जनवरी 2016 | फिलिप चाको

आशाओं की फसल, भरपूर लाभ

महाराष्ट्र के अंदरूनी हिस्सों में संचालित टाटा ट्रस्ट की एक पहल हजारों गरीब किसानों को सहायता प्रदान करती है, जिन्हें पारंपरिक खेती से हटने के लिए और अधिक लाभदायक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है

महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले में लहलहाते खेत; यहां के किसानों ने सीएलएलएल विशेषज्ञों से मार्गदर्शन में अपनी फसल उगाने के पैटर्न में विविधता द्वारा अपनी आय को कई गुना कर लिया है

लीला पावरा, महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में धाड़गाँव के चिप्पल गांव में स्थित अपने घर पर आगंतुकों के एक समूह का स्वागत करने के लिए उत्साहित हैं। अपने बच्चों के साथ, वह गर्व से आगंतुकों को पांच एकड़ के उस खेत में ले जाती हैं, जिसका उन्होंने और उनके पति ने पिछले कुछ महीनों में कायापलट कर दिया है।

लीला कहती हैं, “अतीत में, हम कपास उगाया करते थे लेकिन हम शायद ही कभी अतिरिक्त आय कमाने में कामयाब हुए थे।” “तब हम एक साल में रु20,000 कमाते थे, जिसमेंसे अधिकांश पैसा कीटनाशकों और उर्वरक खरीदने में खर्च हो जाता था, जिसके फलस्वरूप हमारी शुद्ध आय सिर्फ कुछ हजार रुपए बचती थी।” 

लेकिन लगभग एक वर्ष पहले, कलेक्टिव्स फॉर इंटिग्रेटेड लिवलीहुड इनिशिएटिव (CInI) - टाटा ट्रस्ट द्वारा संवर्धित एक संगठन जिसका लक्ष्य साझेदारी के माध्यम से आदिवासियों की आजीविका बढ़ाना है - के सदस्यों ने किसानों की कमाई बढ़ाने के लक्ष्य के साथ एक पायलट परियोजना के लिए उत्तरी महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल अन्य गावों के साथ-साथ चिप्पल को चुना।

कई किसानों को नंदुरबार जिले के अन्य इलाकों में सब्जी के खेतों का दौरा कराने के लिए ले जाया गया तथा उनकी फसल पद्धति में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। लीला, जो ऐसी ही एक टीम के घटक के रूप में चुने गए एक स्वयं-सहायता समूह (SHG) की सदस्य थी, उन जगहों/खेतों को देखने के बाद बेहद प्रभावित हुई और वापस आकर अपनी खेती का कायापलट करने का निश्चय किया।

लीला कहती हैं, “हम क्यों नहीं अधिक कमाई कर सकते।” "मेरे पति और मैंने मिलकर एक सौ सब्जियों के बिरवे रोपने के द्वारा काम शुरू किया। अब, हम टमाटर, बैंगन, प्याज और मेथी उगा रहे हैं।" आज, उसे पूरा भरोसा है कि उसकी इस साल की आय रु.100,000 और रु.150,000 के बीच रहेगी – जो कि उससे कई गुना अधिक है, जो उन्होंने आज से पहले कमाई थी।

लीला के पति, केसरिया डोंगरिया पावरा कहते हैं कि वे इस पिछड़े ब्लॉक के उन कुछ भाग्यशाली परिवारों में से एक हैं, जिनके पास बोरवेल है। “किन्तु हमने कभी भी सब्जियों की खेती किए जाते हुए नहीं देखा था और अपनी फसलों में विविधता लाने के द्वारा आय बढ़ाने की क्षमता से परिचित नहीं थे।” 

यह पिछले वर्ष CInI का वह हस्तक्षेप था जिसने विपुल अवसरों के लिए पावरा दंपत्ति की आँखें खोलीं, जो भारत में निर्धनतम किसानों के लिए भी उपलब्ध है। CInI के साथ कार्यरत एक कृषि विशेषज्ञ सतीश एखंडे - जो निरंतर रूप से धाड़गाँव ब्लॉक में खेतों का दौरा कर रहे हैं - बताते हैं, “हम न केवल तकनीकी ज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि किसानों को गुणवत्तापूर्ण बिरवा खरीदने और फसल चक्र में बदलाव के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं।” हम कीटों की पहचान भी करते हैं और उन्हें कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के खतरों के बारे में सचेत भी करते हैं।”

पश्चिमी क्षेत्र - जिसमें महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी इलाके भी शामिल हैं - के लिए CInI के कार्यक्रम समन्वयक, समीर भट्टाचार्जी कहते हैं कि संगठन धाड़गाँव ब्लॉक के 21 गांवों और कार्यक्षेत्र के अन्य इलाकों के किसानों की आय में प्रत्यक्ष वृद्धि तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार देखना चाहता है।

धाड़गाँव ब्लॉक के एक अन्य आदिवासी गांव, कमोड की यात्रा के दौरान, कोई भी कार्यक्रम के लिए स्थानीय समुदाय का उत्साह देख सकता है। तेग बहादुर पावरा - जो कार्यक्रम के आरंभ से ही इसके साथ जुड़े हुए हैं - को अपने 3.5 एकड़ के भूखंड के कायापलट हेतु प्रयासों के लिए अन्य ग्रामीणों के बीच सम्मान हासिल है।

तेग बहादुर पावरा कहते हैं, “जब मैंने सब्जियों की खेती करना शुरू किया, तब अन्य किसान, मेरे रिश्तेदार और यहां तक ​​कि मेरी पत्नी भी परिणाम को लेकर आश्वस्त नहीं थी, किन्तु मेरे द्वारा उगाई गई सब्जियों की पहली खेप को एक अच्छी कीमत पर स्थानीय बाजार में बेचे जाने के बाद, कइयों ने इसमें रुचि दिखाई।”

श्री तेगा एक कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (सीआरपी) के रूप में - CInI और ग्रामीणों के साथ बातचीत और समन्वय स्थापित करने, और किसानों को मार्गदर्शन देने तथा उन्हें अच्छी प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के द्वारा दोहरी भूमिका निभाते हैं। वह अब स्वयं एक नवोदित उद्यमी हैं जो अन्य किसानों को बिरवा बेचते हैं और इस प्रकार अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

इस तरह के एक पिछड़े क्षेत्र में काम करने की चुनौतियां अनगिनत हैं। श्री भट्टाचार्जी बताते हैं कि धाड़गाँव और इसके आसपास के गांव सतपुड़ा पर्वत शृंखला की तलहटी में स्थित हैं। कुछ दशक पहले तक यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था, किंतु आज यह क्षेत्र अनुर्वर/बंजर है। यहां औसत सालाना वर्षा लगभग 800 मिमी है, लेकिन 2014 और 2015 बमुश्किल 500 मिमी वर्षा के साथ सबसे बुरे साल रहे हैं।

इसे साथ अन्य नकारात्मक चीज़ें भी हैं। श्री भट्टाचार्जी के अनुसार, धाड़गाँव ब्लॉक मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के मामले में भारत के 100 सबसे खराब ब्लॉकों में शुमार है। लगभग 400,000 लोग - भील और पावरा समुदायों के 99 प्रतिशत आदिवासी – इस ब्लॉक के 130 गांवों में रहते हैं। यह ब्लॉक साक्षरता और स्वास्थ्य सहित सभी सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की दृष्टि से बहुत बुरी स्थिति में है।

महाराष्ट्र में अनाज से सब्जियों की ओर विस्थापन, किसानों के लिए लाभकारी रहा है

अधिकांश किसान अपनी आय बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं और आशा करते हैं कि अगले एक या दो साल में, वे कई सब्जियों की खेती करने में सफल होंगे। कुछ लोग अतिरिक्त आय को अन्यत्र निवेश करने की योजना भी बना रहे हैं, वंदना पावरा बताती हैं, “हम अतिरिक्त आय से मवेशी खरीद सकते हैं और अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए भी धन का इस्तेमाल कर सकते हैं।”

श्री भट्टाचार्य जी प्रत्येक घर की आय को रु.30,000-35,000 से लेकर कम से कम रु.120,000 तक बढ़ाने के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहते हैं, “CInI के भीतर, हम अपने मिशन को लखपति किसान कहते हैं।”

इन बस्तियों में से कइयों में किसानों के आत्मविश्वास और उस उत्सुकता को देखते हुए, जिसके साथ वे नई फसल उगाने या अपनी अल्प बचत को नर्सरी जैसी परियोजनाओं में निवेश करने का जोखिम लेने के लिए तैयार हैं, इस लक्ष्य को प्राप्त करना ज़रा भी मुश्किल प्रतीत नहीं होता है।

यह लेख टाटा रिव्यू के जनवरी 2016 संस्करण में टाटा ट्रस्ट के बारे में प्रकाशित कवर स्टोरी का एक हिस्सा है:
पुनर्परिभाषित लोकोपकार
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