मई 2017 | नम्रता नरसिम्हन

हर बच्चे के लिए एक कहानी

पराग, टाटा ट्रस्ट का एक उपक्रम, साहित्य और समाज को और भी संयुक्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता बनाते हुए दिव्यांग बच्चों के लिए किताबों के संसार का दरवाजा खोलता है

किताबों के संसार को दिव्यांग बच्चों के लिए खोलना साहित्य तथा समाज को और भी निकट लाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।

“इस स्पर्धा ने मालाथी को कुछ ऐसा सिखाया जिसे वह नहीं भूली। वह जितना प्रयास करती उतना जीत सकती थी। और मालाथी के सपने और बड़े होते गए। वह मालाथी होल्ला थी, एक लड़की जिसे उड़ने के लिए पंखों की जरूरत नहीं थी।”

तूलिका की किताबें नौ भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हैं ताकि अधिक से अधिक बच्चे इन्हें पढ़कर इनका आनंद उठा सकें

विशेष रूप से दिव्यांग भारतीय एथलीट मालाथी होल्ला की सच्ची कहानी का अंत विंग्स टू फ्लाई में एक सुखद टिप्पणी के साथ होता है, यह एक प्यारी किताब है जिसे टाटा ट्रस्ट के पराग प्रयास के तहत तूलिका ने प्रकाशित किया है। आकर्षक और संवेदनशील कल्पनाओं द्वारा रची गई यह किताब एक युवा लड़की के जीवन और अपनी अक्षमता की वजह से सीमित न रहने की उसकी संकल्पशक्ति को पुनः साकार कर देती है। इस किताब की शैली मनोरंजक है, इसकी भाषा में भावुकता नहीं है और विकलांगता का यथार्थ चित्रण किया गया है।

पराग एक अखिल भारतीय प्रयास है जिसे भारतीय भाषाओं में अच्छी गुणवत्ता का बाल साहित्य सृजित करने के लिए टाटा ट्रस्ट के तहत 2006 में प्रारंभ किया गया था, जिसका उद्देश्य साहित्य को और भी सहज रूप से प्राप्य, सामयिक, सार्थक तथा समन्वित बनाना रहा है। विंग्स टू फ्लाई जैसे शीर्षकों के माध्यम से, पराग प्रयास का उद्देश्य बाल साहित्य में अक्षमता को एक प्रमुख स्थान देना तथा दिव्यांग लोगों को स्वीकार करने तथा उनके लिए ज्यादा संवेदनशील होने में बच्चों की सहायता करना है।

“भारत में बच्चों के लिए हर साल सैकड़ों नए शीर्षक प्रकाशित किए जाते हैं, लेकिन कुछ मुट्ठी भर बाल पुस्तकों की कहानी में ही दिव्यांग लोगों का चित्रण किया जाता है। और ऐसी किताबें जिनमें विकलांगता का यथार्थ चित्रन किता गया है, वे तो दुर्लभ ही हैं”, कहती हैं स्वाहा साहू, जो टाटा ट्रस्ट के पराग प्रयास की प्रमुख हैं। 2011 की जनग़णना के अनुसार भारत में 26.8 मिलियन दिव्यांग लोग रहते हैं। फिर भी, जैसा कि सुश्री साहू कहती हैं, “अक्षमता को न दिखाने की प्रवृत्ति इस जटिल समस्या का एक पहलू है; और इसका दूसरा पहलू दिव्यांग लोगों का चित्रण अतिशय वीरता के रूप में करना है। अतिशय- संतुलन पैदा करने के प्रयास में, इस प्रकार से रचे गए चरित्रों को बच्चे आसानी से पहचान नहीं पाते।”

इस साहित्यिक पूर्वाग्रह के कारण, दिव्यांग बच्चे किताबों में विश्वसनीय चरित्रों को न देखते हुए बड़े होते हैं, और जो बच्चे दिव्यांग नहीं हैं अक्सर दिव्यांग लोगों के जीवन अनुभवों के बारे में उनकी समझ सीमित होती है। “जबतक ऐसी किताबें न हों जो हमारे आसपास के दिव्यांग लोगों की उपस्थिति को एक संवेदनशील किंतु सामान्य तरीके से दर्ज करती हैं, हम किसी भी ठोस तरीके से समावेशन के लक्ष्य को नहीं समझ पाएंगे”, सुश्री साहू कहती हैं। “समावेशन का मतलब है कि सभी बच्चों को अपने आपको चित्रों तथा कहानियों में सकारात्मक रूप से अभिव्यक्त अनुभव करने में समर्थ होना चाहिए।”

पराग प्रयास के अंतर्गत, टाटा ट्रस्ट ने तूलिका प्रकाशन के सहयोग से तीन किताबों के प्रकाशन में सहयोग किया है: कैच दैट कैट,  विंग्स टू फ्लाई  तथा कन्ना पन्ना इन कहानियों तथा वर्णनों में सावधानीपूर्वक उस परंपरागत छवि और चित्रण से परहेज किया गया है जो दिव्यांग लोगों से जुड़ी है। यह सुनने में जितना आसान है उतना है नहीं। नैंसी राज, चित्र पुस्तक कैच दैट कैट की चित्रकार, चेन्नई में एक स्कूल के दौरे को याद करती हैं जहां वे शारीरिक भंगिमा, गति, तथा व्हीलचेयर पर बच्चों की अभिव्यक्तियों का अध्ययन करने गई थीं जिससे व्हीलचेयर पर एक बच्चे का सही-सही चित्रण किया जा सके। वह दौरा एक चरित्र ‘डिप डिप’ के सृजन के लिए था, जो कैच दैट कैट का एक बेहद प्यारा नटखट मुख्य चरित्र है।

तूलिका की किताबें नौ भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित की गई हैं जिससे कि एक बड़ी संख्या में बच्चे और खासतौर पर वे बच्चे जो अंग्रेजी भाषी महानगरों से बाहरी इलाकों में रहते हैं, इन कहानियों को पढ़ सकें और समावेशन का संदेश प्राप्त कर सकें।

पराग का पुस्तक विकास कार्य के तहत पुस्तकालयों के साथ कार्य को सम्मिलित किया गया है। पिछले वर्ष तक, पराग ने 40,000 बच्चों तक पहुंच सुनिश्चित करते हुए आठ राज्यों के 600 पुस्तकालयों को सहायता प्रदान की है। इसने क्षमता निर्माण में भी निवेश किया है और बच्चों को प्रभावी रूप से सम्मिलित करने में शिक्षाविदों की सहायता के लिए पुस्तकालय शिक्षण प्रमाणपत्र पाठयक्रम भी शुरू किया है। इसके प्रारंभिक प्रॉजेक्ट में अंग्रेजी और हिंदी के 30 प्रतिभागियों को सम्मिलित किया गया है। पराग का लक्ष्य तीन क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मिलित करना और अगले पांच वर्षों में 500 पुस्तकालय शिक्षकों की क्षमता विकसित करनी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बच्चे को प्राथमिकता
इस प्रकार की और किताबें सृजित करने की इच्छा के साथ, पराग टीम ने चिल्ड्रेन फर्स्ट नामक एक प्रतियोगिता का आयोजन करने के लिए डकबिल पब्लिशर्स के साथ मिलकर काम करना तय किया है।

सुश्री साहू स्पष्ट करती हैं कि यह चिल्ड्रेन फर्स्ट के पीछे दिव्यांग बच्चों के वर्णन वाली कहानियों तथा चित्रों की रचना के लिए लेखकों तथा चित्रकारों को प्रोत्साहित करने का विचार काम कर रहा था। “यह महत्वपूर्ण है कि लेखक और चित्रकार इस बात को समझें कि ये बच्चे प्राथमिक महत्व के बच्चे हैं। ये शरारती, जिद्दी, चंचल, खुश, बेचैन हो सकते हैं, किसी भी अन्य बच्चे की तरह। हमें इन बच्चों के लिए और इनके बारे में और संवेदनशीलता के साथ लिखी हुई और चित्रित और अधिक कहानियों की जरूरत है।”

डकबिल को भी, जिसे प्रख्यात संपादक सायोनी बसु तथा बाल लेखिका अनुष्का रविशंकर द्वारा 2012 में स्थापित किया गया, भी इसके साथ जुड़ने से बेहद खुशी हुई। उन्होंने अक्टूबर 2016 में प्रतियोगिता का आयोजन किया, और लेखकों को विभिन्न श्रेणियों- चित्र पुस्तक, सचित्र पुस्तक तथा अध्ययन पुस्तक में कहानियां प्रस्तुत करने के लिए एक माह का समय दिया गया।

स्पर्शनीय सचित्र पुस्तकें, जो सीआरसी द्वारा तैयार की गई हैं, दृष्टिबाधित बच्चों के लिए स्वयं से पढ़ने में सहायक होंगी (इन पुस्तकों में पाठ को ब्रेल के साथ छपाई में भी दिया गया है)

टीम इस बारे में शंकित थी कि इस प्रतियोगिता को कैसे देखा जाएगा, और उन्हें इसके प्रति उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया से आश्चर्य हुआ। 60 प्रतिभागियों की आशा के बदले में, उन्हें अंत तक 162 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। सुश्री बसु कहती हैं, “हमें बेहद खुशी हुई क्योंकि वहां विषय के साथ स्पष्ट रूप से बहुत बड़ी संख्या में जुड़ाव, लेखन के प्रति बेहद उत्साह था, और लेखन की गुणवत्ता भी बेहतरीन थी।”

एक विजेता प्रविष्टि में डकबिल को जिसकी तलाश थी वह परंपरा से अलग कुछ होना था। सुश्री रविशंकर एक दिलचस्प कहानी के अंदाज में इसे स्पष्ट करते हुए कहती हैं, “जिस तरीके से विभिन्न क्षमताओं के साथ व्यवहार किया गया”, वह एक महत्वपूर्ण मानदंड था। “हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि ज्यादातर लोगों ने इन चरित्रों को पीड़ित और ‘बेचारे लोग’ मानते हुए कहानियों का अंत नहीं किया था।”

पराग विजेता प्रविष्टियों को किताब के रूप में प्रकाशित करने में सहयोग देंगे। टाटा ट्रस्ट इस प्रतियोगिता की सफलता के लिए इतना जरूरी क्यों था, स्पष्ट करते हुए, सुश्री रविशंकर कहती हैं, “टाटा ट्रस्ट के बिना, हमें इस स्तर का प्रचार-प्रसार और इतनी बड़ी संख्या में प्रविष्टियां नहीं मिल पातीं, जो हमें मिली हैं। इस तरह की प्रतियोगिताओं के लिए बहुत से साधनों और समय की जरूरत होती है, और टाटा ट्रस्ट की मदद से हमें यह प्राप्त हो पाया।  यह उन्हीं की वजह से हुआ कि इस प्रतियोगिता को केवल प्रकाशकों द्वारा किताबें हासिल करने के बदले इतने व्यापक और विशाल पैमाने पर प्रदर्शन प्राप्त हुआ।”

बच्चों के लिए अतिरिक्त मनोरंजक पठन सामग्री की उपलब्धता की तलाश में, टाटा ट्रस्ट ने और ज्यादा किताबों की जरूरत महसूस की, जिसे दिव्यांग बच्चों द्वारा आसानी से उपयोग किया जा सकता हो। 2012 में, उन्होंने चेन्नई में रचनात्मक संसाधन केंद्र (सीआरसी) स्थापित करने के लिए कराडी कल्चरल एलियांस ट्रस्ट के साथ सहभागिता की।

सीआरसी में गैर अकादमिक किताब, ब्रेल किताब, ध्वनि किताब, स्पर्शनीय किताब तथा खिलौने का एक पुस्तकालय है, जिसमें भारत की प्रसिद्ध लोककथाएं ध्वनि प्रारूप में हैं। दृष्टि अक्षम लोगों के लिए एक संसाधन केंद्र होने के अलावा, यह केंद्र पराग द्वारा उपलब्ध कराई गई निधि की मदद से किताबों को ब्रेल में रूपांतरित करने में भी सक्रिय रूप से कार्यरत है। हालिया एक पाइलट परियोजना के तहत, इसे सभी राज्यों तथा देश भर में दुहराए जाने की योजना है।

ब्रेल बूस्ट
कराडी कल्चरल एलियांस ट्रस्ट की प्रबंध ट्रस्टी, शोभा विश्वनाथ इस काम के बारे में बताती हैं: “एक ऐसी परियोजना जो हमें प्यारी थी, दृष्टि अक्षम बच्चों के लिए स्पर्शनीय चित्र पुस्तक तैयार करने से संबद्ध थी। हमारी किताबों में वर्णन ब्रेल के साथ ही छपा हुए रूप में भी था, ताकि बच्चे इसे खुद से भी पढ़ सकें और उनके देखभाल करने वाले भी पढ़ने में उनकी मदद कर सकें। हम बच्चों के लिए स्पर्शनीय खिलौने भी उपलब्ध कराते हैं।”

पराग प्रयास के तहत, टाटा ट्रस्ट ने ब्रेल में लगभग 115 किताबें, 80 के लगभग ध्वनि पुस्तकें तथा 12 स्पर्शनीय किताबें तैयार करने में सीआरसी की सहायता की। इनमें ज्यादातर किताबें अंग्रेजी और तमिल में हैं। यह केंद्र आयोजनों की मेजबानी भी करता है जैसे कहानी कथन सत्र, कार्यशालाएं, सहायता समूह तथा थिएटर गतिविधियां।

सुश्री साहू सीआरसी में ट्रस्ट की अभिरुचि स्पष्ट करती हैं:  “किताबों तक दिव्यांगों के लिए सहज प्राप्ति न होने से एक बहिष्करण स्थायी होने लगता है। साहित्य बच्चों को अपने और अपने आसपास के वातावरण के बारे में एक समझ प्रदान करता है।” यह केंद्र अभी एक नए परिसर की तलाश में है।

पराग के माध्यम से, टाटा ट्रस्ट ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के बच्चों के लिए और भी कहानी की किताबों के रूपांतरण के लिए, ऑल इंडिया कनफेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड (एआईसीबी) के साथ भी सहयोग किया है, जो दिल्ली में अवस्थित गैर लाभकारी संगठन है। एआईसीबी ने ब्रेल में 15 हिंदी शीर्षकों की मुख्य प्रतियां तथा चकमक के 12 अंक तैयार किए, जो हिंदी की एक पत्रिका है और इसका चुनाव इसकी आयु- उपयुक्तता की वजह से किया गया। उन्होंने हिंदी भाषी क्षेत्र में दृष्टि बाधित बच्चों के लिए स्थापित लगभग 100 संस्थानों में बांटने के लिए हर किताब की 125 प्रतियां तैयार कीं।

पराग, यह देखने के लिए कि किस तरह इसकी किताबों और पठन सामग्रियों को और अधिक बच्चों तक पहुंचाया जा सकता है, और अधिक संस्थानों, खासतौर पर सरकारी संस्थानों के साथ गठबंधन की योजना पर विचार कर रहा है। पराग प्रयास के तहत काम करनेवाली टीम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन इसकी प्रेरणा बहुत बड़ी है। इन्हें अपेक्षाकृत बड़े लेखन क्षेत्र, और व्यापक रूप से राष्ट्र को प्रभावित करने की आशा है।