केमिकल्स को थोड़ा समय लगा। "जब आप एक अज्ञात क्षेत्र में बतौर नौसीखिया प्रवेश कर रहे हों, आप चाहेंगे कि जितना भी संभव हो, अपनी तरफ से तमाम कोशिशें, जानकारियां हासिल कर ली जाएं।" "हमें ये बात समझ में आई और हम पूरी तरह से इसमें लग गए। हमने हमारे पाइलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए, इस हरितक्षेत्र परियोजना के लिए हमने स्थल का चयन किया, और शून्य से सृजन करना शुरू करते हुए हमने संयंत्र का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। हम संदिग्धता में काम करते थे और शुरूआत शून्य से की थी।"यह जितना रोमांचक था उतना ही चुनौतियों भरा भी।

एक दुष्कर आरोहण सा शिक्षा पथ
इस राह में आजमायिशें और चूक, विफलताएं और खुशियां मिलती रहीं, आगे चलते गए। "त्राहित-पक्ष द्वारा पाइलट उत्पादन सुविधा के लिए खोज करने से पहले, परीक्षण समय के दौरान हमने पीपेट्स और ब्यूरेट्स से काम किया," डॉ. बासु कहते हैं। "नौ महीने तक हम खोज करते रहे और तब जा कर पता चला कि हमारे लिए यह काम कर सके ऐसा कोई त्राहित पक्ष है ही नहीं। उस समय एक अच्छी बात भी बनी, कि हमारे भाग्य ने हमारा साथ दिया। हमेशा भाग्यशाली ही होने का विचार अच्छा नहीं है, किंतु, निर्णायक पड़ाव पर इसका साथ मिल जाना अच्छा होता है।"

सृजनात्मक होटहाउस ने कर दिखाया
पुणे स्थित टाटा केमिकल्स इनोवेशन सेन्टर के बलबूते पर कंपनी अपना भविष्य गढ़ने की उम्मीद, रखती है। 2004 में स्थापित इस सेन्टर ने एक अपार्टमेन्ट में अंतरिम प्रयोगशाला से काम करना शुरू किया। हरेभरे वातावरण में अपना स्थायी स्थान पाने और अपना उद्देश्य तथा दिशा कायम करने से पहले इसे ठोकरें भी खानी पड़ीं।

सेन्टर को अब अपना निश्चित लक्ष्य मिल गया हैः बायोतकनीकी एवं नेनोतकनीकी में अनुसंधान करना और उन परियोजनाओं पर काम करना जिन्हें व्यापार के रूप में विकसित किया जा सके। फलतः फुड एडिटिव्स एवं पोषक तत्वों (न्यूट्रिअन्ट्स), जैव इंधन (बायो फ्यूल) तथा विशिष्ट रसायनों, जल शुद्धिकरण और कैटेलीसिस पर काम करना तय हुआ।

संधारणीयता, जो कि टाटा केमिकल्स का आधार स्तम्भ रही है, इनोवेशन सेन्टर के मूल में भी वो ही है। अरूप बासु, इस सेन्टर के शीर्षस्थ, कहते हैं, "इस संस्थान को दो विस्तृत नज़रिए से देखना होगा, संधारणीयता और हरित रसायन शास्त्र।" "इसी तर्क ने आरंभिक दिनों में बायोतकनीकी एवं नेनोतकनीकी पर काम करने प्रेरित किया।"

एक समय था जब विज्ञानियों ने किया हुआ काम और जिसे व्यापार के रूप में ढ़ाला जा सके, वो - इन दोनों बातों के बीच कोई मेल नहीं होता था। सेन्टर उस समय से काफी आगे निकल आया है। "परियोजना चयन की प्रक्रिया को तर्क संगत बनाया गया है," मनोज गोते, सेन्टर के एक अग्रणी विज्ञानी कहते हैं। "अब विज्ञानियों और व्यापार विकास की टीमें साथ मिल कर तय करती हैं कि बाज़ार की मांग और तकनीकी संभावनाओं के आधार पर किस विचार को आगे बढ़ाया जाए। उद्भव से ले कर साकार स्वरूप तक हम साथ मिल कर काम करते हैं।"

न्यूट्रास्यूटिकल्स परियोजना विकसित होना भी ऐसे ही सहयोग का परिणाम है। "इस परियोजना में अनुसंधान के चरण से ही व्यापार विकास टीम साथ में थी," डॉ. गोते कहते हैं। "आम तौर पर विज्ञानियों व्यापार के पहलूओं, बाज़ार, ग्राहक की ज़रूरतें और ऐसी ही अन्य बातों से पूरी तरह वाकिफ नहीं होते। इसीलिए, हमारे व्यापार सहयोगियों से सहयोग करना बेहद ज़रूरी है। इसके कारण वाणिज्यिकरण की गति में निश्चित ही तेज़ी आई है।"

डॉ. बासु ने जिस भाग्य का उल्लेख किया, वह तब हुआ जब टाटा केमिकल्स मंडल ने मई 2012 में एक नये संयंत्र के निर्माण को हरी झंडी दी। डॉ. बासु और एक व्यापार प्रबंधक तथा तीन वैज्ञानियों से बनी उनकी छोटी सी टीम के लिए यह बड़ा सा शक्तिपुंज था, जिससे वे पूरी निष्ठा के साथ न्यूट्रास्यूटिकल्स परियोजना को साकार करने के काम में पुरजोश प्रवृत्त हो गए। यहीं से खोज की यात्रा आरंभ हुई।

2007 से सेन्टर न्यूट्रास्यूटिकल ऐसे सूत्रिकरणों (फार्मूलेशंस) पर काम कर रहा था, जिन्हें खाद्य कंपनियों को उनके रोज़मर्रा के उत्पादों में इस्तेमाल के लिए बेचा जा सके। श्रीपेरुम्बुदुर संयंत्र की रचना प्रीबायोटिक्स, फ्रुक्टोलिगोसेश्राइड्स (एफओएस) और गेलेक्टो लिगोसेश्राइड्स (जीओएस), कार्बोदित पदार्थ उत्पादित करने हेतु की गई, ये आहारयोग्य रेसे हैं और आंतों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए इन्हें खाया जाता है। संयंत्र स्थल के रूप में श्रीपेरुम्बुदुर का चयन करने के स्पष्ट कारण थेः यह गन्ना-उत्पादन करने वाला प्रांत है (गन्ना, एफओएस बनाने में एक कच्चा माल है), यह शहरी क्षेत्र के निकट है तथा निर्यात के लिए ज़रूरी बातें आराम से उपलब्ध है।

डॉ. बासु कहते हैं, "कई प्रतिभावान युवा उत्पादन के क्षेत्र में नहीं आते क्योंकि उन्हें दूरवर्ती इलाकों में काम करना पड़ता है", "इसके चेन्नई से नज़दीक होने का अर्थ है कि हमारे लोगों के लिए स्थिति लाभप्रद रहेगी, शहर में रह कर वे तकनीक-केन्द्रित उत्पादन क्षेत्र में करियर आगे बढ़ा सकते हैं । और फिर चैन्नई एक बंदर है, इस कारण से दक्षिणपूर्व एशिया को निर्यात करने का हमारा उद्देश्य पूरा करने में भी यह मददरूप होगा। श्रीपेरूम्बुदुर के साथ सब कुछ ठीक बैठ रहा था।"

सारी बातें सही सही जाने से, सफलता के वादे ने टाटा केमिकल्स के लिए लौहचुंबक का काम किया। "भारतीय खाद्य सामग्री उद्योग आयात और विदेशी तकनीकी पर निर्भर है,"टाटा केमिकल्स के वरिष्ठ प्रबंधक और न्यूट्रास्यूटिकल्स टीम के एक अहम सदस्य अनीश चौधरी कहते हैं।

विशाल बाज़ार पुकार रहा है
"एक अनुमान के अनुसार, प्रति वर्ष मूल्य वर्धित भारतीय खाद्य क्षेत्र $100 बिलियन से अधिक मूल्य का, बिखरा हुआ और बहुधा असंगठित है और स्थानीय स्वादों का अपार वैविध्य लिए हुए है। इस बाज़ार में शुगर-फ्री और रेसेदार उत्पादें हैं तो सही लेकिन जो घटक इस्तेमाल करने में स्वास्थ्यप्रद, स्वादिष्ट, सुरक्षित एवं सुगम हैं उनकी प्रसंस्कृत (प्रोसेस्ड) खाद्य क्षेत्र में बहुत बड़ी संभावनाएं हैं और अभी इनका दोहन नहीं किया गया।"

आरोग्य के मोर्चे पर देखें तो, एफओएस, जो टाटा केमिकल्स का सितारानुमा पहलू है, उस क्षेत्र के समाचार अच्छे नहीं है। चौधरी कहते हैं, "भारत में खाद्य तेल की खपत 1950 में प्रति व्यक्ति 3 किग्रा थी, वो 2014 में 15 किग्रा से भी अधिक है।" “भारतीयों, प्रति दिन सूचित मात्रा से लगभग 50 प्रतिशत अधिक वसा का सेवन करते हैं। चीनी की हमारी खपत भी, समग्र विश्व में उत्पादित चीनी का 15 प्रतिशत है। इसमें माइक्रोन्यूट्रिअन्ट्स, विटामिनों और प्रोटीनों की कमी और ‘आहार के कारण मृत्यु’ (डेथ बाय फुड) वाले व्यंजन पकाने के तरीकों को जोड़ दें। भारत के लिए हमें जो आवश्यक है वो है वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, उच्च-गुणवत्तायुक्त उत्पाद।”

साहस के आयोजन के आरंभिक दिनों में टाटा केमिकल्स के लिए निर्यात भी एक बहुत बड़ा क्षेत्र रहा है। यह दिशा अभी तत्कालीनताओं पर ध्यान केन्द्रित करने, यानी भारत में एक बाज़ार हिस्सा आकारित करने हेतु बदली गई है। कागज़ पर यह बात कुछ सीधी सादी लग सकती है, परंतु इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

"हमें समझ में आया कि निर्यात बाज़ार को फलने में अभी कुछ साल का समय लगेगा,"चौधरी ने अपनी बात में जोड़ते हुए कहा। "और उसी समय हमें यह बात भी ज्ञात हुई कि अस्तित्व टिकाने के लिए हमें भारतीय खाद्य क्षेत्र में हमारे उत्पादों के लिए बाज़ार तैयार करना होगा। चूंकि उत्पाद नया था, कोई विज्ञान या कोई डाटा उपलब्ध नहीं था कि खाद्य श्रृंखला में इसे किस प्रकार से शामिल किया जाए। और भी, कि ग्राहक इस उत्पाद के बारे में जानकारी नहीं रखते थे तथा उनके राजस्व में हितकारी खाद्य उत्पादों का हिस्सा 0.5 प्रतिशत है। इसके उपरांत, हमारे उत्पाद कुछ गुना अधिक खर्चीले थे।"

बिक्री का समीकरण ग्राहक वर्ग के अनकूल बिठाने का अर्थ था टाटा केमिकल्स के द्वारा भरसक सजग कोशिशें करना। पिछले वर्ष के दौरान, न्यूट्रास्यूटिकल्स टीम देश भर की कुछ 3,000 खाद्य कंपनियों और पीढ़ियों से मिली। इनमें से वो 20 को ऑर्डर देने के लिए संमत कर पाई। "हमने इस हद तक का संघर्ष किया है और मेरा मानना है कि अगले पांच वर्ष तक यह संघर्ष जारी रहने वाला है।" डॉ. बासु कहते हैं। "इसकी अपनी अहमियत भी है क्योंकि व्यापार में, छोटी और बड़ी, हर एक बात से रूबरू होना बहुत ही ज़रूरी है। अब हमें पूरा विश्वास है, और फिर टाटा का नाम भी है, इसका अर्थ है कि हम पर भरोसा किया जाएगा और हमें गंभीरता से लिया जाएगा।

"हमें औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही अर्थतंत्र को ध्यान में लेना है, बड़ी खाद्य कंपनियां, छोटे हलवाइयों, बैकरियां और अन्य।" हम सुनते हैं, हम साझा करते हैं और हम सीखते हैं। हम भारत में भारतीयों को पोषण पहुंचाना चाहते हैं और इसमें 90 प्रतिशत अर्थतंत्र अनौपचारिक है। हमारे जैसे औपचारिक कॉर्पोरेट स्वरूप के लिए इस प्रकार के अर्थतंत्र में काम करना मुश्किल है, लेकिन हम कर रहे हैं।"

एड़ीचोटी का ज़ोर और सफलता
टाटा केमिकल्स को संघर्ष का फल मिलना शुरू हुआ है। श्रीपेरूम्बुदुर में रू.300 मिलियन की लागत से स्थापित सुविधा, अब प्रति वर्ष 300 टन से अधिक न्यूट्रास्यूटिकल्स के उत्पादन की क्षमता से लैस है। मार्च 2015 तक इस साहस से रू.13 मिलियन का राजस्व प्राप्त हुआ है, अगले वित्तीय वर्ष में यह बढ़ कर रू.80 मिलियन होने का अनुमान है, और फिर उसके अगले वर्ष रू.840 मिलियन होने का। दीर्घ समयावधि में टाटा केमिकल्स का लक्ष्य, प्रति वर्ष 10,000 एफओएस व जीओएस का तथा 2020 तक रू.1 बिलियन के कारोबार का है।

बात भले ही बहुत बड़ी है, लेकिन जिस प्रकार से अनेकानेक चुनौतियों को पार कर चुके हैं, उसके मद्दे नज़र, डॉ. बासु को पूरा विश्वास है कि यह भी हो सकता है। "तकनीकी, बिक्री कार्य और इसके मापना - इससे हमें जो सीखने मिला वो एक दुष्कर आरोहण के समान रहा है," वे कहते हैं। "हमारे लिए एक अहम समस्या थी, कि हमारे उत्पादों को ग्राहकों की प्रणाली में कैसे शामिल किया जाए।" कोई भी ग्राहक अपनी प्रक्रिया में सिर्फ इस कारण से बदलाव नहीं करेगा कि, कोई बंदा नया घटक ले कर आ गया है, अतः हमें हमारे उत्पादों से उनको परिचित करवाना था, बिना किसी विध्वंस से नवसृजन के। "यही बात स्वाद को भी लागू होती है, इससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता।"

टाटा केमिकल्स का मुख्य घटक एफओएस को फोसन्स के नाम से जाना जाता है, प्राकृतिक रूप से मीठा प्रीबायोटिक आहारजन्य रेसा, जिसमें कुछ हितकारी फायदे हैं। चौधरी बताते हैं, "फोसन्स का इस्तेमाल भारत में प्रत्येक मीठाई और बैकरी शॉप में किया जा सकता है।" "ग्राहक की ज़रूरतों को पूरा करने में ही सफलता छूपी है।"

जैसे आशा की किरणें हैं, निराशाओं का ढ़ेर भी है। डॉ. बासु कहते हैं, "प्रत्याशित और अप्रत्याशित अवरोधों के कारण जन्मी अनेक हताशाओं को हम झेल चुके हैं," "आखिर में सफलता एक इत्तफाक है, हमारी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इत्तफाक होता है।"

वो पथ, आने वाले भविष्य में, टाटा केमिकल्स की ओर अग्रसर होगा और न्यूट्रास्यूटिकल्स की उसकी जो प्रस्तुतियां हैं, उनमें और भी कई प्रस्तुतियां जोड़ देगाः औऱ वे इनसे संबंधित होंगी - पाचन आरोग्य, प्रतिरोध क्षमता बढ़ाना, वज़न प्रबंधन, हृदय समस्या से लड़ना। व्यक्तिगत ग्राहकों को सीधे ही बिक्री करने का मौका भी है, डॉ. बासु कहते हैं, "खुराक एक कैन्वस जैसा है, एक विराट कैन्वस।" "आप आखरी उपभोक्ता के जितने करीब होते हैं, उतना ही अधिक खुद का मूल्य जानते, समझते हैं। एक समय में हम एक कदम उठाएंगे और वो करेंगे जिससे हम असंतुलित मूल्य को अपने हाथ कर पाएं।"

न्यूट्रा क्या है?
आधुनिक औषधशास्त्र के पितामह हिपोक्रेट्स ने कहा था, 'खुराक ही आपकी औषधि हो'। न्यूट्रास्यूटिकल्स, उसी को पूरा करने में मिलने वाली एक मदद है।

'न्यूट्रिशन' (पोषण) औऱ 'फार्मास्यूटिकल' (औषधि) का संमिलित रूप यानी न्यूट्रास्यूटिकल्स - इस शब्द के जनक हैं स्टीफन दफेलिस नामक एक अमेरिकी डॉक्टर, 1989 में उन्होंने यह शब्द दिया - ये ऐसे एडिटिव हैं जो दालें, सूप और पेय पदार्थों जैसे खुराक का 'हितकारी गुणधर्म' बढ़ाते हैं। इस वर्ग के श्रेष्ठ खाद्य उत्पाद अनेकों फायदे पहुंचाते हैं - रोगप्रतिरोध तंत्र बेहतर बनाना, आंतों के स्वास्थ्य में सुधार, जटिल रोगों से बचाव, यहां तक कि बुढ़ापे की प्रक्रिया धीमी करना।

न्यूट्रास्यूटिकल्स के छत्र तले पूरक आहार एवं कामकाजी आहार (फंक्शनल फुड) आते हैं। पूरक आहार में खाद्य उत्पादों से प्राप्त किए गए पोषक तत्व आते हैं और उन्हें तरल, कैप्सूल, पाउडर या गोली के रूप में पैक किया जाता है। कामकाजी आहार में उन खाद्य चीज़ों को समावेशित किया जाता है जो अच्छे आरोग्य को बढ़ावा देने वाली हैं या उन्हें इसके योग्य बनाया गया यानी फोर्टिफाई किया गया है।

प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स, न्यूट्रास्यूटिकल्स की दो विशिष्ट श्रेणी हैं। प्रीबायोटिक्स विलेयशील आहारजन्य रेसे हैं जो पाचन तंत्र में अच्छे जीवाणु की वृद्धि करते हैं और उनकी प्रभावोत्वादकता बढ़ाते हैं। प्रोबायोटिक्स खुद ही तथाकथित् अच्छे जीवाणु हैं, आंतों का आरोग्य सुधारने के लिए इन्हें सीधे ही आहार में लिया जा सकता है।

न्यूट्रास्यूटिकल्स, माइक्रोबायोलॉजी विज्ञान से जन्मे हैं, इसके माध्यम से प्रकृति में जिनका अस्तित्व है ऐसे माइक्रोब्स को अलग किया जाता है और स्वास्थ्यप्रद फुड एडिटिव्स बनाने में इनका इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार के माइक्रोब्स ज़मीन और जैव वैविध्य वाले प्राकृतिक स्थल, जैसे कि भारत में पश्चिम घाट - में पाये जाते हैं।

टाटा केमिकल्स के न्यूट्रास्यूटिकल्स साहस के प्रेरक अरूप बासु कहते हैं, "आपका विज्ञान ज्ञान, इसे निचोड़ पाने की आपकी क्षमता, वृद्धि एवं सुधार करने की आपकी क्षमता - ये वो बातें हैं जो तय करती हैं कि आप कितना आगे जा सकते हैं।" "प्रकृति से अणुओं को पा कर आप आला सूपकार बनने की प्रेरणा पा सकते हैं, और केवल आपकी कल्पना ही आपको सीमित कर सकती है।"