जनवरी 2016 | सोनिया

कदम-दर-कदम भविष्य का निर्माण

टाटा ट्रस्ट के समर्थन ने विशेष रूप से गुजरात में हजारों प्रवासियों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां सुरक्षित करने, वित्तीय सुरक्षा पाने तथा अपने जीवन को रूपांतरित करने में सक्षम किया है

46 वर्षीय समारू राम तथा उसकी पत्नी के लिए आजीविका का अर्थ बेलगहना, छत्तीसगढ़ में अपने घर से 1,240 किमी दूर गुजरात में गांधीनगर के बाहरी इलाके में उवरसाद के ईंट भट्टों तक की यात्रा करना है। निराशाजनक आवासीय स्थितियों, शोषण भरे काम के घंटों तथा अनुचित वेतन के बावजूद, यह जोड़ा पिछले 15 वर्षों से इस वार्षिक यात्रा को कर रहा है; बस इसलिए कि वे छः माह की अवधि में कमाए कुछ एकमुश्त धन को घर ला सकें जिससे साल के बाकी समय को बिताया जा सके।

अहमदाबाद में बामरोली गाँव के ईंट के भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों के लिए धूल और गर्मी जीवन का एक हिस्सा हैं

समारू जैसे सैकड़ों श्रमिक खुद को ऐसी ही परिस्थितियों में शामिल पाते हैं – यानी अधिक काम करना, शोषित होना तथा अक्सर ईंट भट्टा मालिकों व श्रमिक ठेकेदारों द्वारा कठोर मेहनत से कमाए गए उनके पैसे की बेईमानी करना।हालांकि पिछले कुछ वर्षों में प्रयास सेंटर ऑफ लेबर रिसर्च एंड एक्शन (PCLRA) की कोशिशों के कारण, समारू तथा उसकी पत्नी ने रु.25,000 (लगभग $375 अमरीकी डॉलर) बचाए हैं जिसने साल के बाकी दिन उनको आजीविका में सहायता दी।

अस्तित्व की लड़ाई
ईंट भट्टा उद्योग, भारत में सबसे असंगठित क्षेत्रों में से एक है। अधिकांश श्रमिक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होते हैं - भारत में सबसे अधिक हाशिये पर स्थित समुदाय जिनके पास शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल तथा आजीविका के अवसरों की कमी या अभाव होता है - तथा इनको श्रमिक ठेकेदारों या नियोक्ताओं द्वारा दिए गए कर्ज के विरुद्ध काम पर लगाया जाता है। ये श्रमिक इन भट्टों पर काम करते हुए कर्ज चुकाते हैं।

PCLRA के कानूनी समन्वयक, रमेश श्रीवास्तव बताते हैं, “इस अवधि के दौरान, श्रमिक मालिक के पास बस अपना अस्तित्व बनाए रखने लायक खर्च पर बंधुआ होते हैं। अवैध होते हुए भी, ईंट भट्टा उद्योग में बंधुआ मजदूरी सतत रूप से विद्यमान है।"  पूरे गुजरात में यह केन्द्र 700 से अधिक भट्टों पर प्रवासियों के साथ काम कर रहा है।

मुख्य रूप से मध्य तथा उत्तरी गुजरात में स्थित इन भट्टों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा गुजरात के कुछ हिस्सों के गरीब समुदायों के लोग रोजगार में संलग्न हैं। ये श्रमिक अधिकतर जमीन के घटते स्वामित्व, घटती उपज के कारण कृषि को अस्थिर बनाने वाले कारणों से प्रभावित भूमिहीन श्रमिक या अल्पकालिक किसान होते हैं। अभाव और गरीबी से बचने के लिए ये श्रमिक अक्सर ईंट के भट्टों या निर्माण स्थलों जैसे श्रम गहन क्षेत्रों में काम करते हैं।

परिवर्तन का चक्र
चूंकि ये उद्योग एक अनौपचारिक स्वरूप में काम करते हैं जो कि सरकारी एजेन्सियों के अवलोकन से दूर होता है, अतः सोमारू जैसे श्रमिकों के हिस्से में शोषण आता है। PCLRA के परियोजना निदेशक सुधीर कटियार बताते हैं, “औसत रूप से प्रतिदिन काम के घंटे 12-16 घंटे के होते हैं और इस दौरान आरामदायक निवास, पीने का साफ पानी तथा स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं होती हैं। आम तौर पर ये श्रमिक, भट्टों पर ही रहते हैं तथा विषाक्त तत्वों के उच्च स्तरों को झेलते हैं। इनके साथ हिंसा, जिसमें पिटाई, परिवार के सदस्यों का अपहरण जैसी घटनाएं काफी आम हैं। बाल श्रम भी बड़े पैमाने पर व्याप्त है।"

हालांकि, गैर-लाभकारी संगठनों के सतत अभियानों ने प्रवासी श्रमिकों की परिस्थितियों को बदलने में सहायता की है। प्रयास केन्द्र, जो कि पिछले आठ सालों से प्रवासी श्रमिकों के साथ काम कर रहा है, उनको उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करके, उनकी यूनियन बनाने में सहायता करके तथा अपना बकाया प्राप्त करने हेतु संघर्ष करने में सहायता करके उनको सशक्तिकरण प्रदान करने में सफल रहा है। 

धीरे-धीरे, लेकिन प्रत्यक्षतः परिवर्तन का चक्र घूमने लगा है। 2008 से, 3,000 से अधिक श्रमिक ईंट भट्टा मजदूर यूनियन के साथ पंजीकृत हुए हैं; मजदूरी में 70 प्रतिशत तक की बढ़त के साथ 100,000 से अधिक श्रमिकों को लाभ मिला है। दूसरे सूचक भी लक्षित अभियानों की सफलता को दर्शाते हैं। 1,000 से अधिक प्रवासी मजदूरों को बंधुआ तंत्र से मुक्त कराया गया है तथा शारीरिक शोषण तथा वेतन से इंकार जैसी कार्य-स्थल संबंधी शिकायतों में 50 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गयी है। श्रमिक ठेकेदारों के फंदों में फंसने से श्रमिकों को बचाने के लिए प्रवासी श्रमिकों को शिक्षित करने के लिए, यह केन्द्र अब अपने पद-चिह्नों को स्रोत क्षेत्रों में ले जा रहा है।

गरिमापूर्ण जीवन
PCLRA ने शिक्षा, स्वास्थ्य तथा शुरुआती बचपन की देखभाल प्रदान करके, प्रवासी श्रमिकों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की छतरी के अंतर्गत लाने में सफलता हासिल की है। श्री कटियार बताते हैं, “हमारे प्रयासों ने उत्तरी तथा मध्य गुजरात में स्थित 300 ईंट भट्टों के 50,000 से अधिक श्रमिकों को लाभ पहुंचाया है।" वे आगे बताते हैं, “बाल श्रम के मामले कम हुए हैं। अपने गंभीर प्रयासों तथा सरकार के साथ फ़ॉलो-अप करने के द्वारा, हम ईंट भट्टों वाले स्थलों पर स्कूलों को शुरु कर पाने में सक्षम हुए हैं। हम इन स्कूलों में मध्याह्न भोजन प्रदान करने में भी लगे हुए हैं।"

गाँधीनगर के पास बड़ी मेहनत से भट्टे पर कच्ची ईंटे बनाते मजदूर

PCLRA ने इनमें से कई स्थलों पर आवासीय स्कूल खोलने में सहायता की है, जिसने श्रमिकों के लिए बेहद जरूरी सहायता प्रदान की है। गांधीनगर के बाहर एक ईंट भट्टे में काम करने वाले श्रमिक सुखदेव बावरी बताते हैं, “पहले हमारे चार बच्चे हमारे साथ ईंट के भट्टे पर जाते थे एवं हमारे काम में सहायता करते थे। लेकिन मजदूर यूनियन द्वारा भारत सरकार के सर्वशिक्षा अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत राजस्थान के नागौर जिले में एक छात्रावास स्थापित किया गया है, मेरे बच्चे अब वहां रहते हैं और हमारे यहां पर काम करने के दौरान वहां पर शिक्षा प्राप्त करते हैं।" 

टाटा ट्रस्ट का गुजरात में PCLRA जैसे गैर-लाभकारी संगठन के माध्यम से प्रवासी श्रमिकों के जीवन के सुधार के अभियान ने अब फल देने शुरु कर दिए हैं। स्थायी अभियानों ने शोषण को रोका है तथा उनको सम्मान के साथ आजीविका कमाने में सहायता की है।

यह लेख टाटा रिव्यू के जनवरी 2016 संस्करण में टाटा ट्रस्ट के बारे में प्रकाशित कवर स्टोरी का एक हिस्सा है:
पुनर्परिभाषित लोकोपकार
टाटा ट्रस्ट ने एकीकरण, प्रौद्योगिकी के उपयोग, समर्थन, साझेदारी आदि के माध्यम से - अपने अनेक परोपकारी प्रयासों के प्रभाव को गहन बनाने के लक्ष्य से नवीनीकरण का मार्ग निर्धारित किया है
'टाटा ट्रस्ट को अपने आप को अद्यतन बनाए रखना होगा'
रतन टाटा, चेयरमैन टाटा ट्रस्ट, ने ट्रस्ट के विकसित होते परोपकार संबंधी दृष्टिकोण, भविष्य की प्रगति तथा भारत के सामने खड़े प्राथमिकता वाले मामलों के बारे में बात की
स्वाद भरा समाधान
टाटा ट्रस्ट की एक विशिष्ट सार्वजनिक-निजी साझीदारी ने यह सुनिश्चित किया है कि हजारों आदिवासी बच्चे संपूर्ण आहार का आनंद लें
आहार के बढ़ते कदम
भारत में कुपोषण से निपटना एक अहम जरूरत है, और यह टाटा ट्रस्ट द्वारा ध्यान केंद्रित किए जाने वाले क्षेत्रों में से एक है
शुद्ध लाभ पक रहे हैं
टाटा ट्रस्ट द्वारा अपने सहयोगियों के साथ मिलकर गुजरात में चलाए जाने वाले क्लीन कुकिंग और इंटरनेट जागरुकता कार्यक्रम से संगठन की मंशा और उसके प्रभाव का पता चलता है
रचनात्मक बढ़त की खोज में
टाटा ट्रस्ट अपने कार्यक्रमों की पहुँच और कार्यान्वयन को विस्तारित करने का प्रयास करता है जिसके लिए प्रौद्योगिकी और समाधानों में नवप्रवर्तन अनिवार्य है
उत्थान के लिए शिक्षा प्रदान करना
टाटा ट्रस्ट के समर्थन से संचालित परियोजना का आभार, जिसके माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में शिक्षण केन्द्रों का प्रसार हुआ है
पूंजी तथा उत्कृष्टता
समुदाय के जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में टाटा ट्रस्ट की पहलों को जोड़ने से लाभार्थियों को लाभ प्रदान करने की दिशा में सफलता मिली है
आशाओं की फसल, भरपूर लाभ
महाराष्ट्र के अंदरूनी हिस्सों में संचालित टाटा ट्रस्ट की एक पहल हजारों गरीब किसानों को सहायता प्रदान करती है, जिन्हें पारंपरिक खेती से हटने के लिए और अधिक लाभदायक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है
ग्रामीण समृद्धि
टाटा ट्रस्ट का ग्रामीण आजीविका एवं समुदाय पोर्टफोलियो का लक्ष्य बहुत से उपायों के माध्यम से गरीबी में कमी करना है
ग्रामीण रुग्णता का एक शहरी संस्करण
टाटा ट्रस्ट ने अपना ध्यान शहरी गरीबी तथा आजीविका पर एक ऐसे मसले के रूप में केन्द्रित किया जिसे एक ऐसे समय केन्द्रित दखल की जरूरत थी, जब अधिकांश लोकोपकारी एजेंसियां ग्रामीण गरीबी पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही थीं
प्रवाह के विपरीत जाना
उत्तराखंड के उत्तुंग गिरि शिखरों पर जल को अमृत माना जाता है और टाटा ट्रस्ट तथा उसके सहयोगियों द्वारा इसे लोगों तक पहुँचाने में दी जाने वाली सहायता ने लोगों के जीवन और उनकी किस्मत को बदल दिया है
अधिकतम सदुपयोग अभियान
टाटा वॉटर मिशन, टाटा ट्रस्ट में निहित सामाजिक विकास क्षमताओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लक्ष्य से प्रेरित है
ताल पुनर्जीवित
टाटा ट्रस्ट के प्रयास से गुजरात के कच्छ में शुरू हुई एक परियोजना द्वारा कौशल का अभ्यास करने वाले संगीतकारों के लिए नए अवसर पैदा कर इलाके की लोक संगीत परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है
विस्तृत किया गया कैनवास
टाटा ट्रस्ट का मीडिया, कला एवं संस्कृति थीम भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण करने और उसे साकार करने वाले लोगों पर केंद्रित है