फरवरी 2017 | नितिन राव

अंतिम तबके को जोड़ना

टाटा ट्रस्ट का विशेष प्रौद्योगिकी-समर्थित आंकड़ा-आधारित प्रशासनिक कार्यक्रम सरकारी हस्तक्षेपों तथा भारत के ग्रामीण गरीब तबकों के बीच के अंतराल को पाटने का प्रयास करता है

महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले का भारी ग्राम तेलंगाना की सीमा से मुश्किल से 10 किमी दूर है और इस इलाके के सर्वाधिक पिछड़े गांवों में आता है। यह सालों भर पानी की कमी से त्रस्त है और यहां गाड़ियों के चलने लायक सड़कें भी नहीं हैं। भारी को सरकार के रडार पर लाने वाली बात ये हुई कि इसे एक अनोखे डेटा-संग्रह प्रयास का लाभ मिला है, जिससे डेटा प्रदर्शन औजारों के जरिए जमीनी हकीकतों को सामने लाने में सहायता मिली है।

भारी, भारत के ग्रामीण युवा स्वयंसेवक, टाटा ट्रस्ट के आंकड़ा-आधारित प्रशासन कार्यक्रम के एक भाग के रूप में आंकड़े एकत्र करने के लिए स्मार्ट साधनों का इस्तेमाल करते हुए

भारी टाटा ट्रस्ट के सौजन्य से आयोजित आंकड़ा-आधारित प्रशासनिक कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण विकास के नए दृष्टिकोण का प्रमाण है। स्थानीय, राज्य तथा केंद्र स्तर पर सरकारी निकायों तथा निर्णयकर्ताओं को सम्मिलित करते हुए, इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की अभिवंचित ग्रामीण आबादी के लिए प्रौद्योगिकी तथा आंकड़ों के उपयोग द्वारा बेहतर जानकारी के आधार पर नीति-निर्माण और उसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया में मदद पहुंचाना है। संक्षेप में, यह अंतिम तबके के लोगों को सरकारी योजनाओं तथा नीतियों से जोड़ने के कार्य में, जरूरतमंद तथा राज्य के बीच एक पुल के रूप में सहायता प्रदान करता है।

यह भारी परियोजना, मिसाल के तौर पर, प्रधानमंत्री की संसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) के लक्ष्यों के अनुरूप है। एसएजीवाई एक प्रयास है जिसके अंतर्गत प्रत्येक सांसद को अपने निर्वाचन-क्षेत्र का एक गांव विकसित करने के लिए गोद लेने को कहा गया है।

सब प्रकार से, भारी इसे मिलनेवाले सभी प्रकार के विकासात्मक समर्थन के लिए योग्य है। इस पहाड़ी खंड की तकरीबन 80 प्रतिशत आबादी जनजातीय है, जो दारुण दारिद्र्य में रहती है। सतीश कोटनाके, भारी के 37 वर्षीय सरपंच, पानी की कमी को इस इलाके की एक भयानक समस्या बताते हैं। वे कहते हैं, “यहां के ज्यादातर लोग किसान हैं और मुख्य फसल कपास है”।

वर्षा पर निर्भरता
भारी की पहाड़ी ढलानों पर सिंचाई के अभाव में किसान इस जल-आग्रही फसल के लिए वर्षाजल पर निर्भर हैं। इस वर्ष प्रचुर बारिश से, खेती की उपज ज्यादा हो गई है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। “इस साल मानसून ठीक था, लेकिन पिछले साल ठीक नहीं था”, टाटा ट्रस्ट्स के कार्यक्रम अधिकारी, परेश मनोहर स्पष्ट करते हैं। “हर दूसरे साल यहां सूखा पड़ता है। इसके अलावा, किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिलता।”

यहां तो जीवनयापन करना भी मुश्किल है। सार्वजनिक परिवहन सेवा नाममात्र ही है जिसमें एक राज्य परिवहन की बस रोजाना गांव तक आती-जाती है। “चंद्रपुर के इस इलाके में समस्या यह है कि यहां पहाड़ों में कुछ ही सड़कें गाड़ियों के चलने लायक हैं।” एक ग्रामीण, धनंजय लोखंडे कहते हैं। इस इलाके में परिवहन के अभाव का मतलब है कि ग्रामीणों को दूरस्थ बाजारों तक अपने उत्पाद ले जाने के लिए गाड़ी-भाड़ा करने में ज्यादा पैसा खर्च करना होगा। श्री लोखंडे बताते हैं, “यहां के लोगों के सामने मौजूद अन्य समस्याओं में स्वच्छता और बिजली का अभाव भी शामिल हैं।”

यहां की खराब स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था एक प्रमुख चिंता का विषय था, जो भारत के ठेठ दूरदराज के इलाके जैसी ही है। इस इलाके में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं वस्तुतः अस्तित्व में ही नहीं हैं- यहां मेडिकल आपात-स्थितियों के लिए एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है; स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में केवल एक नर्स है जो महिलाओं के प्रसव के लिए है; हृदय तथा अन्य रोगों के लिए यहां कोई डॉक्टर नहीं है।

भारी, भारत में टाटा ट्रस्ट के आंकड़ा-आधारित प्रशासन कार्यक्रम के लिए सामुदायिक मानचित्रण अभ्यास में भाग लेती हुई ग्रामीण महिलाएं

वास्तव में, भारी तथा इसकी गरीब आबादी के सामने मौजूद इन सभी समस्याओं को अब अभिलेख में दर्ज कर लिया गया है, जिसका श्रेय टाटा ट्रस्ट के आंकड़ा-आधारित प्रशासन कार्यक्रम को जाता है। यह कार्यक्रम पिछले वर्ष शुरू किया गया, जब ट्रस्ट ने महाराष्ट्र के वित्त, योजना तथा वन मंत्री, एवं चंद्रपुर के अभिभावक मंत्री सुधीर मुंगांतीवार से संपर्क और विचार-विमर्श किया था। एसएजीवाई के अंतर्गत, तीन तालुका चुने गए हैं- मुल, पोम्भुरना तथा जिवाती- और आंकड़े जमा करने का काम अक्टूबर 2015 में शुरू किया गया।

ट्रस्ट ने आंकड़े जमा करने के लिए आसपास के गांवों के युवाओं को स्वयंसेवक के तौर पर प्रशिक्षित किया। इस इलाके में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों को भी इस विस्तृत आंकड़ा एकत्रीकरण अभ्यास में स्थानीय सहयोगी के रूप में जोड़ा गया। “हमारे स्वयंसेवकों ने तीन तालुका की 115 ग्राम पंचायतों [ग्राम-स्तरीय प्राशासन] को शामिल किया”, कहते हैं संदीप सुखदेव, जो स्पर्श (चंद्रपुर में सहभागी शिक्षण का केंद्र तथा एक स्वयंसेवी संगठन जो इस परियोजना से संबद्ध है) में प्रमुख प्रशिक्षक हैं।

विविध समस्याएं
इस सर्वेक्षण में कृषि, शिक्षा, सड़क तथा वित्तीय मामलों सहित कुछ और समस्याओं को भी शामिल किया गया। “हमने पाया, उदाहरण के लिए, कि भारी गांव में आधार बहुत कम लोगों तक पहुंचा है”, श्री मनोहर कहते हैं। यह सरकारी योजनाओं तथा लाभ पहुंचाने के प्रयासों के मार्ग में बाधक है, जिसे गामीणों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

सब मिलाकर, तीन खंडों के प्रत्येक घर के सदस्य से मिलने के लिए लगभग 900 स्वयंसेवकों को तैनात किया गया, जो मुख्य पहलुओं जैसे शिक्षा, सामाजिक विकास, आजीविका, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तथा स्वयं-शासन पर संदर्भित सूचनाएं एकत्र कर रहे हैं। लगभग 50,000 घरों तथा तथा 165,000 की आबादी को परियोजना के पहले चरण में शामिल किया गया, जो लगभग साल भर तक चला।

टीम ने नामित सरकारी अधिकारियों के साथ घनिष्ठ रूप से मिलकर कार्य किया। ‘हमें स्थानीय प्रशासन का सहयोग मिला”, श्री मनोहर कहते हैं। इस सहयोग के क्रम में श्री कोटनाके, जो खुद भी भारी में सरकार द्वारा नियुक्त खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) हैं, को इस परियोजना के कार्यान्वयन में ग्रामपंचायत सदस्यों का सहयोग मिला।

ग्रामीणों को इसमें सम्मिलित करने से यह सुनिश्चित हुआ कि इस अभ्यास में ज्यादा से ज्यादा लोगों की हिस्सेदारी रही तथा इसके परिणाम अधिक प्रभावी रहे। अमोल दुर्गे, जो भारी के एक किसान हैं, ने इस परियोजना में स्वयंसेवक का काम किया है और पाया कि कई ग्रामीण उनके लिए उपलब्ध कई प्रकार की सरकारी योजनाओं से अवगत नहीं थे।

महाराष्ट्र- तेलंगाना सीमा के नजदीक बसे होने की वजह से, भारी तथा आसपास के गांवों के निवासी तीन भाषाओं से पूरी तरह परिचित हैं: मराठी और तेलुगु के साथ ही उनकी आदिवासी भाषा गोंडी से भी। “हमने अपने युवा स्वयंसेवकों को सिखाया कि इन ग्रामीणों से उनकी भाषा में कैसे बात की जाए”, पी नारायणन कहते हैं, जो बीए में अध्ययन कर रहे हैं और अभी टाटा ट्रस्ट के लिए स्वयंसेवक का काम भी कर रहे हैं।

जब आंकड़े जमा करने का काम समाप्त हो गया, तो टाटा ट्रस्ट्स की टीमों ने इसके परिणामों के आधार पर विकास योजना प्रतिवेदन प्रस्तुत किए। “हमने इन्हें ग्राम पंचायत में प्रस्तुत किया”, श्री मनोहर कहते हैं। ये रिपोर्ट एक डैशबोर्ड के रूप में उपलब्ध हैं- यह एक आंकड़ा प्रदर्शन माध्यम है, जिसमें आंकड़ों की वर्तमान स्थिति तथा इलाके में नीतिगत हस्तक्षेपों तथा सरकारी विकास योजनाओं के मुख्य कार्यप्रदर्शन संकेतक प्रदर्शित किए जाते हैं। अगले चरण में, जब सरकारी एजेंसियां उन समस्याओं का समाधान करना शुरू कर रही हैं, जिन्हें अब तक नहीं छुआ गया है, टाटा ट्रस्ट्स ने इनके समाधान के लिए अपने प्रयासों के साथ कदम बढ़ाए हैं, जैसे तीन गांवों में टाटा वाटर मिशन के तहत सुरक्षित पेयजल मुहैया कराना। “टाटा वाटर मिशन प्रत्येक व्यक्ति के लिए मात्र 2 रुपए में 20 लीटर पानी उपलब्ध कराएगा”, श्री कोटनाके कहते हैं।

चंद्रपुर के तीन गांवों- तथा तीन और राज्यों के अन्य गांवों में रहनेवाले लोगों के लिए टाटा ट्रस्ट का यह आंकड़ा-आधारित प्रशासन कार्यक्रम विकास नियोजन की प्रकृति में परिवर्तन के लिए तैयार किया गया है। इस क्रम में, यह आंकड़ा-आधारित प्रशासन के नए मॉडल का एक उदाहरण स्थापित करता है, जिसे देश के अन्य भागों में भी दुहराया जा सकता है।

यह लेख सबसे पहले टाटा रिव्यू के जनवरी-मार्च 2017 के संस्करण में प्रकाशित हुआ था। ईबुक यहां पर पढ़ें