जनवरी 2016 | फिलिप चाको

शुद्ध लाभ पक रहे हैं

टाटा ट्रस्ट द्वारा अपने सहयोगियों के साथ मिलकर गुजरात में चलाए जाने वाले क्लीन कुकिंग और इंटरनेट जागरुकता कार्यक्रम से संगठन की मंशा और उसके प्रभाव का पता चलता है

बासुदेवी डबराल का कहना है कि “यह टैंक उनका बैंक है।” सर्दियों के दिनों में अपने चेहरे पर एक गर्मजोश मुस्कुराहट लाते हुए यह बात उन्होंने उस समय कही, जब वह इस बात को बयान कर रही थीं कि साफ़ पानी की आसानी से उपलब्धता ने किस तरह से उनके जीवन और भारत के उत्तरी इलाके में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसे उनके छोटे से गाँव की किस्मत को बदल दिया है।

'इंटरनेट साथियों' के लिए साइकिल, परिवहन का चुना हुआ साधन है

टिहरी गढ़वाल क्षेत्र के एक दूर-दराज़ के गाँव चुर्धर में रहने वाली इस 52 वर्षीय महिला ने अपने दरवाज़े के बाहर लगे पानी के टैंक की ओर इशारा करते हुए इसकी तुलना एक बैंक से की। “हम इस टैंक से वैसे ही पानी निकालते हैं, जैसे लोग बैंक से पैसे निकालते हैं। वे लोग पैसे जमा करते हैं, हम पानी जमा करते हैं।” श्रीमती बासुदेवी की बात और उनके लहज़े में जो आत्मविश्वास झलक रहा था, उसकी एक बड़ी वजह जल सुरक्षा है। बासुदेवी 7,000 घरों में रहने वाले उन 50,000 लोगों में से हैं, जिन्हें उत्तराखंड के 133 गाँवों में टाटा ट्रस्ट द्वारा चलाए जाने वाले जल आपूर्ति और स्वच्छता (WATSAN) परियोजनाओं से फ़ायदा हुआ है।

लगभग 200 पेय जल योजनाओं में पानी मुख्य मुद्दा रहा है, जिसे तीन चरणों में कार्यान्वित किया गया है (2002 से लेकर 2014 तक)। इसके साथ कई अन्य सामाजिक विकास की पहलों को एकीकृत किया गया है,  जिनमें स्वास्थ्य और सफ़ाई, रोज़गार, माइक्रोफ़ाइनेंस (सूक्ष्म वित्त) और शिक्षा को बढ़ावा देना शामिल है।

हालांकि, इन सभी की शुरुआत पानी के मुद्दे से ही होती है। ट्रस्ट मेंउप विकास प्रबंधक के रूप में कार्यरत विनोद कोठारी के शब्दों में, “पानी हमेशा से प्रवेश बिंदु रहा है और अभी भी है। आप पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जाएँ और आप उसे केंद्र में रखते हुए अन्य कार्यक्रमों का विकास भी कर सकते हैं। आप एक संपूर्ण पैकेज प्रदान कर सकते हैं, लेकिन लोगों की सबसे बड़ी ज़रूरत पानी है।”

श्रीमती बासुदेवी जिनके लिए पानी का महत्व अमृत से कम नहीं है, उनका कहना है कि “यह एक वरदान है। मेरे पास पीने के लिए साफ़ पानी है, नहाने और कपड़े धोने के लिए पानी है। मैं इसका इस्तेमाल बैंक में रखे पैसे की तरह ही जब चाहूँ तब कर सकती हूँ। मुझे घर के लिए पानी लाने में तीन घंटे लग जाया करते थे और कभी-कभी रात के समय भी जाना पड़ता था। यह किसी बड़े बोझ जैसा था। यहाँ तक कि अपने बच्चों के लिए भी मेरे पास समय नहीं था, फिर ऐसी हालत में सफ़ाई, स्वास्थ्य और आराम की चिंता करने का वक़्त किसके पास था।”

दयालीदेवी डबराल भी अपने गाँव की इस साथिन जैसे ही विचार रखती हैं। मौसम की मार झेलते-झेलते अपनी 62 साल की उम्र से कहीं अधिक उम्र की लगने वाली यह महिला पड़ोसी महिला संघ की सदस्य हैं। इसके साथ ही वह स्थानीय पंचायत (एक स्वशासित निकाय) की उपाध्यक्ष भी रही हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जल परियोजना की वजह से ही यह संभव हो पाया है।

WATSAN कार्यक्रम टाटा ट्रस्ट की व्यापक हिमोत्थान परियोजना या HMP नामक पहल का एक घटक है। (हिमोत्थान का अर्थ है हिमालयी क्षेत्रों की उन्नति और परियोजना का अर्थ विकास से है)। इस कार्यक्रम को WMC के माध्यम से क्रियान्वित किया जाता है, जो कि इसकी योजना बनाने, डिजाइन तैयार करने, लागू करने और प्रबंधित करने की प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है।

योजना के तहत, परियोजना वाले गाँव के प्रत्येक घर को उसके दरवाज़े तक पाइप द्वारा जलापूर्ति का कनेक्शन और एक सैनिटैशन यूनिट प्रदान की जाती है। इस पानी को प्राकृतिक झरनों से प्राप्त किया जाता है और ग्रैविटी-फ़्लो (गुरुत्व प्रवाह) प्रणाली द्वारा इसे नलों के ज़रिए प्रदान किया जाता है। सरल शब्दों में, पहाड़ियों के झरनों का पानी नीचे के गाँवों में बहता है।

यह प्रणाली उन इलाकों के लिए उपयुक्त नहीं है, जहाँ जल के प्राकृतिक संसाधन मौजूद नहीं हैं। इसलिए 2003 में इस कार्यक्रम में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग यानी वर्षा जल के संग्रहण को शामिल किया गया, जिसके द्वारा हर घर के पास बने टैंक पानी से भर गए (लगभग 700 टैंक बनाए गए थे)।

2006 तक, टाटा ट्रस्ट गाँवों के एक समूह की ज़िम्मेदारी लेता था और WATSAN परियोजना के लिए 90 प्रतिशत आर्थिक मदद ट्रस्ट की ओर से दी जाती थी। गाँवों द्वारा शेष 10 प्रतिशत मदद का इंतज़ाम किया जाता था। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि कार्यक्रम और उसे बनाए रखने में उनकी भी भागीदारी है।

परियोजनाओं की योजना बनाने और उसे पूर्ण करने की ज़िम्मेदारी पाँच गैर-सरकारी संगठनों की थी, जो कि ट्रस्ट के सहयोगी थे। 2007 में ट्रस्ट की कार्यान्वयन इकाई के रूप में हिमोत्थान सोसायटी के गठन के बाद से इस ढाँचे में बदलाव आया है।

गुजरात में कोडिनार गाँव में चित्रकला प्रतियोगिता में भाग लेते बच्चे

श्री कोठारी के अनुसार, ‘ब्लू बोनस’ —जल और स्वच्छता से प्राप्त होने वाला यह बोनस पर्यावरणीय ग्रीन बोनस के समान है – और टाटा ट्रस्ट उत्तराखंड में यही हासिल करने की कोशिश कर रहा है। “जल के स्रोतों को सुरक्षित रखना अनिवार्य है। हम एक धारा जन्मपत्री तैयार करते हैं, जो झरने का राशिफल है और इसे गाँव वालों को देते हैं, ताकि वे इस स्रोत को सुरक्षित रख सकें और सर्वाधिक प्रभावी तरीके से इसका उपयोग कर सकें। यही ब्लू बोनस है।”

टाटा ट्रस्ट, उत्तराखंड में अब अपने जल और स्वच्छता की पहल के चौथे चरण में है। इस बार पहले से कहीं अधिक बड़े पैमाने पर और अधिक बड़े स्वप्न तथा महत्वाकांक्षा के साथ इसे किया जा रहा है। 2019 तक लगभग 350 गाँवों को इसके अंतर्गत लाने का लक्ष्य है और ट्रस्ट के अलावा इस तरह की सोच रखने वाले अन्य संगठनों द्वारा भी संसाधनों को उपलब्ध कराया जाएगा।
टाटा की कंपनियाँ भी पहले की तरह मिले-जुले रूप से काम करेंगी (जैसे पूर्व में टाइटन कंपनी ने धनराशि की व्यवस्था के लिए काम किया था, टाटा ग्लोबल बेवरेजेज़ ने रोजगार अवसरों और टाटा केमिकल्स ने जल गुणवत्ता समाधानों में योगदान दिया था)।

दयालदेवी के अनुसार, पहले के हालात और अब के हालात में ज़मीन-आसमान का अंतर है। उनका कहना है, “मेरे पोते-पोतियाँ स्कूल जाते हैं, उन्हें स्वास्थ्य और सफ़ाई की जानकारी है।” अपनी बात रखते हुए श्रीमती बासुदेवी कहती हैं, “अभी हमारे पास जो सुविधाएं हैं – और इस सूची में पानी सबसे ऊपर है – जो हमें तब उपलब्ध नहीं थी। इसकी वजह से हमारे पास कभी स्कूल जाने का वक़्त ही नहीं था; लेकिन नई पीढ़ी के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमें सबसे अधिक सुविधा पानी की मिली है। यह बिल्कुल ऐसा है, जैसे हमारे घर भगवान आ गए हों।”

अत्यधिक सशक्त
  • गुजरात में टाटा ट्रस्ट द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रम में 200 सामाजिक उद्यमी शामिल हैं। और ये सभी महिलाएँ हैं।
  • जुलाई 2015 में शुरू की गई ‘इंटरनेट साथी’ पहल के अंतर्गत गाँव वालों को इंटरनेट संबंधी बुनियादी जानकारी दी जाती है, जैसे कि ब्राउज़र का उपयोग कैसे करें, ईमेल खाता कैसे खोलें, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में कैसे जानें, आदि।
  • प्रत्येक इंटरनेट साथी को एक साइकिल, दो टैबलेट और दो स्मार्टफ़ोन दिए गए हैं। साइकिल वाले ऐसे 100 साथी कार्यरत हैं।
  • क्लीन कुकिंग परियोजना के तहत जैव ईंधन और जलावन का उपयोग करने वाले ग्रामीणों को क्लीन कुकिंग स्टोव यानी धुआं रहित कुकिंग स्टोव और इंडक्शन कुक टॉप का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाता है, ताकि ईंधन की लकड़ी के उपभोग और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं आदि को कम किया जा सके। सामाजिक उद्यमियों द्वारा माँग वृद्धि और बाज़ार विकास के ज़रिए इन उत्पादों को बेचा जाता है।
  • 50 गाँवों में क्लीन कुकिंग कार्यक्रम को आरंभ किया गया है और अगले तीन महीनों के दौरान 50 से अधिक गाँवों में इसे शुरू किए जाने की उम्मीद है।  
  • इन दो कार्यक्रमों में स्वास्थ्य और सफ़ाई, सौर ऊर्जा के उपयोग, महिलाओं के विकास, बच्चों की शिक्षा और रोज़गार के अवसरों जैसी पहलों को शामिल किया गया है।
  • इसका समग्र उद्देश्य एक ऐसा मॉडल तैयार करना है, जो समुदाय के व्यवहार में परिवर्तन लाए एवं उसके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करे। और इस उद्देश्य को प्राप्त करने का पसंदीदा तरीका स्थानीय महिला संघों को अपने साथ शामिल करना है।

यह लेख टाटा रिव्यू के जनवरी 2016 संस्करण में टाटा ट्रस्ट के बारे में प्रकाशित कवर स्टोरी का एक हिस्सा है:
पुनर्परिभाषित लोकोपकार
टाटा ट्रस्ट ने एकीकरण, प्रौद्योगिकी के उपयोग, समर्थन, साझेदारी आदि के माध्यम से - अपने अनेक परोपकारी प्रयासों के प्रभाव को गहन बनाने के लक्ष्य से नवीनीकरण का मार्ग निर्धारित किया है
'टाटा ट्रस्ट को अपने आप को अद्यतन बनाए रखना होगा'
रतन टाटा, चेयरमैन टाटा ट्रस्ट, ने ट्रस्ट के विकसित होते परोपकार संबंधी दृष्टिकोण, भविष्य की प्रगति तथा भारत के सामने खड़े प्राथमिकता वाले मामलों के बारे में बात की
स्वाद भरा समाधान
टाटा ट्रस्ट की एक विशिष्ट सार्वजनिक-निजी साझीदारी ने यह सुनिश्चित किया है कि हजारों आदिवासी बच्चे संपूर्ण आहार का आनंद लें
आहार के बढ़ते कदम
भारत में कुपोषण से निपटना एक अहम जरूरत है, और यह टाटा ट्रस्ट द्वारा ध्यान केंद्रित किए जाने वाले क्षेत्रों में से एक है
रचनात्मक बढ़त की खोज में
टाटा ट्रस्ट अपने कार्यक्रमों की पहुँच और कार्यान्वयन को विस्तारित करने का प्रयास करता है जिसके लिए प्रौद्योगिकी और समाधानों में नवप्रवर्तन अनिवार्य है
उत्थान के लिए शिक्षा प्रदान करना
टाटा ट्रस्ट के समर्थन से संचालित परियोजना का आभार, जिसके माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में शिक्षण केन्द्रों का प्रसार हुआ है
पूंजी तथा उत्कृष्टता
समुदाय के जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में टाटा ट्रस्ट की पहलों को जोड़ने से लाभार्थियों को लाभ प्रदान करने की दिशा में सफलता मिली है
आशाओं की फसल, भरपूर लाभ
महाराष्ट्र के अंदरूनी हिस्सों में संचालित टाटा ट्रस्ट की एक पहल हजारों गरीब किसानों को सहायता प्रदान करती है, जिन्हें पारंपरिक खेती से हटने के लिए और अधिक लाभदायक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है
ग्रामीण समृद्धि
टाटा ट्रस्ट का ग्रामीण आजीविका एवं समुदाय पोर्टफोलियो का लक्ष्य बहुत से उपायों के माध्यम से गरीबी में कमी करना है
कदम-दर-कदम भविष्य का निर्माण
टाटा ट्रस्ट के समर्थन ने विशेष रूप से गुजरात में हजारों प्रवासियों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां सुरक्षित करने, वित्तीय सुरक्षा पाने तथा अपने जीवन को रूपांतरित करने में सक्षम किया है
ग्रामीण रुग्णता का एक शहरी संस्करण
टाटा ट्रस्ट ने अपना ध्यान शहरी गरीबी तथा आजीविका पर एक ऐसे मसले के रूप में केन्द्रित किया जिसे एक ऐसे समय केन्द्रित दखल की जरूरत थी, जब अधिकांश लोकोपकारी एजेंसियां ग्रामीण गरीबी पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही थीं
प्रवाह के विपरीत जाना
उत्तराखंड के उत्तुंग गिरि शिखरों पर जल को अमृत माना जाता है और टाटा ट्रस्ट तथा उसके सहयोगियों द्वारा इसे लोगों तक पहुँचाने में दी जाने वाली सहायता ने लोगों के जीवन और उनकी किस्मत को बदल दिया है
अधिकतम सदुपयोग अभियान
टाटा वॉटर मिशन, टाटा ट्रस्ट में निहित सामाजिक विकास क्षमताओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लक्ष्य से प्रेरित है
ताल पुनर्जीवित
टाटा ट्रस्ट के प्रयास से गुजरात के कच्छ में शुरू हुई एक परियोजना द्वारा कौशल का अभ्यास करने वाले संगीतकारों के लिए नए अवसर पैदा कर इलाके की लोक संगीत परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है
विस्तृत किया गया कैनवास
टाटा ट्रस्ट का मीडिया, कला एवं संस्कृति थीम भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण करने और उसे साकार करने वाले लोगों पर केंद्रित है