सामाजिक उद्देश्य के साथ समाज निर्माण

जमशेदजी टाटा और उनके पुत्र सर दोराबजी टाटा का मानना था कि उद्योग का असली मकसद संपत्ति के सृजन से आगे जाकर उस संपत्ति के उचित आवंटन के जरिए नए समाज का निर्माण करना है। इसी विजन का परिणाम था कि टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज का जन्म हुआ।

एक अमेरिकी मिशनरी क्लिफोर्ड मैंशर्ट ने 1920 के दशक में मुंबई में नागपाडा की निकटवर्ती चालों में अनेक शहरी सामुदायिक कार्यक्रमों की शुरुआत की थी। उनके प्रयासों को सर दोराबजी टाटा का समर्थन होता था। इसी समय के दौरान सामाजिक कार्यों के लिए एक संस्थान की अवधारणा ने जन्म लिया। 1936 में सामाजिक कार्यों में पेशेवर प्रशिक्षण हेतु नागपाडा नेबरहुड हाउस में दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क की स्थापना हुई। डॉ मैंशर्ट को इसका निदेशक (डायरेक्टर) बनाया गया। हालांकि यह डिप्लोमा कोर्स था लेकिन पहले वर्ष में ही 20 सीटों के लिए 400 आवेदन आए। 1944 में, इसका नाम बदलकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) कर दिया गया।

1936 और 1948 के बीच इस स्कूल (संस्थान) ने राष्ट्रीय कानूनों और नीतियों को प्रभावित करने का काम सफलतापूर्वक किया। “हमने ऐसे कार्यक्रम शुरु किए जो बाद में चलकर भारत सरकार द्वारा कानून के रूप में देश में लागू किए गए,” टीआईएसएस के मौजूदा डायरेक्टर आरआर सिंह संस्थान के इतिहास में बारे में बताते हुए कहते हैं। “हमने श्रम कल्याण एवं औद्योगिक प्रबंधन कोर्स चलाए क्योंकि हमारा विश्वास था कि मजदूरों से संबंधित समस्याओं पर ध्यान देने की जरूरत है। 1948 में, लेबर एक्ट (श्रम अधिनियम) लाया गया। भारत में श्रम कल्याण की अवधारणा सीधे-सीधे सर दोरबाजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल के कार्य से विकसित हुई है। इस बात से अधिक सहायता हुई कि ये अवधारणाएं पहले ही टाटा संस्कृति का हिस्सा थीं।”

संस्थान का मौजूदा कैम्पस मुंबई के देवनार में स्थित है जिसका शुभारंभ 6 अक्टूबर 1954 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया था। वर्ष 1964 संस्थान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बिन्दु है, जब इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में मान्यता मिली। तब से इस संस्थान ने अपने शिक्षा कार्यक्रमों और अपनी अवसंरचना का लगातार विस्तार किया है। इसने देश की सामाजिक और शैक्षणिक प्रणाली की बदलती जरूरतों के अनुसार सामाजिक कार्य की शिक्षा की अपनी शुरुआती अवधारणा से परे जाकर अत्यंत व्यापक स्तर पर काम किया है। सामाजिक कार्य में केवल पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा प्रदान करने वाले एक छोटे संस्थान से शुरू करके आज यह विविध कार्यकलापों वाले एक पूर्ण विश्वविद्यालय का रूप ले चुका है।

आज टीआईएसएस भारत का एक अग्रणी शिक्षा संस्थान है। यह मानव संसाधनों और समाज कार्य में पेशेवर प्रशिक्षण प्रदान करता है, सामाजिक समस्याओं और समाज विज्ञानों में शोध करता है, और साथ ही इस जानकारी और तथ्यों को समाज के हित में प्रकाशित-प्रसारित करता है। यह देश के उन चुनिंदा संस्थानों में से भी है जो संगठित और सुव्यवस्थित कल्याण प्रयासों की कार्यविधि के प्रदर्शन हेतु फील्ड परियोजनाओं का आयोजन करता है। “हम कभी भी केवल विशुद्ध कक्षा निर्देशों पर निर्भर नहीं रहे,” डॉ सिंह कहते हैं। “शिक्षण और प्रशिक्षण कार्यों के अलावा फैकल्टी द्वारा फील्ड-एक्शन प्रोजेक्ट्स में भी भाग लिया जाता है। समय के साथ हमने अन्य विषयों के अतिरिक्त बाल कल्याण तथा शिक्षा एवं शहरीकरण के समाजशास्त्र की भी इकाइयां बनाईं। सामाजिक न्याय के बजट और रिपोर्ट हमारी मदद से तैयार किए गए। यह महाराष्ट्र राज्य के लिए प्रथम था और हमारे लिए एक बड़ी चुनौती।”

नागपाडा में डॉ मैंशर्ट का सामना जिन समस्याओं से हुआ था वे आज भी मौजूद हैं। डॉ सिंह कहते हैं कि प्रासंगिकता को कायम रखना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो मानसिकता और विचारों में दिखाई देती है। बदलते सामाजिक परिदृश्य के अनुरूप विभागों में नए-नए तत्व शामिल किए गए हैं जैसे धारणीय ग्रामीण विकास एवं शिक्षा जैसे क्षेत्र। संस्थान ने 500 से अधिक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की हैं और 32 फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट आरंभ किए हैं, जिनमें से कुछ को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट से सहायता प्राप्त हुई। “इस ट्रस्ट के साथ हमारे संबंध आज भी जुड़े हुए हैं,” डॉ सिंह बताते हैं।

हालांकि यह एक डीम्ड यूनिवर्सिटी है, लेकिन फिर भी संचालन बोर्ड का अध्यक्ष अब भी ट्रस्ट का प्रतिनिधि ही होता है। जेआरडी टाटा ने स्वयं कई वर्षों तक बोर्ड की अध्यक्षता की थी। जमशेदजी टाटा की तरह उनका भी मनाना था कि संपत्ति को वापस समाज के पुनरुत्थान में लगाया जाना चाहिए। टाटा समूह ने संस्थान को उसके भवन और ग्रामीण कैंपस के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान की है। मुंबई से 500 किमी दूर (महाराष्ट्र में शोलापुर के पास) गंभीर सूखाग्रस्त इलाके में ग्रामीण कैंपस स्थापित है। यहां कुछ पूरी तरह से सूखी पहाड़ियों को सफलतापूर्वक हर-भरा बनाया जा चुका है और यहां कई अन्य परियोजनाएं आकार ले रही हैं।

संस्थान की आगामी योजनाओं में विकासपरक अध्ययन, आपदा प्रबंधन, घरेलू हिंसा और मानवाधिकार से संबंधित अन्य केन्द्रों की स्थापना शामिल है। फिलहाल, इन क्षेत्रों में छोटी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। संस्थान द्वारा देश के अन्य भागों में भी इसी तरह की इकाइयों की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं। अन्य विश्वविद्यालयों के साथ ज्ञान बांटने के लिए यह कार्यशालाओं का आयोजन कर रहा है और कार्यक्रम चला रहा है।

टीआईएसएस शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध, में योगदान दे रहा है और स्वैच्छिक संगठनों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, साथ ही प्राथमिक शिक्षा सहित शिक्षण संस्थानों में क्षमता निर्माण की दिशा में भी कार्य कर रहा है। श्री सिंह कहते हैं, “जमशेदजी की प्रेरणा, संचालन बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में जेआरडी के नेतृत्व, और दोराबजी के लोककल्याणकारी कार्य ने एक ऐसे संगम का निर्माण किया है जिसने हमें संवारा, आगे बढ़ने में हमारी मदद की और हमें सशक्त बनाया है,”।

तथ्य
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में सामाजिक कार्य शिक्षा के क्षेत्र में एक अग्रणी संस्था है। इसने सामाजिक नीति, नियोजन, हस्तक्षेप रणनीतियों और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

यह संस्थान सामाजिक विज्ञान, कार्मिक प्रबंधन, औद्योगिक संबंध और स्वास्थ्य, अस्पताल प्रबंधन और सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट कार्यक्रम संचालित करता है. इसमें नौ शिक्षण विभाग, आठ अनुसंधान इकाइयाँ, दो संसाधन इकाइयाँ और संसाधन सेल हैं।