जून 2017

'गरीबी को गरीबों ने नहीं बनाया है'

मोहम्मद यूनुस, नोबल शांति पुरस्कार विजेता तथा माइक्रोक्रेडिट तथा माइक्रोफाइनांस के प्रणेता, यूनुस सोशल बिजनेस- टाटा ट्रस्ट्स के आईसीएटी प्रयास तथा गरीबी उन्मूलन के बारे में बात कर रहे हैं

"एक बार जब गरीबी चली जाती है, तो हमें भावी पीढ़ियों को इसकी भयावहता दिखाने के लिए संग्रहालय बनाने की जरूरत होगी, " मोहम्मद यूनुस ने एक ऐसे उद्देश्य के बारे में कहा, जिसके लिए उन्होंने अपना अधिकांश जीवन समर्पित कर दिया है। लघुबचत तथा लघुवित्त के प्रणेता को ‘गरीबों के बैंकर’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन वे इससे ज्यादा बहुत कुछ हैं: अर्थशास्त्री, प्रोफेसर, सामाजिक उद्यमी तथा एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी जिसने हमेशा गरीबी से त्रस्त लोगों की रक्षा की है।

प्रोफेसर यूनुस तथा ग्रामीण बैंक जिसे उन्होंने स्थापित किया है को 2006 में संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है

वर्ष 2006 में, श्री यूनुस को उनके द्वारा स्थापित पथप्रदर्शक संस्थान, ग्रामीण बैंक के साथ संयुक्त रूप से शांति के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। छोटे कर्ज बांटकर, इस बैंक ने वंचित वर्ग के लाखों लोगों की सहायता की है- जिनमें बहुत बड़ी संख्या महिलाओं की है- जिससे उनका जीवन बेहतर बना है। क्रिस्टाबेल नॉरोन्हा के साथ एक बातचीत में, 76 वर्षीय श्री यूनुस लघुबचत, समृद्धि विषमता, व्यवसाय का सामाजिक पक्ष तथा अन्य के बारे में बातें करते हैं। कुछ अंश:

क्या आप मुझे अपने शुरुआती दिनों और उन प्रभावों के बारे में बताएंगे जिन्होंने आपको एक युवा व्यक्ति के रूप में आकार दिया?
मैंने अपना शुरुआती बचपन ग्रामीण बांग्लादेश में बिताया तथा मेरे जीवन के शुरुआती वर्षों में मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। हम सात भाई-बहन थे और हमारे माता-पिता ने हमारे भीतर सही मूल्य स्थापित करना सुनिश्चित किया। हम चिटगांग चले आए जब मैं मुश्किल से चार वर्ष का था और मैं एक स्थानीय स्कूल में भर्ती कर दिया गया जहां ज्यादातर दिहाड़ी मजदूरों के बच्चे पढ़ते थे।

मैं अपने आसपास के लोगों और घटनाओं को हमेशा गौर से देखा करता था। इसने कुछ अर्थों में, दुनिया के बारे में मेरा नजरिया बनाने में सहायता की। मैं अपने स्कूली दिनों में छात्र बालचर था और इससे मुझे कुछ यूरोपीय देशों और कनाडा का भ्रमण करने का मौका मिला। मैं भाग्यशाली रहा कि मुझे ऐसे शिक्षक मिले जिन्हों न केवल मुझसे अपना ज्ञान बांटा बल्कि मुझे जीवन के उद्देश्य के बारे में प्रश्न करने के लिए उत्साहित किया।

कहा जाता है कि 1974 के बांग्लादेश के अकाल से गरीबी उन्मूलन के लिए आपके विचारों और प्रयासों को दिशा और आकार मिला। वह कौन सा समय था, जब गरीबों के लिए सरकार से बाहर किसी एजेंसी के मार्फत, लघु वित्त के विचार को आकार मिला?
जब 1974 में अकाल पड़ा था तो मैं संयुक्त राज्य अमेरिका में शिक्षक था। मुझे यह जानकर काफी झटका लगा कि लोग इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उनके पास खाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसा नहीं था कि देश में खाना उपलब्ध नहीं था, बल्कि इसलिए कि वे उसे खरीद नहीं सकते थे। मैंने यह सोचने का प्रयास किया कि किस तरह मैं अपने तुच्छ प्रयासों से समाज के लिए कुछ कर सकता था, शायद जरूरत के इस समय में कम से कम एक गरीब गांव की ही मदद करके।

जिस बात से मुझे दुख हुआ वह, यह तरीका था, जिसके द्वारा कर्ज देनेवाले साहूकार ग्रामीणों का शोषण कर रहे थे। मैं इसे खत्म करना चाहता था। मैंने उन्हें इससे अलग करने की कई तरह से कोशिश की, लेकिन यह आसान नहीं था क्यों वे इस जाल में पूरी तरह उलझे हुए थे। अंततः मेरे सामने यह साफ हो गया कि एक ही तरीके से मैं यह काम कर सकता हूं, और वह खुद से कर्ज उपलब्ध कराना ही है।

1976 में मैंने अपनी जेब से कर्ज देने की शुरुआत की। यह सूझ काम कर गई और जल्द ही यह संदेश फैलने लगा। धीरे-धीरे कर्ज के नेटवर्क का विस्तार हुआ और 1983 में, मैंने इस काम के लिए एक बैंक की स्थापना की। यह ग्रामीण बैंक जल्द ही पूरे देश में फैल गया, न केवल बड़े पैमाने पर, बल्कि अपने अनोखेपन के साथ, जिसके तहत खासतौर पर गरीबों में भी सबसे गरीब और खातौर पर महिलाओं के लिए विशेष रूप से सेवा प्रदान की जाती है। अभी हमारे लगभग 9 मिलियन कर्जप्राप्तकर्ता हैं, जिनमें 97 प्रतिशत महिलाएं हैं।

ग्रामीण बैंक से पैदा सामजिक उद्यमिता ने कई महिलाओं को कड़ी मेहनत करने से प्राप्त समृद्धि का अहसास कराया है, जिससे न केवल उनके परिवारों को सहायता मिल रही है बल्कि जिसके माध्यम से वे सम्मान के साथ अपनी आजीविका कमा रही हैं। चूंकि यह बैंक कर्जप्राप्तकर्ताओं का ही है, इसलिए वे अपने नियम खुद बना सकते हैं और खुद निर्णय ले सकते हैं। इसमें कोई अतिरिक्त सहायक सम्मिलित नहीं है और बिना किसी कानूनी कागजी कार्रवाई के ही कर्ज दिए जाते हैं जो कर्ज प्राप्तकर्ता तथा बैंक पर बाध्यकारी होते हैं। ग्रामीण बैंक केवल विश्वास पर काम करता है।

ग्रामीण बैंक के पीछे आधारभूत विचार पूरे विश्व में फैल गया तथा लघुबचत, या लघुवित्त, इसके मूल में है। हमें अमेरिका में अपने संचालन की शुरुआत के लिए आमंत्रित किया गया और यहां हमारी 19 शाखाएं तथा 90,000 कर्जप्राप्तकर्ता हैं, जो सभी महिलाएं हैं। वे किसी मध्यस्थ के बिना ही कर्ज प्राप्त करती हैं, जैसे बांग्लादेश में। अमेरिकी डॉलर में औसत ऋण 1,500 डॉलर है, और इसकी पुनर्भुगतान दर 99.5 प्रतिशत है। इससे यह साबित होता है कि लघुवित्त जिस तरह बांग्लादेश में कारगर है, उसी तरह से अमेरिका में भी काम कर सकता है, जो दुनिया का एक सर्वाधिक विकसित देश है। ग्रामीण बैंक की अवधारणा ने समूची बैंकिंग प्रणाली को चुनौती दी है, और यह साबित कर दिया है कि सबसे गरीब लोग भी सफलतापूर्वक बैंकिंग कर सकते हैं, और यह दिखा दिया है कि यह एक दिखावटी कार्यक्रम नहीं था, जो कुछ चुनी हुई स्थितियों में ही सफल हो सकता है।

ग्रामीण बैंक खासतौर पर गरीबों में भी सबसे गरीब, और उसमें भी महिलाओं की सेवा करता है। इस बैंक के फिलहाल 9 मिलियन कर्जप्राप्तकर्ता हैं, जिनमें 97 प्रतिशत महिलाएं हैं। यहां कर्ज बिना किसी कानूनी कागजी प्रक्रिया के दिए जाते हैं

क्या आप सोचते हैं कि परंपरागत बैंकिंग प्रणाली को समाप्त कर दिया जाना चाहिए?
परंपरागत प्रणाली धारणीय नहीं है क्योंकि यह धन का संकेंद्रण पैदा करती है। यह प्रणाली समाज के विभिन्न स्तरों से धन को खींचकर उसे दुनिया के अमीर लोगों की ओर प्रवाहित कर देती है। नतीजे में, दुनिया की आबादी के 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में बाकी 99 प्रतिशत लोगों के मुकाबले अधिक पैसा है।

इस विषमता के कारण पैदा उग्र असंतोष से राजनैतिक समस्याएं पैदा होंगी। और इससे भी बदतर, कि इससे समाज में क्रोध और नफरत फैल सकती है, शायद हिंसा भी। यह एक अच्छी स्थिति नहीं होगी। पैसे को शीर्ष की ओर भेजने की प्रक्रिया को उलटा करना होगा जिससे हर किसी को एक वाजिब हिस्सा मिल सके। समूचे वित्तीय विश्व- शेयर बाजार, निवेश फंड तथा बैंकिंग- को पूरी तरह नए स्वरूप में बदलने की जरूरत है। गरीबी की समस्या पूरी तरह मानवजनित है, और इसे उन्हीं को हल भी करना होगा।

लघुवित्त आंदोलन से महिलाओं तथा गरीबी में जीनेवाले लोगों के सशक्तिकरण को किस प्रकार बल मिला है?
गरीबी को गरीब लोगों ने नहीं बनाया है और वे इसकी वजह नहीं हैं। गरीब इसलिए गरीब नहीं हैं कि उनमें कुछ कमी है। उनमें वे सभी खूबियां मौजूद हैं जो हमें मानव बनाती हैं। वे रचनात्मक, सक्रिय तथा ऊर्जावान हैं, लेकिन व्यवस्था उनकी सहायता नहीं करती। वे इन गुणों का उपयोग नहीं कर पाते और इसीलिए, दूसरों की दया पर निर्भर हैं। हमें गरीब की रचनात्मकता को सामने लाने की जरूरत है। जो धन हम उपलब्ध कराते हैं उससे अवसर पैदा होते हैं।

लघुवित्त एक आंदोलन है; यह एक अलग स्वरूप को सामने लाता है। कई लोगों का मानना है कि गरीब अपना खयाल खुद नहीं रख सकते। गरीब महिलाओं के बारे में हमारे अनुभवों से यह पता चलता है कि उन्होंने न केवल अपने काम में लगाने के लिए पैसा लिया, बल्कि बरसात के लिए कुछ बचाकर भी रखा। इनमें से ज्यादातर महिलाएं अपने पर बकाया ऋण की तुलना में अधिक बचत कर रही हैं।

सामाजिक उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार तथा नागरिक समाज क्या कर सकते हैं?
सरकारें अधिक कुछ नहीं कर सकतीं, क्योंकि उनके पास किसी कार्ययोजना का खाका नहीं है। ये तो कार्यक्रमों के अभिकल्पनाकर्ता हैं- सिद्धांतवादी, अकादमिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता- जिन्हें नेतृत्व करना चाहिए, हर किसी को अपने तरीके से, ताकि सही दिशा में प्रयास किए जा सकें। हमें एक ऐसी प्रणाली की अभिकल्पना करने की आवश्यकता है जिससे हम उस प्रक्रिया को उलटी दिशा में मोड़ सकें, जो अभी हमारे पास है।

मानवीय समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए, मैं हमेशा एक नए व्यावसायिक इंजिन- ‘सामाजिक व्यवसाय’ की मजबूती से वकालत करता रहा हूं। परंपरागत रूप से, लाभ कमाने औए व्यक्ति को धनी बनाने के लिए व्यवसाय चलाया जाता है। सामाजिक व्यवसाय में, सभी रचनात्मक शक्तियां केवल मानव समस्याओं को हल करने के एकल उद्देश्य से इस इंजिन की ओर प्रवाहित की जाती हैं।

मानव एक बहुआयामी अस्तित्व है जिसमें स्वार्थ और त्याग का गुण उसके डीएनए में समाहित होता है। जब हम एक सामाजिक व्यवसाय बनाते हैं, तो हम व्यवसाय के माध्यम से त्याग के पहलू को अभिव्यक्त होने का मौका देते हैं। यह धारणा, कि हमें निश्चित रूप से किसी और के लिए काम करना है, पूरी तरह गलत है। मानव के लिए उद्यमिता एक स्वाभाविक वृत्ति है।

सामाजिक व्यवसाय का विचार आज समाज के सभी वर्ग के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। विश्वविद्यालय सामाजिक व्यवसाय केंद्र खोल रहे हैं, बहुराष्ट्रीय निगम सामाजिक व्यवसाय स्थापित कर रहे हैं, और यहां तक कि युवा मस्तिष्क भी इस अवधारणा की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। युवा, तकनीक और समाजिक व्यवसाय की सम्मिलित शक्ति से सामाजिक उद्यमिता को बढ़ावा मिल सकता है।

द यूनुस सोशल बिजनेस- एक गैरलाभकारी उद्यम फंड जो धारणीय सामाजिक व्यवसाय में निवेश के लिए परोपकारी दान का उपयोग करता है- ने इंडियन कॉरपोरेशन एक्शन टैंक (आईसीएटी) शुरू करने के लिए टाटा ट्रस्ट्स के साथ हाथ मिलाए हैं। क्या आप इस प्रयास के बारे में हमें थोड़ा और बताएंगे?
मुझे खुशी है कि आईसीएटी मंच के रूप में कुछ ठोस उभरकर सामने आया, जहां न केवल टाटा कंपनियां, बल्कि भारत की और बड़ी कंपनियों ने भी सामाजिक व्यवसायों में निवेश का फैसला किया है। हर कंपनी किसी सामाजिक व्यवसाय की अभिकल्पना और उसमें निवेश करेगी तथा बिना कोई लाभ कमाए, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा, पोषण आदि क्षेत्रों में लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए अपना स्वयं का सामाजिक ब्रांड बनाएगी। टाटा स्टील, आरपीजी इंटरप्राइजेज, डेनोन तथा सोडेक्सो, आठ कंपनियों के उद्घाटन दल के साथ, पहले ही आईसीएटी से जुड़ चुके हैं।

आईसीएटी, वाईएसबी के टाटा ट्रस्ट्स के साथ एक संयुक्त उपक्रम, को बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप का सहयोग हासिल है, और यह भारत में इन-हाउस सामाजिक व्यवसाय निर्मित करने के लिए बड़े निगमों का प्रथम प्रोत्साहन मंच है। चूंकि एक सामाजिक व्यवसाय अपने सामाजिक उद्देश्य के लिए अभिकल्पित तथा पारिभाषित होता है, इसलिए यह आपको एक परंपरागत व्यवसाय के: लाभ कमाना, शेयर बाजार मूल्यांकन तथा इस तरह के तनाव और दबाव से राहत देता है। जमशेदजी टाटा, टाटा समूह के संस्थापक, ने आज से तकरीबन 125 वर्ष पहले जेएन टाटा एनडाउमेंट की स्थापना के माध्यम से व्यवसाय जगत में त्याग का उदाहरण प्रस्तुत कर दिया था। टाटा ट्रस्ट्स तथा अन्य जो इसके साथ जुड़े हैं, व्यवसाय जगत में सामाजिक व्यावसायिक प्रयास के माध्यम से एक बड़ा उत्परिवर्तन लाने वाले हैं।

क्या आईसीएटी ने अपनी प्राथमिकताओं की पहचान कर ली है?
आईसीएटी भारत के सामने मौजूद दबावकारी समस्याओं की पहचान करने की प्रक्रिया में है। इसके बाद यह तीन या चार प्राथमिक मुद्दों पर केंद्रित होगा। एक समेकित निर्णय उच्चतम कार्यकारी स्तर पर लिया जाएगा जिस उद्देश्य का कोई भागीदार कंपनी समर्थन कर सकती है। इसे फिर सामाजिक व्यवसाय निवेश के रूप में अभिकल्पित किया जा सकता है। आपने कहा कि गरीबी शांति के लिए एक खतरा है, इसलिए लोगों को सशक्त किया जाना चाहिए। आतंकवादी हमलों, नैतिक शोधन तथा मानवता के खिलाफ अपराध से भरी इस दुनिया में जो हो रहा है, उसपर आप क्या सोचते हैं?

कुछ हाथों में धन केंद्रित हो जाना एक वैश्विक खतरा है और राष्ट्र के भीतर तथा राष्ट्रों के बीच और भी बदतर हालात पैदा करता है। यह शांति के लिए एक संकट है। वैश्विक तापन तथा धन का केंद्रीकरण दोनों एक ही जड़ से पैदा हुए हैं: असीमित लालच पर आधारित एक दोषपूर्ण आर्थिक ढांचा। हम मानव की परवाह तथा मानव के साथ साझा करते हुए खुद को पुनर्निर्मित कर इन दोनों को निष्प्रभावी बना सकते हैं।

हमारा लक्ष्य ‘तीन शून्य’ पर आधारित एक दुनिया को बनाने का होना चाहिए- शून्य गरीबी, शून्य बेरोजगारी तथा शून्य कुल कार्बन उत्सर्जन, एक ऐसी दुनिया जहां धन का वितरण हीरे की बनावट के समान हो, जिसके किनारों को समानता, सामंजस्य, शांति तथा प्रसन्नता के रूप में गढ़ा गया हो।

भारत तथा बांग्लादेश आपस में एक- दूसरे से क्या सीख सकते हैं? किस प्रकार ये दोनों देश बेहतर सहयोग कर सकते हैं, खासतौर पर गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में?
केवल भारत और बांग्लादेश ही नहीं, सभी देश एक दूसरे से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। हालांकि लघुबचत का जन्म बांग्लादेश में हुआ, लेकिन यह समूचे विश्व के लिए हमेशा एक प्रेरणा का स्रोत रहा है। अगर भारत अपने गांवों में एक स्थायी और सफल तरीके से पानी की समस्या का समाधान कर ले, तो पूरी दुनिया इससे सीख ले सकती है। इसी तरह से, अगर बांग्लादेश अपने स्वास्थ्यसेवा की समस्याओं का समाधान कर ले, तो संयुक्त राज्य अमेरिका को भी इससे लाभ होगा।

अगर लोगों को किसी चीज की जरूरत है और यह काम कर रहा है, तो सचमुच इसका कोई महत्व नहीं है कि यह कहां से आया है। एक धारणीय समाधान की कोई जाति नहीं होती, और न ही इसकी कोई पहचान होती है। यह वैश्विक संपत्ति है और इसपर हर किसी का हक है।

लघुवित्त को लगातार बढ़ती हुई गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। क्या यह आलोचना उचित है?
क्या यह एक विडंबना नहीं है कि लघुबचत, जिसे ऋण साहूकारों से लड़ने के लिए पहले बनाया गया था, को कुछ बेशर्म तत्वों ने अपने लिए पैसा बनाने और गरीबों का शोषण करने के लिए इस्तेमाल किया है? इस बड़े दुरुपयोग की ही सभी जगहों पर आलोचना की गई है।

अभी हमारे पास दो प्रकार के लघुबचत हैं: गलत लघुबचत और सही लघुबचत। गलत प्रकार के लघुबचत की निंदा होनी चाहिए क्योंकि यह लोगों के जीवन को बर्बाद करता है। सही प्रकार की लघुबचत- जहां गरीब के कल्याण के लिए सामाजिक व्यवसाय मॉडल अपनाया जाया है- की हम संस्तुति करते हैं।

किस प्रकार युवा मन की सोच को बदला जा सकता है ताकि वे समाज की व्यापक भलाई के लिए काम करने की ओर प्रवृत्त हो सकें?
आप इसे उपदेश देकर नहीं कर सकते; युवा लोग उपदेश को पसंद नहीं करते। यह मत कहें, "यही एकमात्र तरीका है", क्योंकि तब वे सोचते हैं कि इसमें कुछ न कुछ गलत है। इसकी बजाय, उन्हें विकल्प दें और उनसे पूछें कि वे क्या करना चाहते हैं, और उन्हें अपना नजरिया सामने लाने के लिए प्रेरित करें। उनसे पूछें कि वे किस प्रकार के जीवन की कल्पना करते हैं जिसे वे जीना चाहेंगे और वे अपने जीवन का उद्देश्य क्या मानते हैं।

युवा मन को स्वरूपित करने में शिक्षा की एक अहम भूमिका है। आज की पीढ़ी का एक 15 वर्षीय युवा उससे कहीं ज्यादा जानता है जितना हमारी पीढ़ी के लोगों को 21 वर्ष की आयु में पता होता था। हमें इस सच्चाई को जानना और स्वीकार करना चाहिए, और युवाओं को वाजिब मौका देना चाहिए। मैं अक्सर मजाक करता हूं कि इस डिजिटल दुनिया में ‘बूढ़ा समझदार होता है’ यह कहावत अब और नहीं चल सकती है।

आप वैचारिक परिप्रेक्ष्य में अपने आप को कैसे व्याख्यायित करेंगे?
अपने अनुभव की स्थितियों के आधार पर मैं चीजों पर एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण से विचार करता हूं। जब मैं जमीनी स्तर पर के लोगों के नजरिए से दुनिया को देखता हूं, मैं उनके अनुभवों और जीवन के सफर के आधार पर दुनिया को समझने की कोशिश करता हूं।

शीर्ष स्तर पर समझे गए तथ्य अक्सर जमीनी स्तर पर बिल्कुल अलग होते हैं। इसने मुझे कुछ उन प्रश्नों की ओर प्रेरित किया है जिसे हम अपने वजूद के एक हिस्से के तौर पर स्वीकार करते हैं। विचारधारा के स्तर पर, मैं किसी समूह से नहीं आता हूं।

हालांकि, अगर आप फिर भी मुझे खानों में रखना चाहें, तो मैं कहूंगा कि मैं एक व्यवहारिक आदमी हूं जो अनुभवों से सीखता रहता है और जब भी कोई समस्या आती है तो इसका समाधान खोजने का प्रयास करता है, और आगे बढ़ना जारी रखता है।