जनवरी 2016 | क्रिस्टाबेले नोरोन्हा और संगीता मेनन

'टाटा ट्रस्ट को अपने आप को अद्यतन बनाए रखना होगा'

पिछले दो वर्षों के दौरान टाटा ट्रस्ट के क्रियाकलापों व गतिविधियों में रतन टाटा की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। टाटा समूह के अध्यक्ष के पद से मुक्त होने के बाद से श्री टाटा का अधिकांश समय भारत के सबसे बड़े एवं सर्वाधिक प्रभावशाली संगठनों में से एक के संचालन, लक्ष्य एवं उद्देश्य को पुनर्परिभाषित करने में व्यतीत हो रहा है।

इसके काफी जबरदस्त परिणाम दिखाई दिए हैं। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन तथा टाटा समूह के अवकाशप्राप्त चेयरमैन श्री टाटा ने क्रिस्टाबेल नोरोन्हा और संगीता मेनन के साथ इस साक्षात्कार के दौरान बताया, "अपने कार्यकारी ट्रस्टी श्री आर वेंकटरमन के संरक्षण में यह ट्रस्ट, पूरे भारत में वंचित समुदायों और न्यूनतम सुविधा प्राप्त लोगों तक अधिकतम लाभ पहुंचाने के लिए अधिक केन्द्रित, एकीकृत और व्यावहारिक ढंग से कार्यरत हैं।"

2014 में इस बात पर पुनर्विचार किया गया था कि टाटा ट्रस्ट क्या कर रहा था और यह अपने लोकोपकारी एजेंडे को कैसे लागू कर रहा था। मूल्यांकन की क्यों आवश्यकता थी?
हमने उन कुछ मुद्दों को सत्यापित करने के लिए ब्रिजस्पैन समूह [गैर-लाभकारी कंसल्टेंसी] को नियुक्त किया, जिन्हें हम स्वयं से जानने/सत्यापित करने का प्रयास कर रहे थे। हम अपने लोकोपकार करने के उस तरीके को बदलना चाहते थे जिसमें परियोजनाओं को मुख्यतः गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के माध्यम से किया जाता था; इसके बजाय हमने वह तरीका चुना जिसमें हम स्वयं कुछ परियोजनाओं का प्रबंधन कर सकते थे। हम अभी भी ट्रस्ट-एनजीओ-समुदाय प्रणाली का सहयोग करना जारी रखेंगें –किन्तु अब हम सीधे तौर पर भी इससे जुड़ेंगे।

ब्रिजस्पैन ने कई अंतरराष्ट्रीय लोकोपकारी संगठनों के साथ काम किया है; उन्होंने हमें बताया कि वे हमें उन संगठनों की संचालन विधि के बारे में बहुमूल्य सुझाव देने के साथ यह भी बता सकते हैं कि हमारे यानी टाटा ट्रस्ट के द्वारा और कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं।  उन्होंने हमारे द्वारा किए जाने वाले प्रयासों पर नजर रखी, और कुल मिलाकर, उन्होंने हमारे कार्य का समर्थन किया जिसे करने का हमने बीड़ा उठाया था।  एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण वाला सुझाव देने के बजाय, उनकी रिपोर्ट ने हमारे प्रयासों को सुव्यवस्थित क्रम प्रदान किया। इसने यह सुनिश्चित करने में हमारी मदद की कि हम अलग-अलग वर्गों में अपने विशेष लोकोपकारी पोर्टफोलियो के साथ कैसे कार्य कर सकते हैं।

हमने उन कुछ मुद्दों को सत्यापित करने के लिए ब्रिजस्पैन समूह [गैर-लाभकारी कंसल्टेंसी] को नियुक्त किया, जिन्हें हम स्वयं से जानने/सत्यापित करने का प्रयास कर रहे थे। हम अपने लोकोपकार करने के उस तरीके को बदलना चाहते थे जिसमें परियोजनाओं को मुख्यतः गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के माध्यम से किया जाता था; इसके बजाय हमने वह तरीका चुना जिसमें हम स्वयं कुछ परियोजनाओं का प्रबंधन कर सकते थे। हम अभी भी ट्रस्ट-एनजीओ-समुदाय प्रणाली का सहयोग करना जारी रखेंगें –किन्तु अब हम सीधे तौर पर भी इससे जुड़ेंगे।

ब्रिजस्पैन ने कई अंतरराष्ट्रीय लोकोपकारी संगठनों के साथ काम किया है; उन्होंने हमें बताया कि वे हमें उन संगठनों की संचालन विधि के बारे में बहुमूल्य सुझाव देने के साथ यह भी बता सकते हैं कि हमारे यानी टाटा ट्रस्ट के द्वारा और कौन से उपाय अपनाए जा सकते हैं।  उन्होंने हमारे द्वारा किए जाने वाले प्रयासों पर नजर रखी, और कुल मिलाकर, उन्होंने हमारे कार्य का समर्थन किया जिसे करने का हमने बीड़ा उठाया था।  एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण वाला सुझाव देने के बजाय, उनकी रिपोर्ट ने हमारे प्रयासों को सुव्यवस्थित क्रम प्रदान किया। इसने यह सुनिश्चित करने में हमारी मदद की कि हम अलग-अलग वर्गों में अपने विशेष लोकोपकारी पोर्टफोलियो के साथ कैसे कार्य कर सकते हैं।

उनके कार्यों से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष— और यह किसी बाहरी व्यक्ति के कहे बिना नेपथ्य में बना रह सकता था— अनुदान प्राप्ति हेतु संसाधन आवंटन प्रक्रिया  को गति प्रदान करने के लिए प्राधिकार सौंपने से संबंधित था। पूर्व में, ट्रस्टी एक साथ बैठ कर व्यक्तिगत रूप से अनुदान के प्रत्येक आवेदन पत्र की छानबीन करते थे। इसमें उनका अधिक समय लगता था और परिणामस्वरूप इससे बहुत अधिक लाभ उठा नहीं पाते थे।

ब्रिजस्पैन ने हमें एक निश्चित स्तर तक कार्यभार सौंपने का सुझाव दिया। ट्रस्टियों को सभी अनुदानों के बारे में सूचित किया जाएगा किन्तु वे बैठकर प्रत्येक अनुदान के आवेदन पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। यदि ऐसी कोई अनुशंसा कर्मचारियों से आई होती तो संभवतः ट्रस्टी उसे स्वीकार नहीं करते, किंतु यह सुझाव एक स्वतंत्र संगठन द्वारा दिया गया था।

अनुदान प्राप्ति प्रक्रिया में क्या परिवर्तन किए गए हैं?
इसमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं, किन्तु इनसे ब्रिजस्पैन का कोई संबंध नहीं है। मैं लगातार इस बात पर बल देता आ रहा हूँ कि ट्रस्ट को किसी भी परियोजना या कार्यक्रम के अधीन समुदाय के स्थायित्व (सस्टेनिबिलिटी) के बारे में विचार करना चाहिए। मान लें कि आपके पास कोई समुदाय है, जिसे सहायता की आवश्यकता है। आपने उनकी कृषि उपज को दोगुना कर दिया, लेकिन वे लोग फिर भी गरीबी रेखा से नीचे बने हुए हैं; यह आवश्यकता की पूर्ति करता हुआ प्रतीत नहीं होता। आपने उनकी आजीविका में 100 प्रतिशत की वृद्धि की, किन्तु अभी भी वे अपने जीवन का निर्वाह करने में असमर्थ हैं। आप इस ढंग से पांच, छह, सात वर्षों तक लगे रहते हैं और फिर आप कहते हैं कि अब एक अन्य जगह और एक अन्य समुदाय में जाना चाहिए। और उस समुदाय का क्या होगा, जिसे आपने छोड़ दिया? उसकी हिम्मत टूट जाती है, वहां काम कर रहे एनजीओ की भी हिम्मत टूट जाती है, और वह संस्था जिसकी मदद करने का हम प्रयास कर रहे थे, अंततः वह भी टूट जाती है।

अभी जो बात मैं कहने का प्रयास कर रहा हूं, यह है कि सभी अनुदान प्रस्तावों में स्थायित्वपरक उद्देश्य का समावेश होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप एक तटीय समुदाय में हैं और आप उनका कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए धान की खेती शुरू कराए जाने पर विचार कर रहे हैं और समुदाय अभी भी गरीबी रेखा के नीचे है, तो शायद आपको एक अतिरिक्त, नई आजीविका गतिविधि शुरू करने की आवश्यकता है, भले ही वे इसके लिए कहें या न कहें। आपको पूरी पहल को स्थायित्व प्रदान करने के लिए उन्हें ऐसा करने देने का प्रयास करना चाहिए।

अनुदान आम तौर पर तीन से पांच साल के लिए दिया जाता है; हर किसी को यह जानना चाहिए कि यह असीमित समय के लिए नहीं दिया जा रहा है। निरंतर वित्तपोषण की धारणा पर काम करने वाले एनजीओ को इससे परेशानी महसूस हो सकती है कि अनुदान बंद हो गया है, इसलिए उन्हें वित्तपोषण अवधि के बारे में स्पष्ट जानकारी दिए जाने की आवश्यकता है। हमें अपने इरादे के बारे में पहले ही स्पष्ट बता देना चाहिए। हम स्वयं का विस्तार जरूरत से ज्यादा नहीं कर सकते; अन्यथा हमारे द्वारा वर्तमान में समर्थन किए जा रहे कुछ पहलों के अलावा नई पहलों को प्रदान करने के लिए पर्याप्त अनुदान निधि कभी नहीं होगी।

कुछ केंद्रित प्राथमिकताओं के साथ सामाजिक दान (सोशल चैरिटी) का प्रबंधन करना आसान है। टाटा ट्रस्ट जैसे अधिक विविधतापूर्ण लोकोपकारी संगठन को कुछ विशिष्ट करने या अलग होने की आवश्यकता क्यों है?
हमारे अस्तित्व का उद्देश्य उन लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना है, जिन तक हम पहुंच सकते हैं। अपनी दृष्टि को साकार बनाने के लिए, हमें मुख्य रूप से व्यक्तिगत कठिनाई को कम करने की दिशा में योगदान देने से बढ़कर सोचना होगा। आपको गुर्दे की बीमारी हो सकती है, जिसके लिए डायलिसिस की आवश्यकता है और आप इसमें लगने वाले खर्चों का वहन नहीं कर सकते, तो हम इसके लिए आंशिक या पूर्ण भुगतान करते हैं। हम इस तरह की व्यक्तिगत सहायता प्रदान कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगें - मुझे लगता है कि हम इस तरह के मामलों के लिए उससे पांच गुना ज्यादा दे रहे हैं, जितना हम पहले दिया करते थे –किन्तु आवश्यकताएं अत्यधिक हैं और इन क्षेत्रों में अच्छा काम करने वाले पात्र एनजीओ तथा परियोजना सहयोगियों का पता लगाना उससे भी अधिक कठिन है।

हाँ, हमें संवेदनशील होना चाहिए, जब बात किसी ऐसे व्यक्ति – उदाहरण के लिए कैंसर से पीड़ित - के उपचार के लिए धन देने की हो, लेकिन कई बार हमारे सामने ऐसा समय भी आया है, जब हमें कैंसर अनुसंधान या मलेरिया के टीके के विकास, जैसे अधिक सार्थक तरीकों से जुड़ने के बारे में सोचना पड़ता है। हमारा लक्ष्य उसे दोहराने का होना चाहिए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ है, जहाँ बड़ी मात्रा में संसाधनों को अनुसंधान में लगाया जाता है।

अब प्रश्न यह है: क्या हम एक ऐसी अनुसंधान परियोजना का वित्तपोषण कर सकते हैं, जिसका लक्ष्य एक निश्चित रोग को नियंत्रित करना या समाप्त करना है और इसके द्वारा अधिक संख्या में लोगों को लाभ मिलने की संभावना है या फिर हमें उस रोग से पीड़ित व्यक्तियों की मदद करने में लगे रहना चाहिए? हमारा मानना है कि हम ऐसी बड़ी परियोजनाओं के माध्यम से बड़ा बदलाव ला सकते हैं, जो मानव जाति की सेवा करती है।

पोषण (न्यूट्रिशन) एक ऐसा विषय है, जो उस बिंदु का एक उदाहरण प्रदान करता है, जिसकी तरफ मैं इंगित कर रहा हूँ। आप सिर्फ बच्चों में व्याप्त कुपोषण का मुकाबला करने में नहीं जुट सकते हैं; आपको इसके दायरे में माँ को भी लाना पड़ेगा। आप यह कैसे करते हैं? सरकार आयरन की गोलियां प्रदान करने में एक बड़ी धनराशि खर्च करती है। एक निविदा निकाली जाती है और सबसे सस्ती गोलियाँ खरीद ली जाती हैं। ये मां को दी जाती हैं, जिसे प्राप्त करने के लिए उन्हें कुछ मील की दूरी तय करनी पड़ती है। अन्य पूरक पदार्थ (सप्लिमेंट) भी इसी तरह प्रदान किए जाते हैं और वे उन लोगों तक पहुँच भी सकते हैं और नहीं भी, जिन तक उन्हें पहुंचना चाहिए था। ऐसे काम नहीं चलने वाला है।

हम वितरण की समस्याओं को कैसे हल करते हैं? उदाहरण के लिए, क्या हम इन पूरक पदार्थों को चावल, गेहूं और नमक जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों से जोड़ सकते हैं? क्या हमें इस कार्यक्रम के लिए राज्य सरकारों का समर्थन मिल सकता है? गोलियों में पैसा खर्च करने के बजाय, क्या वे यह शासनादेश जारी कर सकते हैं कि उगाये जाने वाले सभी चावल (धान) और रोटी (गेहूं, आदि) में आयरन की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए?

हम ऐसे मुद्दों पर कुछ बड़े अनुमान लगा रहे हैं और हम में से कई को इस बात का सुखद आश्चर्य है कि हमें इसके लिए उन राज्य सरकारों से समर्थन मिल रहा है, जो यह करने के लिए तैयार हैं और उनके पास इस के लिए बजट भी है। हम उनके साथ तकनीक साझा कर रहे हैं और उन्होंने हमसे परियोजनाओं की निगरानी करने के लिए कहा है, जिसे करने में हमें ख़ुशी का अनुभव हो रहा है। इन परियोजनाओं को पूरे देश में लागू किया जा सकता है; और आपको सिर्फ यह सुनिश्चित करना है उन्हें प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा रहा है।

परियोजनाओं की निगरानी के दौरान, ट्रस्ट द्वारा हस्तक्षेप करने पर इनकी निधि में इजाफा देखा गया। इसका क्या कारण है?
यह उत्साहित करने वाली बात है कि उन परियोजनाओं में, जहाँ 50 एनजीओ अपने-अपने तरीके से काम कर रहे हैं, हम बस उनका वित्त पोषण करना जारी रखते हैं। यदि परियोजना काफी महत्वपूर्ण है, तो हमें एनजीओ के साथ शामिल होने की आवश्यकता होती है या हम एक अन्य फाउंडेशन के साथ ऐसा कर सकते हैं। हमें वहाँ अपनी उपस्थिति बनाए रखने की आवश्यकता होती है; सिर्फ वित्तपोषण पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय यदि हम ऐसा करते हैं तो इस संबंध में हमारे ज्ञान में वृद्धि होगी कि इससे वास्तव में क्या हो रहा है।

पूर्व में, किसी एक ट्रस्ट का कार्य बस इतना था कि वह अच्छा काम कर रहे किसी एनजीओ से जुड़कर कार्य करने का निवेदन करता था और उन्हें निधि की पेशकश करता था। दूसरे ट्रस्ट की कार्यपद्धति पहले वाले से इस मामले में अलग होती थी कि यह अपने पास निधि की याचना करने वाले आगंतुकों की प्रतीक्षा करता था ताकि वह उन्हें निधि उपलब्ध करा सके। हमारे पास काम करने के अलग तरीके थे। अब हम ट्रस्टों को उनकी स्वायत्तता से वंचित किए बिना इस दृष्टिकोण के साथ एकीकृत करने का प्रयास कर रहे हैं कि "आइए, साथ मिलकर काम करते हैं और देखते हैं कि किससे अधिक लाभ मिल सकता है।"

'इंटरनेट साथी' कार्यक्रम, जहाँ हमने महिलाओं में इंटरनेट की समझ पैदा करने में मदद करने के लिए गूगल के साथ करार किया है, ट्रस्टों के लिए लोकोपकार का एक नया मॉडल है। क्या आप इस नई दिशा पर प्रकाश डालेंगे?
गूगल के साथ, हम महिलाओं को आजीविका के साधन देने में मदद करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उनके मध्य इंटरनेट से संबंधित ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं। यह परियोजना वैसी बिलकुल भी नहीं है, जैसी हमने पहले की थी। बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ, हम डायरिया (दस्त) से निपटने के लिए, एक पूरक तरीके से एक साथ काम कर रहे हैं। यह फाउंडेशन के लिए पहला मौक़ा है, जिसने पूर्व में हमेशा स्वयं से ऐसे कार्यक्रम संचालित किए हैं। विश्व बैंक ने आर्थिक योगदान देते हुए और हमें एक एनजीओ की तरह प्रबंधन करने की अनुमति देने के द्वारा हमारे कार्यक्रम का समर्थन करने का निर्णय लिया है।

हम भारतीय समस्याओं का पता लगाने और इन समस्याओं का भारतीय समाधान खोजने के लिए मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के साथ एक प्रमुख कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं। कुछ बहुत ही रोचक परियोजनाएं मौजूद हैं और उनके पीछे के विचार भी उतने ही रोचक हैं। हमारे द्वारा समर्थित परियोजनाओं में कम लागत वाले चिकित्सा उपकरण और मोतियाबिंद की जाँच करने से लेकर कैंसर के इलाज के लिए जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करना तक शामिल है।

आप लोकोपकार को अधिक सोद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में तकनीक की भूमिका कहां तक देखते हैं?
मैंने जैव प्रौद्योगिकी और कैंसर के इलाज का उदाहरण दिया; जो कि तकनीक के प्रयोग का शुद्ध उदाहरण है। पूरा मामला कुछ निष्कर्षों पर आधारित तकनीक के अनुप्रयोग के लिए हमारे द्वारा दिए जाने वाले वित्त पोषण से संबंधित है। हम वहाँ पहुँचने के लिए जोखिम उठा रहे हैं और यह उस उद्देश्य की पूर्ति से पहले समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन हम मानते हैं कि हम सही मार्ग पर जा रहे हैं। समय के साथ, तकनीक ने आपको कैंसर, मधुमेह (डायबिटिज़), हृदय रोग और ऐसे अन्य रोगों के उपचार में महत्वपूर्ण सफलताएं दिलाई है। और पहले की तुलना में तकनीक के क्षेत्र में हमारी अधिक सक्रिय भूमिका है, किंतु धन की कमी इसमें बाधा उत्पन्न कर रही है।
आपको तकनीक को अपनाना होगा, अत्यधिक उच्च तकनीक को नहीं। मेरी बहन ने हाल ही में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था और उसे शाम तक क्लीनिक में रखा गया था, उसे एक सप्ताह तक काला चश्मा पहनने के लिए कहा गया था और उसे अन्य विभिन्न बाधाओं का भी सामना करना पड़ा था। मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका में मोतियाबिंद निकलवाया था और मैं 30 मिनट में वापस होटल लौट आया था। यदि आप उसी तरह काम करना जारी रखते हैं, जैसे आप करते चले आ रहे हैं, तो आप वहीं ठहरे रह जाते हैं जहां आप हैं।

तकनीक को अत्याधुनिक या आधुनिकतम तरीके के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। एक बार जब आप किसी तकनीक को अपना लेते हैं, तो आपका अगला कदम इसे सभी के लिए किफायती बनाना होना चाहिए। यदि आप तकनीक को केवल अभिजात वर्ग के लिए मानते हैं, तो यह आपकी समस्या है।

एक दृष्टिकोण यह भी है कि ट्रस्ट को भारत के बाहर अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में अपने पांव पसारने चाहिए, सामान्यतः इसलिए क्योंकि टाटा समूह एक वैश्विक कारपोरेशन बन गया है। इस पर आपकी क्या राय है?
हमारे द्वारा यहां किए जाने वाले अधिकांश कार्य अन्य देशों में भी किए जा सकते हैं, किन्तु क्या यह सही होगा, जबकि आपने भारत में मांग को पूरा करने के लिए सभी साधनों का उपयोग न किया हो? इसका एक त्वरित जवाब हां में है। हमें बदलाव के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए, क्योंकि मानव जाति की पीड़ा एक जैसी और हृदय-विदारक होती है, चाहे वह अफ्रीका में हो या भारत में। उस रास्ते पर जाने में बहुत सी विनियामक समस्याएं हैं, किन्तु हमें खुद से प्रश्न पूछना चाहिए। जब हम यह करने निकलते हैं, तो हम उस बाधा को पार कर लेंगें, किन्तु मुझे लगता है कि हमें, जहां भी संभव हो, जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

जब बात पेशेवर वित्त पोषण संस्थानों से संबंधित हो, तो क्या आप इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं कि लोकोपकार का अन्तर्निहित गुण व्यक्तिगत है?
नहीं, मैं लोकोपकार को उस ढंग से परिभाषित नहीं करूंगा। लोकोपकार दाता से शुरू होता है, जो यह कहते हुए आपका नेतृत्व कर सकता है कि यह व्यक्तिगत है। किसी व्यक्ति की पत्नी की ल्यूकेमिया से मृत्यु हो जाती है और वह इस बीमारी के इलाज के लिए एक अस्पताल बनाने का फैसला करता है; कोई कार दुर्घटना में अपने बच्चे को खो देता है और सड़क सुरक्षा के लिए एक संस्थान की स्थापना करने का फैसला लेता है। परंपरागत रूप से, लोकोपकार कुछ व्यक्तिगत कठिनाई या व्यक्तिगत दृष्टिकोण के कारण शुरू हो सकता है, किन्तु सही अर्थों में लोकोपकार व्यक्तिगत नहीं है; यह मानवता पर आधारित है। यह उस संवेदनशीलता से संबंधित है, जो उन सभी कठिनाइयों के कारण उत्पन्न होती है, जिनका लोग सामना करते हैं।

आप अगले पांच वर्षों के दौरान टाटा ट्रस्ट के विकास को किस रूप में देखते हैं?
बिलकुल वैसा ही, जैसा यह अभी है। हम इस पर समीक्षा कर रहे हैं कि हमें एक जैसे सामान्य क्षेत्रों में कहाँ और क्या करना चाहिए। हमें आशा है कि हम हमेशा उन लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने पर विचार करते रहेंगें, जिन्हें हमारी मदद की आवश्यकता है। आज हम बीमारियों और इलाज के बारे में बात कर रहे हैं; कल यह जलवायु परिवर्तन हो सकता है। मुझे लगता है कि ट्रस्ट को हर तीन से पांच वर्षों में स्वयं को नवीनीकृत या अद्यतन करते रहना होगा चाहे इसने कुछ खोया हो या नहीं, क्योंकि सरकारें वास्तव में अनिवार्यतया मानव जाति की मदद करने के लिए नहीं जाने वाली हैं। वे अपने लोगों तक ही सीमित रहने वाले हैं और इसमें कुछ राजनीतिक मुद्दे भी रहने वाले हैं; किसी अन्य को ही कम से कम यह परिभाषित करना है कि किस पर आगे बढ़ा जा सकता है।

आप युवा लोकोपकारियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
मैं उस पर ध्यान नहीं देना चाहता हूँ; जो मुझे नहीं लगता कि मैं कर सकता हूँ। सत्य यह है कि हम, न सिर्फ अनुदान देकर बल्कि समय समय पर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करके कम विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाना चाहते हैं।

दूसरी भूमिका जो आपको निभानी है, वह युवा उद्यमियों को अपना समर्थन देना है...
यह काफी हद तक उन युवा उद्यमियों का समर्थन करने से संबंधित है, जो कुछ ऐसा कर रहे हैं जिसका आप सम्मान करते हैं या उस क्षेत्र में हैं, जिसे आपके अनुसार नजरअंदाज कर दिया गया है। कुल मिलाकर मैं ई-कॉमर्स क्षेत्र में कारोबारों का समर्थन कर रहा हूँ, क्योंकि वे माल और सेवाओं को उन लोगों तक पहुंचाते हैं, जिन्हें कभी भी इस तरह से आपूर्ति नहीं की गई है। उन्हें पहले वह ऑर्डर करने का मौका कभी नहीं मिला जो वे आर्डर करना चाहते हैं, इसे अपने दरवाजे पाने का, प्राप्त होने पर भुगतान करने का, और ठीक न लगने पर इसे वापस करने का मौका कभी नहीं मिला। इस प्रकार की पहुंच पारंपरिक कारोबार में पहले कभी नहीं रही है।

हमारी उपभोक्ता आबादी 300 मिलियन की है, जिसके आगे आने वाले वर्षों में 600 मिलियन तक पहुंचने की संभावना है। इस आबादी तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं और ऊर्जावान युवा लोगों द्वारा इस दिशा में कार्य किया जा रहा है। उन्हें समर्थन की जरूरत है। यह कहा जा सकता है कि कुछ मूल्यांकन मूल्यवान हैं। मैं उन लोगों का समर्थन करता हूँ जो वास्तव में कुछ अलग कर रहे हैं।

वे तीन प्राथमिक मुद्दे क्या हैं, जिन पर आपके अनुसार भारत को ध्यान देना चाहिए?
मैंने हमेशा महसूस किया है कि भारत अन्तर्निहित रूप से असमान अवसर की समस्या से ग्रस्त है। यदि मुझे एक पंक्ति में कहना हो, तो मैं कहूंगा कि एक भारतीय के रूप में मेरी सबसे बड़ी इच्छा अपने देश पर तब गर्व करना है जब यहां सबके लिए एक समान अवसर उपलब्ध हो। हमारे देश में महिला प्रधानमंत्री भी रहीं किन्तु वह शासन के लिए एक अपवाद मात्र था। यदि आपमें अध्ययन करने, काम करने और प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने की क्षमता है और आप कौन हैं या आपके संबंध किस-किससे हैं, इस आधार पर बढ़ने की क्षमता नहीं है, तो यह हमारे देश के लिए मुझे बहुत प्रसन्नता का अनुभव कराएगा।

अभी हम धार्मिक भिन्नताओं और असमानताओं से गुजर रहे हैं जो कि व्यथित करने वाली और चिंताजनक स्थिति है। राजनीतिक कारणों से हम जाति, धर्म और सांप्रदायिक समूहों में बंटे हुए हैं। चुनाव के समय यह कुछ लोगों की मदद कर सकता है, किन्तु ये चीजें एक एकीकृत देश का निर्माण करने में मदद नहीं करती हैं। हम अभी भारतीय के बजाय मराठी, पंजाबी और तमिल हैं। जब हम सब फिर से भारतीय बन जायेंगें, उस दिन देश फिर से मजबूत हो जाएगा।

यह लेख टाटा रिव्यू के जनवरी 2016 संस्करण में टाटा ट्रस्ट के बारे में प्रकाशित कवर स्टोरी का एक हिस्सा है:
पुनर्परिभाषित लोकोपकार
टाटा ट्रस्ट ने एकीकरण, प्रौद्योगिकी के उपयोग, समर्थन, साझेदारी आदि के माध्यम से - अपने अनेक परोपकारी प्रयासों के प्रभाव को गहन बनाने के लक्ष्य से नवीनीकरण का मार्ग निर्धारित किया है
स्वाद भरा समाधान
टाटा ट्रस्ट की एक विशिष्ट सार्वजनिक-निजी साझीदारी ने यह सुनिश्चित किया है कि हजारों आदिवासी बच्चे संपूर्ण आहार का आनंद लें
आहार के बढ़ते कदम
भारत में कुपोषण से निपटना एक अहम जरूरत है, और यह टाटा ट्रस्ट द्वारा ध्यान केंद्रित किए जाने वाले क्षेत्रों में से एक है
शुद्ध लाभ पक रहे हैं
टाटा ट्रस्ट द्वारा अपने सहयोगियों के साथ मिलकर गुजरात में चलाए जाने वाले क्लीन कुकिंग और इंटरनेट जागरुकता कार्यक्रम से संगठन की मंशा और उसके प्रभाव का पता चलता है
रचनात्मक बढ़त की खोज में
टाटा ट्रस्ट अपने कार्यक्रमों की पहुँच और कार्यान्वयन को विस्तारित करने का प्रयास करता है जिसके लिए प्रौद्योगिकी और समाधानों में नवप्रवर्तन अनिवार्य है
उत्थान के लिए शिक्षा प्रदान करना
टाटा ट्रस्ट के समर्थन से संचालित परियोजना का आभार, जिसके माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में शिक्षण केन्द्रों का प्रसार हुआ है
पूंजी तथा उत्कृष्टता
समुदाय के जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में टाटा ट्रस्ट की पहलों को जोड़ने से लाभार्थियों को लाभ प्रदान करने की दिशा में सफलता मिली है
आशाओं की फसल, भरपूर लाभ
महाराष्ट्र के अंदरूनी हिस्सों में संचालित टाटा ट्रस्ट की एक पहल हजारों गरीब किसानों को सहायता प्रदान करती है, जिन्हें पारंपरिक खेती से हटने के लिए और अधिक लाभदायक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है
ग्रामीण समृद्धि
टाटा ट्रस्ट का ग्रामीण आजीविका एवं समुदाय पोर्टफोलियो का लक्ष्य बहुत से उपायों के माध्यम से गरीबी में कमी करना है
कदम-दर-कदम भविष्य का निर्माण
टाटा ट्रस्ट के समर्थन ने विशेष रूप से गुजरात में हजारों प्रवासियों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां सुरक्षित करने, वित्तीय सुरक्षा पाने तथा अपने जीवन को रूपांतरित करने में सक्षम किया है
ग्रामीण रुग्णता का एक शहरी संस्करण
टाटा ट्रस्ट ने अपना ध्यान शहरी गरीबी तथा आजीविका पर एक ऐसे मसले के रूप में केन्द्रित किया जिसे एक ऐसे समय केन्द्रित दखल की जरूरत थी, जब अधिकांश लोकोपकारी एजेंसियां ग्रामीण गरीबी पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही थीं
प्रवाह के विपरीत जाना
उत्तराखंड के उत्तुंग गिरि शिखरों पर जल को अमृत माना जाता है और टाटा ट्रस्ट तथा उसके सहयोगियों द्वारा इसे लोगों तक पहुँचाने में दी जाने वाली सहायता ने लोगों के जीवन और उनकी किस्मत को बदल दिया है
अधिकतम सदुपयोग अभियान
टाटा वॉटर मिशन, टाटा ट्रस्ट में निहित सामाजिक विकास क्षमताओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लक्ष्य से प्रेरित है
ताल पुनर्जीवित
टाटा ट्रस्ट के प्रयास से गुजरात के कच्छ में शुरू हुई एक परियोजना द्वारा कौशल का अभ्यास करने वाले संगीतकारों के लिए नए अवसर पैदा कर इलाके की लोक संगीत परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है
विस्तृत किया गया कैनवास
टाटा ट्रस्ट का मीडिया, कला एवं संस्कृति थीम भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण करने और उसे साकार करने वाले लोगों पर केंद्रित है